बहुत ईमानदार हैं गुलज़ार साहब : सलीम आरिफ़

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- Author, विदित मेहरा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'मैं आज भी मिर्ज़ा ग़ालिब की कमाई खा रहा हूं.' एक दफ़ा गुलज़ार ने अपने बारे में यही कहा था.
ग़ालिब के ज़बरदस्त मुरीद गुलज़ार ने 80 के दशक में 'मिर्ज़ा ग़ालिब' नाम का एक मशहूर टीवी कार्यक्रम दूरदर्शन के लिए बनाया था, जिसमें मिर्जा ग़ालिब की केंद्रीय भूमिका निभाई थी नसीरुद्दीन शाह ने.
तब इस कार्यक्रम के ज़रिए गुलज़ार के संपर्क में आए सलीम आरिफ़, जिन्होंने इस शो के लिए डिज़ाइनिंग का काम किया था.
रंगमंच की दुनिया के जाने माने निर्देशक सलीम आरिफ़ ने 'ताजमहल का टेंडर', 'ग़ालिबनामा', 'बयाने ग़ालिब' जैसे कई चर्चित नाटकों का निर्देशन किया है.
आरिफ़ जब से गुलज़ार के संपर्क में आए तब से उनसे अभिभूत हैं.
'ईमानदारी है बहुत बड़ी ताक़त'
सलीम आरिफ़ के मुताबिक़गुलज़ारअपनी हर कविता को बड़े रचनात्मक तरीक़े से लिखते हैं और जो कलाकार उस रचनात्मक अंदाज़ में छुपी हुई ख़ूबसूरती को देखकर उससे समझ लेता है वही उसका असली लुत्फ़ उठा सकता है.

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पर गुलज़ार साहब में ऐसी कौन सी चीज़ है, ऐसी कौन सा भाव है जो उन्हें सब कलाकारों से बिल्कुल अलग कर देता है?
इस सवाल पर सलीम बोले, "जिस ईमानदारी के साथ वो अपने ख़्यालात को लिखते हैं वो उनकी बहुत बड़ी ताक़त है. जब वो अकेले बैठकर कुछ लिख रहे होते हैं और फिर वो जब हमें उस बारे में बताते हैं, तो उसकी जो मानवीयता है, सच्चाई है जो हम तक पुहंचती है वो सबसे ज़्यादा अहम होती है."
वो आगे कहते हैं,"गुलज़ार साहब आज भी समय के साथ चलते हैं. वो आज भी बाज़ार में आई नई किताब पढ़ते हैं और अगर उनसे कोई किताब छूट जाती है या वो पढ़ना भूल जाते हैं तो उन्हें जब भी वक़्त मिलता है वो उस दौरान उन किताबों को पढ़ते हैं."
"वो जिस तरह से अपने आपको ताज़ा रखते हैं और दूसरी कला को समझकर ख़ुद की कलात्मक दृष्टि को और बढ़ाना, ये भी उनकी एक बेहतरीन ख़ूबी है."
रंगमंच पर भी छाए गुलज़ार
सलीम आरिफ़ को श्रेय जाता है गुलज़ार की रचनाओं को रंगमंच के ज़रिए उनके प्रशंसकों तक पहुंचाने का.
सलीम आरिफ़ कहते हैं, "देखिये हुआ यूं कि गुलज़ार साहब की कुछ नज़्में थीं, कहानियां थी जो मुझे लगा कि लोगों तक पहुंचनी चाहिए. मुझे लगा कि स्टेज पर अगर हम इन्हें पेश करें तो बहुत कारगर साबित होंगे."
वो आगे कहते हैं,"हमने उनका एक शो उनकी कविताएं और कहानियों को मिलाकर तैयार किया जिसका नाम था 'ख़राशें' और वो सांप्रदायिक दंगों पर था. और उसमें दिखाया गया कि कैसे एक आदमी उन चीज़ों का शिकार हो जाता है जो उसने खुद नहीं बनाई है. इस भाव को गुलज़ार साहब ने अपनी कविताओं में बहुत ही सुंदर तरीक़े से लिखा है."
"इसी तरह उन्होंने भारत और पाकिस्तान के लगातार बदलते रिश्तों पर जो काम किया है हमने उसे लकीरें नाम के एक नाटक के रूप में पेश किया जो बड़ा कामयाब रहा."
'उर्दू शायर जो पारम्परिक उर्दू के नहीं'
गुलज़ार बहुत से अलग-अलग शायरों की किताबें पढ़ते हैं. उनकी कविताओं में, कहानियों में कई विभिन्न प्रकार के भाव देखने को मिल जाते हैं.

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क्या ये भाव उनके अपने होते हैं या ये किसी दूसरे शायर या कवि से थोड़े मिलते जुलते हैं?
इस बात पर सलीम आरिफ़ बोले,"आपको जानकार ये ताज्जुब होगा कि जो गुलज़ार साहब का लहज़ा है और जो गुलज़ार साहब के अल्फ़ाज़ का चुनाव है, वो बिलकुल उनका अपना है. ये वाहिद उर्दू के कवि होंगे जो की पारम्परिक उर्दू के लहज़े में नहीं हैं. लेकिन फिर भी आप उन्हें जब पढ़ते हैं तो आपको ऐसा लगता है कि यहां कुछ अलग बात हो रही है. एक अलग सोच आप तक पुहंच रही है."
गुलज़ार की तुलना किसी दूसरे कवि से करने की बात पर सलीम ने कहा,"देखिये गुलज़ार साहब की तुलना किसी दूसरे कवि से करना ज़्यादती होगी दोनों के लिए. गुलज़ार साहब जैसा कोई नहीं है. और वो उन सभी उभरते कलाकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है जो पारंपरिक चीज़ों से हटकर कुछ अलग करना चाहते हैं."
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