छोटी फ़िल्मों ने किया चीन की नाक में 'दम'

चीन में माइक्रोब्लॉगिंग फ़िल्मों ने धूम मचा दी है.
माइक्रोब्लॉगिंग यानी छोटी फ़िल्में. बड़े पर्दे की फ़िल्मों पर कई तरह की पाबंदियों और फ़िल्म समारोहों के स्वतंत्र आयोजन पर रोक के कारण फ़िल्म प्रेमियों के बीच छोटी फ़िल्में ख़ासी लोकप्रिय हो रही हैं.
किन्नर से जुड़े बेहद संवेदनशील विषय पर बनी फ़िल्म ‘माई वे’ को जब मुख्यधारा की फ़िल्मों में जगह नहीं मिली तो इसे <link type="page"><caption> चीन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130727_china_job_zodiac_sign_vr.shtml" platform="highweb"/></link> के ‘यू ट्यूब’ संस्करण ‘याऊकू’ पर दिखाया गया.
जल्द ही 40 लाख से ज्यादा लोगों ने इसे देख डाला. इसके कमेंट सेक्शन में ज़ोरदार बहस भी हुई.
‘माई वे’ फ़िल्म के निर्देशक अन हुई बताते हैं, “अगर यह फ़िल्म मुख्यधारा में दिखाई जाती तो मुझे इसके लिए पैसे जुटाने में दिक्क़त होती. अब न तो बॉक्स ऑफ़िस की चिंता है और न ही कारोबार की. मैं विषय के साथ अब ज्यादा ईमानदारी बरत सकता हूं.”
ऑनलाइन क्रांति की सुगबुगाहट
चीन में बॉक्स ऑफ़िस की कमाई एक तरफ़ तो क़रीब 17 लाख 90 हज़ार डॉलर तक पहुंच गई है. वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन क्रांति की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है.
<link type="page"><caption> चीनी भाषा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130731_china_heat_ap.shtml" platform="highweb"/></link> में डब की हुई लघु फ़िल्में यानी ‘माइक्रो मूवीज’ घर में लगे कंप्यूटर, स्मार्टफ़ोन और टेबलेट्स पर देखी जा रही हैं.
सरकार की सख्त सेंसरशिप, स्टूडियो के वर्चस्व और कारोबारी मजबूरियों के कारण ऑनलाइन बन और दिखाई जा रही लघु फिल्में निर्देशकों के लिए संभावनाओं के नए दरवाज़े खोल रही हैं.
<link type="page"><caption> ऑनलाइन आजादी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130811_online_abuse_children_an.shtml" platform="highweb"/></link> ने विवादास्पद, कलात्मक और बोल्ड विषयों पर बनी फ़िल्मों की क़तार लगा दी है.
लोगों का कहना है कि चीन का सरकारी मीडिया मनोरंजन की आड़ में अक्सर सुस्त और उबाऊ चीज़ें परोसता है. दर्शकों को इन लघु फ़िल्मों की वजह से उबाऊ चीज़ों से राहत मिली है.
भागदौड़ भरी ज़िंदगी

चीन के महानगरों में भारी ट्रैफ़िक जाम में लाखों लोग घंटों फंसे रहते हैं. वे मन बहलाने के लिए स्मार्टफ़ोन पर चिपके रहते हैं.
बीजिंग के स्थानीय निर्देशक अना शी कहते हैं, “यहां जीवनशैली बेहद व्यस्त है. ट्रैफ़िक का हाल बुरा है. हर जगह लाइन लगानी पड़ती है. ऐसे में इन लघु फ़िल्मों से लोगों को चंद घड़ी की राहत मिल जाती है.”
लोगों के बीच <link type="page"><caption> लघु फ़िल्मों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2013/03/130318_priyankawomen_bollywood_dk.shtml" platform="highweb"/></link> की लोकप्रियता ऐसी है कि 2011 में मुख्यधारा की 500 फ़ीचर फ़िल्मों की तुलना में दो हज़ार से ज्यादा लघु फ़िल्में बनीं.
चीन के नेटवर्क सूचना केंद्र (चीनी सरकार की इकाई) के मुताबिक़ 2012 में इंटरनेट पर आने वाले लोगों की संख्या पिछले साल के मुक़ाबले 20 फ़ीसदी बढ़ गई. पोर्टेबल डिवाइसों पर वेब तक पहुंचने वाले लोग 59.1 करोड़ हो गए.
चीनी इंटरनेट मार्केटिंग कंपनी ‘आईसर्च’ के अनुसार जनवरी 2013 में 45.2 करोड़ लोगों ने ऑनलाइन वीडियो देखे.
ये लघु फिल्में इसलिए भी चर्चित हो रही हैं कि इन्हें बड़ी आसानी से दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ साझा किया जा सकता है. ‘माई वे’ को भी इसी वजह से करोड़ों हिट मिलें.
युवाओं की कहानी
‘माई वे’ की ही तरह ‘ओल्ड ब्यॉज़’ को भी करोड़ों लोगों ने नेट पर देखा. यह 2010 के अंतिम महीनों में बनी 43 मिनट की माइक्रो फ़िल्म है. ‘ओल्ड ब्यॉज़’ युवा वर्ग की आशाओं, आकांक्षाओं, नाकामियों और टूटे हुए सपनों की कहानी है.
युवा पीढ़ी को अपनी ओर खींचने वाले प्यार, रिश्ते, पढ़ाई और नौकरी जैसे विषयों पर छोटी फ़िल्में ज्यादा बन रही हैं.
माइक्रो फ़िल्म की ही तरह माइक्रो वेब सीरियल भी सफल हो रहे हैं. उदाहरण के लिए ‘हिप हॉप ऑफिस क्वॉर्टर’. यह एक दफ्तर में काम करने वाले चार दोस्तों की कहानी है.
इस माइक्रो वेब सीरियल को चीन के ‘यू ट्यूब’ संस्करण ‘याऊकू’ पर 20 करोड़ लोगों ने देखा. इसे इतना पसंद किया गया कि अब इसका पांचवां सीजन लाने की तैयारी चल रही है.
‘याऊकू’ के प्रतिनिधि जीन शाओ ने बताया, "यह सीरियल युवाओं के जीवन और उनकी भाषा के करीब है. यह सीसीटीवी (सरकारी टीवी) पर दिखाए जाने वाले सीरियल से एकदम अलग है.“
छोटा मगर आदर्श रूप

<link type="page"><caption> माइक्रो फिल्में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/07/130705_tv_show_film_shahrukh_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link> युवा निर्देशकों के लिए भी खुला आकाश साबित हो रही हैं. क्या आप फिल्म बनाना चाहते हैं? यदि हां, तो आपके पास बस एक वीडियो कैमरा होना चाहिए.
अब फिल्म बनाइए और उसे इंटरनेट पर डाल दीजिए. प्रतिक्रयाएं तुरंत आने लगती हैं. आपको फीडबैक के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ता.
कारोबार की नई ऊंचाइयों तक पहुंचने के कारण माइक्रो फिल्म समारोहों की बाढ़ आ गई है. इंटरनेट सेवा उपलब्ध करवाने वाले ‘टेनसेंट’ और ‘याऊकू’ जैसी कंपनियां अब अपनी फिल्में बना रही हैं.
शाओ बताते हैं, "स्टूडियो आपके काम को पहचाने और फिल्म से पैसे बने, वह वक्त आने के पहले फिल्म बनाने वालों को कई साल गुमनामी में बिताने पड़ते थे. मगर अब आपको बस इतना करना है कि अपनी फिल्म अपलोड कीजिए और पैसे बनाइए.”
हालांकि सरकारी सेंसरशिप छोटी फिल्मों के पंख कतरने की कोशिश में है. पिछले साल सरकारी रेडियो, फिल्म और टेलीविजन से जुड़ी चीनी सेशरशिप ने माइक्रो फिल्मों और वीडियो सामग्री पर यह कहते हुए नई पाबंदियां लगाईं कि वे इसके ज़रिए अपने हितों को बढ़ावा दे रहे हैं.
मगर इंटरनेट पर सरकार का नियंत्रण टेढ़ी खीर साबित हुआ. इंटरनेट पर डाली जाने वाली बेहिसाब सामग्रियों के कारण उन पर कड़ी नज़र रखा जाना संभव नहीं है.
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