कैसे सीखी विद्या ने पंजाबी और दीपिका ने तमिल?

- Author, कल्पना शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दिनों रिलीज़ हुई फ़िल्म 'घनचक्कर' में विद्या बालन ने मुंबई में रहने वाली एक पंजाबी महिला का किरदार निभाया जिसके लिए उन्होंने पंजाबी भाषा की ट्रेनिंग ली.
वहीं आने वाली फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' में दीपिका पादुकोण तमिल बोलती हुई नज़र आ रही है और 'भाग मिल्खा भाग' में फ़रहान अख़्तर पंजाबी बोल रहे हैं.
हिंदी फ़िल्मों में प्रादेशिक बोली का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. 'गंगा जमुना' में दिलीप कुमार ने ऐसी फ़र्राटेदार भोजपुरी बोली है कि उसे 'हिंदी-कम-भोजपुरी' फ़िल्म कहना ग़लत नहीं होगा.
'गुमनाम' फ़िल्म में हैदराबादी महमूद और 'मुग़लेआज़म' में उर्दू बोलने वाले किरदार फ़िल्म में एक मौलिकता पैदा करते हैं. वहीं पिछले सौ सालों में कई ऐसी फ़िल्में भी आई जहां बोली को लेकर 'होमवर्क' नदारद दिखा.
बड़े स्क्रीन पर सितारों द्वारा बोली गई किसी प्रादेशिक भाषा या लहजे के पीछे की मेहनत कभी रंग लाती है तो कभी नहीं.
बॉलीवुड बनाम हॉलीवुड

जब भाषा की तैयारी की बात होती है तो अक्सर बॉलीवुड की तुलना विदेशी फ़िल्में ख़ासतौर पर हॉलीवुड से की जाती है.
फ़िल्म समीक्षक अरनब बनर्जी कहते हैं, "देखिए हॉलीवुड की फ़िल्मों का बजट इतना होता है कि कलाकार आराम से एक साल तक सिर्फ़ बोली सीखने में ही बिता सकता है."
वहीं हिंदी फ़िल्मों की बात करते हुए अरनब कहते हैं, "यहां पर फ़िल्मकार की कोशिश होती है कि पूरे भारत में उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सबको फ़िल्म समझ आए और पसंद भी आए. इसलिए भाषा पर इतनी तवज्जो नहीं दी जाती है."
हालांकि अरनब ये भी मानते हैं कि बोली की समस्या तो बाहर भी है.
जब ब्रिटिश कलाकारों को हॉलीवुड का कोई किरदार निभाना पड़ता है तो उन्हें अपना ब्रितानी उच्चारण छोड़कर अमरीकी लहजा पकड़ना पड़ता है जो कि काफ़ी मुश्किल होता है.
ऐसे में कई बार कलाकार को एक नई भाषा सीखने से पहले बहुत कुछ भूलना भी पड़ता है.
जैसे 2007 में रिलीज़ हुई ब्रितानी फ़िल्म 'ब्रिक लेन' में ब्रिटिश कलाकार क्रिसटॉफर सिम्पसन ने एक बांग्लादेशी अप्रवासी का रोल निभाया जो लंदन में आकर बस जाता है.
अरनब बताते हैं कि इस रोल के लिए सिम्पसन ने पहले अपना असल ब्रिटिश उच्चारण छोड़ा और फिर वो लहजा सीखा जिस तरह एक बांग्लादेशी अप्रवासी बात करेगा.
लाइन नहीं बदलेगी, ख़ुद को बदलो

पिछले साल रिलीज़ हुई फ़िल्म पान सिंह तोमर में बुंदेलखंडी और बृज भाषा के प्रयोग की काफ़ी तारीफ़ की गई थी.
फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान को बुंदेलखंडी सिखाने वाले हेमंत शर्मा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "कलाकार कितनी जल्दी भाषा सीखेगा ये पूरी तरह उसी पर निर्भर करता है. इरफ़ान ने तो एकदम गुरु-शिष्य की तरह ही मुझसे भाषा सीखी लेकिन जिन्हें सीखने में थोड़ी भी दिक्क़त होती थी, उनके लिए मेरे पास एक अलग नुस्ख़ा था."
हेमंत बताते हैं, "जिन्हें सीखने में परेशानी होती है उनसे मैं सेट पर हिंदी में बात ही नहीं करता. मैं उनसे बुंदेलखंडी में ही बात करता था जैसे चलौ खाना खाते हैं, नाश्ता-वाश्ता करौ ? धीरे-धीरे उनको शब्द सुनाई देते रहे और उन्होंने बोली की साउंड पकड़ ली."
वहीं फिल्म 'शंघाई' में अभय देओल को तमिल बोली सिखाने वाले मदियालगन सुब्बैया कहते हैं, "तमिल भाषा में एक कहावत है कि गाय से अगर दूध निकालना है तो अगर वो गाने की भाषा समझती है तो गाकर दूध निकालो और अगर नाच की भाषा समझती है तो नाचकर निकालो. कलाकारों के साथ भी कुछ ऐसा ही करना पड़ता है."
हालांकि सुब्बैया ने ये भी माना कि कलाकार अपनी मातृभाषा में इतने ढले रहते हैं कि उन्हें कोई अन्य भाषा सिखाना मुश्किल हो जाता है.
कई बार तो चिढ़कर अभिनेता बोल देता है कि लाइन ही बदल दो लेकिन फिर मैं भी बोल देता हूं कि लाइन तो नहीं बदलेगी, आप ख़ुद को ही बदल लो.
सतही किरदार दिखाना
कई बार फ़िल्मों पर ये आरोप भी लगते आए हैं कि किसी क्षेत्र विशेष के किरदार को निभाने की 'कोशिश' में अक्सर रोल सतही या हास्यास्पद बनकर रह जाते हैं.

1990 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'अग्निपथ' में मिथुन चक्रवर्ती को कृष्णन एय्यर एम.ए के किरदार के लिए फ़िल्मफेयर पुरस्कार दिया गया था. वहीं कई आलोचक आज भी उनके रोल को 'लाउड' बताने में हिचकते नहीं है.
यही नहीं पिछले दिनों फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' के ट्रेलर में दीपिका द्वारा बोली जा रही तमिल को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.
यहां तक की 'घनचक्कर' में विद्या बालन द्वारा बोली गई पंजाबी भी समीक्षकों की टिप्पणियों से बच नहीं पाई है.
हालांकि विद्या को पंजाबी सिखाने वाले सुमित भटेजा बचाव करते हुए कहते हैं, "ये भाषा की समस्या नहीं है ये किरदार की एक विशेषता थी जो निर्देशक ने तय की थी. जैसे पंजाबी लोग अपनी बातचीत में 'हैं' का इस्तेमाल करते हैं तो निर्देशक को लगा कि ये महिला भी ऐसे ही एक तकिया कलाम को इस्तेमाल करती है."
वहीं दीपिका को तमिल बोली का प्रशिक्षण देने वाले सुब्बैया भी मानते हैं कि ये दर्शकों के दिमाग़ में एक किरदार को सेट करने का तरीका है. अगर उसी बोली में कॉमेडी बन रही है तो इसमें ग़लत क्या है ?
भारत की विविधता पर खरे उतरने की कोशिश में हिंदी फ़िल्मों में प्रादेशिक भाषा अक्सर पिछली सीट पर चली जाती है. शायद थोड़ा वक़्त, थोड़ा पैसा और थोड़ी और मेहनत की जाए तो दर्शकों और समीक्षकों दोनों को ख़ुश किया जा सकता है.
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