फिर पर्दे पर लौटा 'सिंघम'

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- Author, मयंक शेखर
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
रेटिंग: *1/2
ऐसी फ़िल्में जिनको बारीक़ी से, बड़ी सतर्कता से सिर्फ़ हिट कराने के मकसद से बनाया जाता है, वो कई बार ज़्यादा निराश करती हैं. और 'सिंघम रिटर्न्स' कोई अपवाद नहीं है.
महाराष्ट्र की भ्रष्ट राजनीति को साफ़ करने और भ्रष्टाचारियों का सफ़ाया करने बड़े पर्दे पर तीन साल बाद लौटा है सिंघम.
लेकिन इससे निपटने के उसके तरीक़ों पर बड़ा सवाल है. जिस अराजक तरीके से वो और उसके साथी पुलिस वाले सड़कों पर उतरते हैं, मारपीट करते हैं, सिस्टम के ख़िलाफ़ एक तरह से विद्रोह छेड़ देते हैं, ये अवधारणा ही बड़ी चिंताजनक है.

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फ़िल्म में चंद्रास्वामी की तर्ज पर एक धर्म गुरू (अमोल गुप्ते) हैं जो राज्य के मुख्यमंत्री से भी ज़्यादा ताकतवर हैं. मीडिया भी उनके इशारे पर नाचता है.
एक नामी पत्रकार की तर्ज पर फ़िल्म में एक टीवी रिपोर्टर हैं जो हमेशा किसी स्कैंडल की तलाश में घूमती रहती हैं.
जनता क्या करे? वो रिश्वत देकर वोट ख़रीदने वाले नेताओं के चंगुल में फंस जाती है.
फ़िल्म के एक सीन में एक ग़रीब महिला सिंघम (अजय देवगन) से कहती है कि उसके लिए ज़्यादा ज़रूरी ये है कि अगले पांच दिन के लिए वो परिवार के खाने का इंतज़ाम करे ना कि इस बात कि चिंता करे कि अगले पांच साल के लिए सरकार कौन बनाएगा ?
पुराना फ़ॉर्मूला

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ऐसे में जनता के लिए मसीहा बनकर सामने आता है 'फ़कत' बाजीराव सिंघम (अजय देवगन).
नब्बे के दशक में भी जब दूसरे हीरो स्विटज़रलैंड की हसीन वादियों में हीरोइन के साथ रोमांस फरमाने और एनआरआई जनता को लुभाने में व्यस्त थे तब भी अजय देवगन भारत की 'ग़रीब, पीड़ित' जनता को इंसाफ़ दिलाने के मिशन में जुटे थे और इसके गवाह थे छोटे शहरों के सिंगल स्क्रीन सिनेमाहॉल के दर्शक.

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ये तो पिछले पांच साल में ही चलन बदला है, जब दक्षिण भारतीय एक्शन फ़िल्मों ने बॉलीवुड को कुछ यूं लुभाया कि हर हीरो 'अता मांझी सटकली' नुमा एक्शन फ़िल्में करने लगा है.
तमिल और तेलुगू फ़िल्मों के इन रीमेक में हर अगली फ़िल्म, पिछली फ़िल्म से ज़्यादा 'ओवर द टॉप' नज़र आती है.
नाममात्र की पटकथा

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इस किस्म की फ़िल्मों में पटकथा स्टंट दृश्यों के बीच के गैप को भरने के काम आती है, बस इससे ज़्यादा कुछ नहीं.
'सिंघम रिटर्न्स' देखने जाना है तो कुर्सी आराम से पीछे करें. रुई कान में ठूंसे. मुमकिन हो तो एक हेलमेट साथ ले जाएं. क्योंकि एक साथ इतनी बंदूकें चलती हैं, इतनी गोलीबारी होती है कि उसकी आवाज़ से आपके दिमाग में भी छेद होने का डर पैदा हो जाता है.
और अगर इन सब बातों को झेल सकते हैं तो मज़े उठाएं 'सिंघम रिटर्न्स' के.
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