|
ज़हूर का होटल और यादें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़हूर का होटल न सिर्फ एक होटल है बल्कि एक युग है, यादों का सफ़र है और केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में रह रहे भारतीयों को बांधने वाली एक कड़ी भी है. 'ज़हूर का होटल' नाम है एक नाटक का जिसका मंचन लंदन में हो रहा है. कहानी है भारत के हर उस छोटे से शहर की, हर उस ढाबे या होटल की जहाँ चार लोग बैठकर हंसी मज़ाक भी करते हैं और गंभीर मामलों पर बहस-मुबाहिसा भी. कहानी है ढाबे पर बैठने वाले उन हिंदू-मुसलमानों की जो गंगा-जमुनी तहज़ीब में पले बढ़े हैं. इसी ढाबे में हिंदू को मारने के लिए छुरा भी छुपाया जाता है तो ढाबे का मालिक एक हिंदू की जान भी बचाता है. ऐसा तो होता है न. अमीन सयानी का गीतमाला सुनने के लिए भीड़ भी उसी ढाबे पर जमा होती है और उसी ढाबे पर इस बात पर चर्चा होती है कि कर्फ्यू कैसे हटवाया जाए. इसी ढाबे पर छोकरे जवान होते हैं और सपने देखना भी सीखते हैं.
न केवल जवान होते हैं बल्कि कुछ ऐसे पाठ पढ़ लेते हैं जो पूरी ज़िंदगी उन्हें एक बेहतर इनसान बनने में भी मदद करते हैं. तहज़ीब, तमीज़ और आदर का पाठ पढ़ने के लिए पाठशाला नहीं बल्कि यही ढाबा उनकी मदद करता है. यह पाठ हर नौजवान को अलीगढ़ से लंदन तक याद भी रहता है क्योंकि ये बातें कहीं न कहीं ज़हन में गहरे पैठ जाती हैं. नाटक का एक प्रमुख किरदार अलीगढ़ से लंदन आ तो जाता है लेकिन उसके संस्कार वैसे ही बने रहते हैं. अलीगढ़ और लंदन नाटक के निर्देशक परेवज़ आलम बताते हैं, "यह नाटक मेरी यादों की कड़ी का दूसरा हिस्सा है. इसके पहले एक नाटक किया था और आगे भी एक नाटक करुंगा." नाटक के विषय के बारे में परवेज़ आलम कहते हैं, "मैंने अपनी यादों के ज़रिए एक पूरे समय को उभारने की कोशिश की है. इसमें एक नौजवान की कहानी है तो साथ ही है हिंदू-मुस्लिम रिश्तों और दंगों की भी कहानी."
ख़ुद परवेज़ आलम रिश्ता भी अलीगढ़ से रहा है और पूछने पर कहते हैं कि वाकई अलीगढ़ में ज़हूर का होटल हुआ करता था. नाटक में ज़हूर का किरदार निभा रहे बदीउज़्जमा नाटक की मूल भावना यानी हिंदू-मुस्लिम रिश्तों के बारे में अपनी अलग और तल्ख़ राय रखते हैं. बदीउज़्ज़मा कहते हैं, "नफ़रत ख़ून में हैं. मुसलमान के भी और हिंदू के भी. ये चंद लोग हैं जो कभी भी एक दूसरे से प्रेम नहीं कर सकते. बाकी देखिए. हमारा आपका सबका खून लाल ही तो है. कहाँ अलग हैं हम. भाषा भी एक जैसी बोलते हैं." बदीउज़्ज़मा आजमगढ़ में पैदा हुए. पाकिस्तान में रहे और अब पिछले कई सालों से लंदन में रह रहे हैं. नाटक की भाषा भदेस कह सकते हैं जिसमें ज़ाहिर है वो गालियाँ भी आती हैं जो ढाबे पर इस्तेमाल की जाती हैं लेकिन शायद यही इस नाटक की सबसे बड़ी ख़ूबी भी है जो हर आदमी को अपनी ज़मीन से जोड़ देती है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||