'एयरलिफ़्ट': अक्षय का शिंडलर जैसा किरदार
- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
फिल्मः एयरलिफ़्ट, निर्देशकः राजा मेनन, अभिनेताः अक्षय कुमार, निमरत कौर
मुख्यधारा के कमर्शियल हिंदी सिनेमा में एक यथार्थवादी फ़िल्म की असलियत (या कहें तो त्रासदी, हालांकि मैं ऐसा नहीं कहूँगा) यह है कि आपको साथ ही यह भी मानना होता है कि वह आख़िर एक 'बॉलीवुड' फ़िल्म है.

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अक्षय कुमार या फिर सलमान ख़ान (एक था टाइगर, बजरंगी भाईजान) जिन्होंने अपने पूरे करियर में उसी तरह का काम किया है, जैसा उनके फैन्स चाहते हैं. मगर उनकी फ़िल्मों का सच यह है कि उसके बाद उन्होंने जो भी काम किया, जो पर्दे पर बहुत सार्थक दिखता हो, आपको पूरी तरह प्रभावित कर जाता है.
और ऐसा हो भी क्यों न! सामान्यतः यह मुख्यधारा के सिनेमा के लिए भी बहुत मायने रखता है. एयरलिफ़्ट भी इसका अपवाद नहीं है.
कोका कोला कंपनी अपनी वार्षिक रिपोर्ट के अलावा जो एकमात्र दस्तावेज़ छापती है, वो है लिमका बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स. क्विज़ के शौकीन ज़्यादातर भारतीय इसे पढ़कर बड़े हुए हैं, उन देसी उपलब्धियों के बारे में पढ़कर जिन्हें जानकर बहुत से लोग शर्मिंदा हो जाएंगे. (मसलन सबसे बड़े नाख़ून या सबसे लंबी दाढ़ी वगैरह का रिकॉर्ड).

इस किताब में 1991 की एक प्रविष्टि है, जो सही अर्थों में विलक्षण है, और मुझे बताया गया कि इसका ज़िक्र बाद में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी हुआ. जिसमें 1990 में कुवैत से एक लाख 70 हज़ार भारतीयों को देश वापस लाने का ज़िक्र है.
यह पूरी कार्यवाही असल में असाधारण थी क्योंकि काफ़ी दूर से लोगों को वापस लाना था और संचार साधनों की कमी थी. सरकार ने इसका श्रेय लिया. आईके गुजराल तब विदेश मंत्री थे (जो बाद में प्रधानमंत्री भी बने). 488 उड़ानों के लिए एयर इंडिया की दुनिया भर में सराहना हुई, जो विदेशी ज़मीन से इतनी बड़ी तादाद में श्रमिकों को लाने के लिए भरी गईं थीं.

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तेल में तेज़ी के दौरान वहां काम कर रहे ये लोग सद्दाम हुसैन की फ़ौजों के कुवैत में घुसने के बाद भागने को मजबूर हो गए थे.
इस मामले में एक और अहम तथ्य रहा. उन हालात में क़रीब डेढ़ लाख लोगों को उड़ान से पहले एक जगह इकट्ठा करना एक समस्या थी. इस बारे में ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं.

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ज़ाहिर तौर पर दो भले लोगों ने निजी तौर पर इसका बीड़ा उठाया. फ़िल्म में दोनों किरदारों को एक में पिरो दिया गया है. यह किरदार निभाया है अक्षय कुमार ने, जो आज के ऑस्कर शिंडलर जैसा है और उसका मक़सद इंसानियत के नाते लोगों की मदद करना है.
देखें तो एयरलिफ़्ट अक्षय कुमार की सबसे कम नाटकीय फ़िल्म है. साहस बाहर से नहीं दिखता. उनकी भूमिका का ज़्यादातर सार उनके किरदार को जिस तरह लिखा गया है, उसमें निहित है. ईमानदारी से कहें तो उन्होंने इतना संयत अभिनय किया है, जिसकी उम्मीद आप अक्षय से अक्सर नहीं करते. पिछली कुछ फिल्मों में वो तेज़ी से बुढ़ाते अपने समकालीनों, खासकर शाहरुख ख़ान (हैप्पी न्यू ईयर, दिलवाले) से कहीं ज़्यादा कोशिश कर रहे हैं (बेबी, स्पेशल 26).
अक्षय रंजीत की भूमिका में हैं, एक खालिस पंजाबी व्यापारी, जो पहले अपने कर्मचारियों की मदद करने की ज़िम्मेदारी लेता है. धीरे-धीरे फिर वह अपनी या अपने परिवार की सुरक्षा का ध्यान न रखते हुए सारे भारतीयों की मदद की ज़िम्मेदारी ले लेता है.

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एक साधारण और स्वार्थी व्यक्ति को इतने महान कार्य के लिए क्या प्रेरित करता है? यह कहना मुश्किल है. ईमानदारी से, आपको ऐसा लगता है कि काश! फिल्म ने किरदार के इस पहलू पर ज़रा और ध्यान दिया होता.
इस किरदार का यह नया नायकत्व ज़्यादातर उसके काम में ही दिखता है. उसकी पत्नी (निमरत कौर, जिनकी योग्यता का ज़रा भी इस्तेमाल नहीं हुआ) सिर्फ़ एक बार इस बारे में बात करती है.

रंजीत इराक़ के एक सैन्य अधिकारी से (इस किरदार की भूमिका अंधेरी के किसी अभिनेता ने निभाई है और टूटी-फूटी हिंदी की नकल करके उसने इस किरदार को बर्बाद कर दिया है) सौदेबाज़ी करता है.
दूसरी तरफ़, दिल्ली में एक निचले स्तर का सरकारी अफ़सर मदद तो करना चाहता है पर अफ़सरशाही और वरिष्ठता के बंधनों में बंधा है.

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इस व्यक्ति (बेहतरीन किरदार) का नाम संजीव कोहली है. कोहली साहब विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं (जो आईएएस श्रेणी में काफ़ी ऊंचा पद होता है). हालांकि वह विभाग में ऐसे बैठे होते हैं मानो कोई सेक्शन ऑफ़िसर या क्लर्क हो. मुझे खेद है कि एक यथार्थवादी फ़िल्म में ऐसा खराब शोध महज़ आपको उन बॉलीवुड फ़िल्मों की ही याद दिलाता है, जिनमें एक दूसरे दर्ज़े का इंस्पेक्टर पूरे शहर का बॉस होता है.
बहरहाल, फ़िल्म निर्माता दर्शकों की बुद्धिमत्ता और सूक्ष्म बातों का ख्याल और आदर करते हुए खाड़ी संकट, कुवैत और इराक़ी हमले और भारतीयों को वहां से हटाए जाने की शूटिंग से इसकी भरपाई कर देते हैं.
प्रोडक्शन डिज़ाइन और कैमरा वर्क कमाल का है. वह त्रासदी असल लगती है. लगता है कि जो पैसा इसमें खर्च हुआ, वह सार्थक है. लेकिन अगर अक्षय कुमार फ़िल्म में न होते, तो यह मुमकिन नहीं था.
हां, मैं जानता हूँ, इसके 'होटल रवांडा' बनने की संभावना थी लेकिन, चलिए ज़्यादा नुक्ताचीनी न करें. फ़िलहाल यह कहना काफ़ी है- देखने लायक बॉलीवुड फ़िल्म. कहना मुश्किल है.
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