फ़िल्म रिव्यू: 'सिटीलाइट्स' की हलचल

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- Author, कोमल नाहटा
- पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
रेटिंग :**
फॉक्स स्टार स्टूडियोज़ और विशेष फ़िल्म्स की सिटीलाइट्स' एक ग़रीब दुकानदार दीपक (राजकुमार राव) की कहानी है जो अपनी पत्नी राखी (पत्रलेखा) और बेटी मालती (बेबी वैभवी उपाध्याय) के साथ बेहतर जीवन की तलाश में मुंबई आता है.
लेकिन मुंबई आते ही उनके संघर्ष का सिलसिला शुरू हो जाता है.
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ज़िंदगी उनके लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है और राखी को न चाहते हुए भी मजबूरी में एक बार में डांसर का काम करना पड़ता है.
दीपक को एक सिक्योरिटी एजेंसी में ड्राइवर का काम मिल जाता है.
एक दिन एजेंसी का सुपरवाइज़र (जिसने दीपक को काम दिलाया था) वो एजेंसी के मालिक म्हात्रे का सेफ खोलकर उसमें रखा पैसा लूटने में दीपक की मदद मांगता है.
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दीपक हिचकिचाते हुए आख़िर उसकी मदद को तैयार हो जाता है. लेकिन काम पूरा होने से पहले ही सुपरवाइज़र मारा जाता है. आगे क्या होता है ?
क्या दीपक पैसे लूट पाता है ? वो उन पैसों का क्या करता है ? क्या दीपक अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर पाता है ? यही फ़िल्म की कहानी है.
मौलिक कहानी नहीं

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फ़िल्म ब्रिटिश फ़िल्म मेट्रो मनीला की रीमेक है. रितेश शाह ने फ़िल्म का अडैप्टेड स्क्रीनप्ले लिखा है.
फ़िल्म में दर्शकों को परोसने के लिए ज़्यादा मौलिकता नहीं है. ऐसी फ़िल्में, जिसमें मुख्य किरदार छोटे शहर से किसी बड़ी जगह आता है और अपराध की दुनिया में प्रवेश कर जाता है, पहले भी बहुत बनी हैं.
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साथ ही हीरोइन के मजबूरी में बार डांसर बनने की कहानी पहले भी कई बार पर्दे पर उतारी जा चुकी है.
कहानी का आख़िरी हिस्सा ज़रूर दिलचस्प बन पड़ा है. बाकी फ़िल्म दर्शकों को एंगेज तो ज़रूर रखती है लेकिन उन्हें हिला नहीं पाती.
फ़िल्म में कोई सस्पेंस भी नहीं है. रितेश शाह के लिखे संवाद ज़रूर अच्छे हैं.
अभिनय

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दीपक के मुख्य किरदार में राजकुमार राव ने बढ़िया काम किया है. वो किरदार में पूरी तरह से घुस गए हैं. उन्होंने गुस्से, डर और झुंझलाहट के भाव बखूबी पर्दे पर उतारे हैं.
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पत्रलेखा ने भी अपने करियर की बेहतरीन शुरुआत की है. मनन कौल ने सिक्योरिटी एजेंसी के सुपरवाइज़र का रोल भी बेहतरीन तरीके से निभाया है.
बाल कलाकार बेबी वैभवी ने भी बढ़िया काम किया है.
निर्देशन

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हंसल मेहता ने विषय को काफी संवेदनशील तरीक़े से उठाया है. उन्होंने विषय को स्वाभाविक तरीके से परोसा है लेकिन फ़िल्म एक बेहद सीमित दर्शक वर्ग को ही अपील कर पाएगी.
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जीत गांगुली का संगीत फ़िल्म का मज़बूत पक्ष है. 'सोने दो' और 'मुस्कुराने की वजह' बेहतरीन गाने हैं. 'एक चिरैया भी' अच्छा बन पड़ा है.
कुल मिलाकर सिटीलाइट्स एक सीमित अपील वाली फ़िल्म है. ये मल्टीप्लेक्सेस में अच्छा व्यापार कर सकती है.
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