जब इस्मत चुग़ताई को पहनना पड़ा बुर्क़ा

- Author, श्वेता सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
''अरे भई, कैसा समन है?, पढ़ लीजिए, पुलिस इंस्पेक्टर ने बड़ी रुखाई से कहा. और समन की सुर्खी पढ़कर उनकी हँसी छूट गई."
ये हँसी थी उर्दू की मशहूर लेखिका इस्मत चुग़ताई की, जिन्हें उनकी कहानी 'लिहाफ़' के लिए कोर्ट का समन आया था. जिस पर लाहौर हाई कोर्ट में अश्लीलता का मामला दर्ज कराया गया था.
इस्मत चुग़ताई की छोटी बेटी सबरीना लतीफ़ ने इस वाकये को याद करते हुए बीबीसी से कहा, “माँ बहुत ही बड़े स्तर पर सोचती थीं, वो जगबीती को आपबीती बना कर सच लिखती थीं.”
इस्मत चुग़ताई का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं में 21 जुलाई 1915 को हुआ था. उनकी मृत्यु 1991 में हुई.
प्रसिद्ध उर्दू आलोचक शमीम हनफ़ी कहते हैं, “इस्मत चुग़ताई हमारे ज़माने की सबसे मशहूर लेखिका थीं. प्रेमचंद के बाद उर्दू कहानियों का जो मोड़ है वो इस्मत चुग़ताई के वक़्त एक बड़ा मोड़ बन जाता है."
सिर्फ लेखिका नहीं थीं

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इस्मत की आम छवि एक नारीवादी लेखिका की रही. प्रभावशाली महिला किरदार उनके लेखन की ख़ास पहचान रहे.
सबरीना लतीफ़ कहती हैं, “लोग उन्हें एक बतौर लेखिका जानते हैं लेकिन, जब हमारा बर्थडे होता था तो वो घर पर ही कपड़े सिलती थीं और इस तरह तैयार करतीं मानों कहीं बाहर से ख़रीदे हों.”
सबरीना बताती हैं, “वो एक बहुत ही रोमांटिक महिला थीं. हमें अक्सर अलग-अलग तरह की फिल्में दिखाया करती थीं और फिर बात करती थीं. चाहे हम खाने की टेबल पर ही क्यों ना हों, उन्हें हर मुद्दे पर बात करना अच्छा लगता था.”
इस्मत चुग़ताई के पति शाहिद लतीफ़ फिल्म लेखक और निर्देशक थे. इस्मत भी फ़िल्मों से जुड़ी रहीं.
हनफ़ी कहते हैं, "उर्दू के लिखने वालों का एक ज़माने में बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री पर एक गहरा असर रहा है. प्रेमचंद से लेकर कृष्ण चंदर, राजेंदर सिंह बेदी सबने अपनी किस्मत फिल्म इंडस्ट्री में आज़माई. इस्मत आपा ने भी कोशिश की. उनकी लघु कहानियों पर फिल्में बनीं.”
सबरीना बताती हैं, "माँ और बाबा को कैमरा वर्क की बहुत अच्छी जानकारी थी. माँ तबला भी बहुत अच्छा बजाती थीं और संगीत सम्मेलनों में अक्सर हमें ले जाती थीं.”
सबरीना ने बताया कि इस्मत फिल्मों के लिए भी कॉस्ट्यूम तैयार करती थीं.
धर्म में फर्क़ नहीं

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इस्मत को अपने समय के मशहूर प्रगतिशील लेखकों में माना जाता है. उनके लेखन में धर्मनिरपेक्षता और आधुनिकता का ज़ोर रहा है.
सबरीना बताती हैं, “उन्होंने हम दोनों बहनों को विभिन्न धर्मों के बीच भेदभाव करना नहीं सिखाया. हम जहाँ रहते थे वह एक गुरुद्वारा था. वो अक्सर कहती थीं कि जाओ गुरुद्वारे में और माथा टेक कर आओ. बाइबिल से लेकर कुरान तक, हर मज़हब की किताबें उनके पास थीं.”
कई आलोचक इस्मत चुग़ताई के दौर को उर्दू कहानियों का गोल्डन पीरियड मानते हैं.
हनफ़ी कहते हैं, "सआदत हसन मंटो, कृष्ण चंदर, राजेंदर सिंह बेदी जैसे लेखकों के बीच इस्मत चुग़ताई एक ख़ास हैसियत रखती थीं. जिस ज़माने में मुसलमान औरतों के बीच शिक्षा आम नहीं थी.”
गर्म हवा की कहानी

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एमएस सथ्यू की मशहूर फिल्म ‘गर्म हवा’ (1973 ) इस्मत की कहानी पर बनी थी. फ़िल्म की स्क्रिप्ट शमा ज़ैदी और कैफ़ी आज़मी ने लिखी थी.
शमा ज़ैदी ने बताया, “एक बार हम बेदी साहब के साथ ‘एक चादर मैली सी’ के नाटक पर काम कर रहे थे. एक दिन बेदी साहब ने कहा की जो लोग बंटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं गए, इस पर फिल्म बनाओ. उन्होंने कहा कि इस्मत से कहानी लिखवाओ और स्क्रिप्ट तुम तैयार करो.”
उन्होंने बताया, “जब मैं कहानी लेने गई तो इस्मत चुग़ताई ने कहा कि घर की सफेदी के दौरान वो कहीं गुम हो गई है. और उन्होंने फिर से कहानी लिखी. लेकिन बाद में वो कहानी भी मिल गई. इस तरह फिल्म ‘गर्म हवा’ की कहानी दो कहानियों को मिलकर बनाई गई.”
बुर्क़ा के लिए नहीं कहा

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अपनी आत्मकथा ‘कागज़ी है पैरहन’ में इस्मत चुग़ताई ने ज़िक्र किया है कि जब पहली बार उन्हें बुर्का पहना तो उन्हें घुटन महसूस हुई थी.
सबरीना लतीफ़ बताती हैं, “उन्होंने हमें कभी बुर्क़ा पहनने के लिए नहीं कहा. वो कहती थीं कि हर इंसान को चुनाव करने का अधिकार है.”
वो कहती हैं, “उस समय उन्हें जिस तरह की पहचान मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिली क्योंकि उस समय अनुवाद नहीं होता था.”
सबरीना ने बताया कि इस्मत को उर्दू के भविष्य को लेकर चिंता रहती थी.
सबरीना ने बताया, “वो कहा करती थीं कि वक़्त के साथ उर्दू दम तोड़ देगी अगर इसके साहित्य को देवनागरी में नहीं लिखा गया, तो अब लोग उन्हें जानने लगे हैं अनुवाद उन तक पहुँचने लगा है."
वो कहती हैं, "अपने आखिरी दिनों में अम्मा कहा करती थी कि वक़्त कहता है कि मैं दुनिया से चली जाऊं, लेकिन दिल कहता है कि अभी ठहरना है.“
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