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गुरुवार, 18 अगस्त, 2005 को 12:55 GMT तक के समाचार
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अख़बारों में अश्लीलता के ख़िलाफ़ याचिका
अख़बारों में अश्लील सामग्री
अख़बारों के पन्नों पर ऐसी तस्वीरों का प्रकाशन बढ़ रहा है
क्या आपको यह दुविधा नहीं होती कि अख़बार में अक्सर ऐसी तस्वीर या सामग्री छपी होती है जो इतनी अश्लील होती है कि उसे बच्चों की नज़रों से किसी तरह बचा लिया जाए?

या यह कि ऐसी तस्वीरों और सामग्री वाले अख़बार को घर के सभी सदस्यों के सामने किस तरह रखा जाए?

ऐसे समय में आपको ज़रुर ख़याल आता होगा कि इन अख़बारों को कोई रोकता क्यों नहीं. ठीक उसी तरह जिस तरह सेंसर बोर्ड किसी फ़िल्म के अश्लील दृश्यों को रोकता है.

तो चिंता मत कीजिए क्योंकि अब ऐसा हो भी सकता है क्योंकि अख़बारों में अश्लील सामग्री प्रकाशित करने के ख़िलाफ़ एक जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है.

अख़बारों में प्रकाशित होने वाली तस्वीरों में बढ़ती अश्लीलता के ख़िलाफ़ यह याचिका दायर की गई है.

याचिका दिल्ली के वकील अजय गोस्वामी ने दायर की है.

उनका आरोप है कि अख़बारों में एसएमएस चुटकुलों, लेखों और यौन शिक्षा देने वाले लेखों की आड़ में अश्लील सामग्री परोसी जा रही है.

अपनी याचिका में अजय गोस्वामी ने कहा है कि इन सबके दुष्प्रभावों से नाबालिगों को बचाया जाना ज़रुरी है.

मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहौटी, न्यायमूर्ति जीपी माथुर और न्यायमूर्ति बालासुब्रमण्यन ने याचिका को स्वीकार करते हुए दो प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बारों, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और दो समाचार एजेंसियों पीटीआई और यूएनआई को नोटिस दिया है.

नियम क़ायदे

याचिकाकर्ता गोस्वामी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए कहा है कि ज़रुरी यह है कि नाबालिगों को इन अश्लील सामग्री से बचाने के लिए तुरंत ही नियम और दिशा निर्देश तैयार करने की ज़रुरत है.

 प्रेस परिषद पिछले 27 सालों से अस्तित्व में है लेकिन अभी तक समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों की सामग्री का स्तर सुधारने के लिए कोई नियम नहीं बना सका है
याचिकाकर्ता अजय गोस्वामी

याचिका में कहा गया है, "प्रेस परिषद पिछले 27 सालों से अस्तित्व में है लेकिन अभी तक समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों की सामग्री का स्तर सुधारने के लिए कोई नियम नहीं बना सका है."

सुप्रीम कोर्ट से याचिकाकर्ता ने अनुरोध किया है कि वह केंद्र सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दे जो मीडिया के ज़रिए बच्चों को अश्लील सामग्री के संपर्क में आने से बचाने के लिए दिशा निर्देश तैयार कर सके.

अजय गोस्वामी का कहना था कि भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के बाल अधिकार और मानवाधिकार अधिवेशन 1989 के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे और अब यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वह बच्चों को इस तरह की विकृति से बचाए.

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