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शुक्रवार, 15 अप्रैल, 2005 को 07:45 GMT तक के समाचार
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समय और रिश्तों की गाथा भरी फ़िल्म

'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी' का एक दृश्य
'हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी' फ़िल्म की कहानी अलग तरह की है
पिछले कुछ समय में छोटे बजट की कई फिल्मों ने दर्शकों को अपनी ओर खींचा है और उनमें से कुछ फ़िल्में विषय की नवीनता और कहानी की ताज़गी के कारण चर्चित भी रही हैं.

सुधीर मिश्रा की फिल्म 'हज़ारों ख्वाहिशें ऎसी' इसी श्रेणी की फ़िल्म है.

कैरियर की शुरुआत से ही सुधीर की अपने समय की दास्तां सुनाने की ख्वाहिश रही है.

उन्होंने 'कलकत्ता मेल' जैसी मेनस्ट्रीम फ़िल्म पर भी अपनी तरह के प्रयोग किए तो चमेली जैसी अलग कहानी भी बनाई.

'इस रात की सुबह नहीं' में प्रेम और रोमांच का मेल कराया तो 'धारावी' के ज़रिये नये समाज में हालातों से जूझते आदमी की कशमकश का फ़िल्मांकन भी किया .

टेलीव़िजन भी उनकी प्रयोगशीलता से अछूता नही रहा.

रांगेय राघव की अमर कृति पर उन्होंने 'कब तक पुकारूँ' धारावाहिक बनाया तो एक सामाजिक कहानी को थ्रिलर का रंग दे कर 'तलाश' नामक सीरियल भी बनाया.

हज़ारों ख्वाहिशें ऎसी उनकी ताज़ातरीन फ़िल्म है जो इमरजेंसी के आसपास के समय, समाज और रिश्तों की गाथा है.

अपनी फ़िल्म के बारे में सुधीर बताते हैं,'' हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी तीन चरित्रों के आपसी रिश्तों के बहाने 70 के दशक के समय की कहानी है.''

अलग कहानी

विक्रम मलहोत्रा गाँधीवादी विरासत से छिटकी हुई पीढ़ी के अरमानों का प्रतीक है, जो बदलते वक्त को पैसे और सफलता के पैमाने से नापना चाहता है.

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी फ़िल्म का एक दृश्य

विक्रम को साथ पढ़ने वाली लड़की गीता से प्यार हो जाता है जो जीवन को समझने की ललक लिये एक तटस्थ सी शख्सियत है, मगर गीता को सिद्धार्थ से प्यार है.

सिद्धार्थ भरे पूरे बुध्दिजीवी घर का लड़का है जो क्राँति के ज़रिये दुनिया बदलने का सपना सच करना चाहता है.

विक्रम सत्ता के गलियारों से सफलता का शार्टकट पा लेता है, सिद्धार्थ नक्सलबाड़ी आंदोलन में शरीक हो जाता है, गीता की शादी एक आईएएस से कर दी जाती है.

वक्त के बवंडर में फँसे इन्हीं किरदारों के बिछड़ने और मिलने के बहाने फ़िल्म उस समय के सामाजिक और सियासी सवालों से दर्शकों का सामना कराती है.

फ़िल्म में व्यंग की एक अंतरधारा भी साथ– साथ चलती रहती है जो फ़िल्म को हल्का बनाए रखती है.

निर्देशक के रूप में सुधीर खुद को गीता के चरित्र से अपने आपको पहचान करवाते हैं जो कि सामाजिक बदलाव की धीमी मगर सकारात्मक गति की प्रतीक है.

अंत में सपनों की भटकन और सचाई की कड़ुवाहट के बीच से गीता ही सही सलामत निकल पाती है.

कहानी की ही तरह फ़िल्म का संगीत भी अलग किस्म का और विषय के सुर में है, ख़ासकर स्वानंद किरकिरे का लिखा और गाया गीत बावरा मन प्रभावशाली है.

फ़िल्म की मुख्य भूमिकाओं में- के के, चित्रांगदा और शाइनी आहुजा हैं और पटकथा शिव सुब्रमण्यम और रुचि नारायण के साथ सुधीर मिश्रा ने लिखी है.

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