बिग बॉस में सलमान का 'स्त्री विरोध'

इमेज स्रोत, COLORS
- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
फ़िल्में, टीवी धारावाहिक, विज्ञापन.. ये सब माध्यम महिलाओं को लेकर समाज की सोच में बदलाव लाने का काम करते हैं.
बहुत सी बातें जिन पर समाज में खुलकर चर्चा नहीं होती थी, मास मीडिया के माध्यम से हमारे ड्राइंग रूम तक पहुँच चुकी हैं.
लेकिन कई बार इन माध्यमों का नकारात्मक रूप भी देखने में आता है. ये समाज की रुढ़िवादी सोच को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं.
जैसे हाल ही में बिग बॉस में फ़िल्म स्टार सलमान ख़ान ने कुछ ऐसी टिप्पणियाँ की जो स्त्री विरोधी लगती हैं.
पढ़ें लेख विस्तार से

इमेज स्रोत, AFP
लेखिका और पत्रकार मृणाल पांडे की एक मशहूर लाइन है, "प्रेशर कुकर के आविष्कार ने जितना औरतों की आज़ादी सुनिश्चित की है, उतना किसी और कारण ने नहीं."
सोप ओपेरा, फ़िल्में, रियलिटी शो, विज्ञापन- ये सब औरतों की तरफ़ समाज की जड़ सोच पर प्रहार करने की एक भूमिका में होते हैं.
कल तक कंडोम की बात तो दूर औरतों के स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी सैनिटरी नैपकीन की बात करना भी ‘वर्जित’ समझा जाता था.
आज विज्ञापनों के माध्यम से ये हमारे ड्राइंग रूम का हिस्सा हैं, जिन्हें हम अपने बग़ल में बैठे बुज़ुर्गों के साथ भी देखते हैं. यानी ये हमारी सोच, हमारी भाषा, हमारी संस्कृति में बदलाव ला रहे हैं .

इमेज स्रोत, Colors
दूसरी ओर, हम एक साथ बिग बॉस जैसे रियलिटी शो के खुलेपन और मध्य युग की औरतों की छवि गढ़ रहे सास-बहू धारावाहिकों की तरफ़ सहज होते हैं.
लेकिन सवाल है कि क्या हम खुलेपन के किसी तर्क से औरतों के ख़िलाफ़ माहौल तो नहीं बना रहे हैं, कहीं बड़ी मशक्कत से हासिल उनका स्पेस छीनने का जाना–अनजाना काम तो नहीं कर रहे?
‘बिग बॉस’ के इस साल और इससे पहले के सीज़न में शो के मेज़बान सलमान खान की भूमिका कुछ–कुछ ऐसी ही दिखी.
ताक-झांक और बिग बॉस

इमेज स्रोत, Colors
भारतीय टेलीविज़न में सबसे अधिक टीआरपी बटोरने वाले रियलिटी शो में से एक ‘बिग बॉस’ 2007 में शुरू हुआ.
‘बिग बॉस’ दर्शकों को दूसरों की ज़िंदगी में ताक झांक का मौक़ा देता है और इससे ही आती है इसकी टीआरपी.
‘बिग बॉस’ के दर्शक इस शो में शामिल लोगों के बेहद निजी रूटीन देख कर आनंद उठाते हैं.
सुबह अलसाई आँखें, स्विमिंग पूल में डांस, उनके रोमांस,उनके झगड़े, पीठ पीछे निंदा- दर्शक इन सबका आनन्द लेता है.
टीआरपी का गणित

इमेज स्रोत, COLORS
इस शो के होस्ट सलमान खान टीआरपी के इस गणित को ख़ूब हवा देते हुए देखे जाते हैं.
पिछले 29 नवंबर के एपिसोड में एक महिला प्रतिभागी (सोनाली राउत) के ख़िलाफ़ पुरूष प्रतिभागी (अली कुली मिर्ज़ा) की अश्लील टिप्पणियों के पक्ष में खुलकर आए.
उन्होंने अपने साप्ताहिक शो में पहले तो अली की खूब तारीफ़ की, उसे फिल्म मिलने की बधाई दी और फिर उन्हें दर्शकों की पहली पसंद बताया.
इसके साथ ही उन्होंने अली की टिप्पणी को लड़कों के बीच स्वाभाविक बातचीत का दर्जा दे दिया. उन्होंने सोनाली का मज़ाक बनाते हुए अपनी ओर से भी अश्लील टिप्पणी जड़ दी यह कहते हुए कि कम्बल के नीचे ‘उसने कपड़े नहीं पहने होते तो.'

इमेज स्रोत, Colors
सुप्रीम कोर्ट के वकील अरविंद जैन कहते हैं कि इस मामले में सलमान ख़ुद भी स्त्री उत्पीड़न के समान भागीदार नज़र आते हैं.
उस घटना पर सलमान ने बहुत चिर-परिचत दलील दोहराई कि ऐसी अश्लील बातों के सामने आने से बदनामी तो लड़की की हो रही है न. तो ये बात बाहर निकलनी ही नहीं चाहिए थी.
आश्चर्य है कि भारत का एक बड़ा हीरो इस तरह की बातें बिना किसी रोक-टोक के करता है और उस पर किसी भी कोने से विरोध की आवाज़ दर्ज नहीं होती.
विकसित हो रही नई भाषा

इमेज स्रोत, Colors
टेलीविज़न के मनोरंजन चैनलों पर दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध कर रहे विनीत कुमार कहते हैं, "आप यदि बिग बॉस के नियमित दर्शक हैं तो आपने देखा होगा कि होस्ट के रूप में सलमान उसी शख़्स की ज़्यादा चर्चा करते हैं, जो दर्शकों के बीच अपनी उटपटांग और बदतमीज़ हरकतों के बल पर टीआरपी बटोर रहे होते हैं."
विनीत के अनुसार बिग बॉस सहित दूसरे अन्य रियलिटी शो ने एक ऐसी भाषा को प्रोत्साहित किया है, जिसमें अश्लीलता के मायने बदल गए हैं.
‘तुम्हारी ले ली’, 'उसकी फट गई' जैसे सलमान के बोलों को अब स्वीकार किया जाता है. टपोरियों की भाषा अब ‘कुलीन’ रूप ले चुकी है, जो हमारी रोज़मर्रा की भाषा से लेकर राजनीति तक की भाषा में शामिल हो रही है.
जेंडर की भूमिका

इस शो में दर्शकों की रुचि तो है ही, पर राय बंटी हुई है. और ये राय साफ़ तौर पर इस मुद्दे पर भी बटी हुई है कि आप जेंडर के विषय पर किस तरफ़ खड़े है.
जेंडर पोज़ीशन के बावजूद बिग बॉस ऐसे कार्यक्रमों में है, जो बंद दरवाज़ों पर बदलाव की थाप भी दे रहे हैं.
‘बिग बॉस’ में साथ-साथ रह रहे भाग लेने वाले महिला और पुरूष, बिना स्त्री–पुरुष के भेद के एक ही कमरे में सार्वजनिक रूप से रहते-खाते, उठते–बैठते, जागते–सोते हैं.
क्या ‘जेंडर समाज’ के दरवाज़े पर ये बदलाव का चोट करते दृश्य नहीं है !
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link>पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












