लैंगिकता से परे है ऋतुपर्णो घोष की पहचान

- Author, दीपा गहलोत
- पदनाम, नाट्य एवं फिल्म विभाग, एनसीपीए
इसमें कोई शक नहीं कि <link type="page"><caption> ऋतुपर्णो घोष</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2009/07/090712_rituparno_tc2.shtml" platform="highweb"/></link> बंगाल के और भारत के बेहतरीन फिल्म निर्देशकों में से एक थे. बीस साल के अपने फिल्म करियर में उन्होंने 24-25 फिल्में बनाईं और हाल में कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया.
इसके अलावा वह लेखक और कवि भी थे और बंगाल के सबसे प्रभावशाली लोगों में उनकी गिनती होती थी.
कुछ समीक्षकों का यह भी कहना था कि उन्होंने बंगाल के साहित्य और फिल्म शैली को दुनिया तक पहुँचा कर, सत्यजीत रे की विरासत को आगे बढ़ाया था. लेकिन उनकी असमय मौत के कुछ वर्षों पहले वह फिल्म निर्माता कम और <link type="page"><caption> एलजीबीटी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/11/121123_missgay_venezuela_picgallery_sa.shtml" platform="highweb"/></link> (लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के प्रतीक ज्यादा बन गए थे.
स्त्री मन की समझ
अपनी दूसरी फिल्म उनिशे अप्रैल के लिए, जो माँ-बेटी के रिश्तों के बारे में थी, उन्हें <link type="page"><caption> राष्ट्रीय पुरस्कार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130318_national_award_gallery_va.shtml" platform="highweb"/></link> मिला. लेकिन तीसरी फिल्म दहन के बाद तो उनकी प्रतिष्ठा आसमान छूने लगी और उन्हें चुनिंदा पुरुष निर्देशकों में शामिल होने का श्रेय मिलने लगा, जिन्हें महिला मनोविज्ञान की सटीक समझ थी.
दहन एक सच्ची घटना पर आधारित थी और आज भी प्रासंगिक है, जब हमारे समाज और मीडिया में स्त्रियों के प्रति हिंसा को लेकर गर्मागरम बहस चल रही है.
इस फिल्म में एक लड़की दूसरी लड़की के साथ दुर्व्यवहार होता हुआ देखती है और चाहती है कि दोषियों के सजा मिले, लेकिन कोई इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता है.
संवेदनशीलता

अपनी अगली फिल्म बाड़ीवाली ने उनके फिल्मों के नारीवादी पक्ष को और मजबूत किया. इस फिल्म में उन्होंने संवेदनशील ढंग से अधेड़ विधवा के जीवन के एकांत को पर्दे पर उतारा, जिसका सहज वजूद उस समय बाधित हो जाता है जब वह एक फिल्म यूनिट को अपनी जर्जर हवेली की शूटिंग करने की इजाजत दे देती है.
ऋतुपर्णो का वर्णन बेहतरीन था और जिस खूबसूरती से महिला मुख्य पात्र के दिल को पर्दे पर हूबहू उतारा गया, ऐसा वह ही कर सकते थे.
पहले से ही उनका व्यक्तित्व आकर्षक था. वह हमेशा बंगाली स्टाइल की चुन्नट की धोती पहनते थे, और बारीक काम वाले कुर्ते, जो रबिन्द्रनाथ टैगोर के पहनावे से प्रेरित थे. लेकिन शुरू में उनकी समलैंगिक प्रवृत्ति के बारे में पता नहीं था.
लैंगिक वरीयता
अफवाह तो थी और मजाक भी लेकिन उनकी फिल्मों की सफलता और इतने सारे पुरस्कारों ने लोगों की जुबान बंद कर रखी थी.
उनकी हर फिल्म में सहज लेकिन विस्तृत संवादों के जरिए स्त्री-पुरूष के संबंधों को इतनी बारीकी से दर्शाया गया था कि यह सोचना असंभव था कि उन्होंने वास्तव में उस छटपटाहट को स्वयं अनुभव नहीं किया है.
मुंबई अपनी उदारवादी छवि पर गर्व करती है, लेकिन यहाँ भी वैकल्पिक लैंगिक वरीयता को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है. तो फिर रूढ़िवादी कोलकाता में तो ‘सामने आने’ के लिए बहुत अधिक साहस की जरूरत है. इस समय वह बंगाल में एक चमकते सितारे बन चुके थे- एक फिल्म स्टार, जिसने बॉलीवुड में पैठ बना ली थी और जिसे बच्चन परिवार का समर्थन हासिल था.
उन्होंने सार्वजनिक रूप से क्रॉसड्रेसिंग करके, मेकअप लगाकर, पगड़ी और खूबसूरत दुपट्टों का इस्तेमाल शुरू कर पूर्वाग्रहों को चुनौती दी.
लोगों की प्रतिक्रिया

अपनी लैंगिकता को स्वीकार कर उन्हें एक अलग किस्म का प्रशंसक वर्ग मिला, लेकिन उनके करीबी लोगों ने उनसे कुछ दूरी भी बना ली, और उन्हें मिला एक अकेलापन, जिसे उन्होंने दुखी मन से स्वीकार भी किया.
उनके बारे में अप्रिय चुटकुले बनने लगे.हालाँकि शीर्ष अभिनेत्रियाँ (राष्ट्रीय पुरस्कार की उम्मीद में) उनके साथ काम करने के लिए उतावली थीं, लेकिन फिल्म उद्योग में अंतर्निहित होमोफोबिया को समझते हुए वह इस बात को लेकर सतर्क थे कि वह मर्द कलाकारों के साथ कैसे बातचीत कर रहे हैं.
आखिरी चाहत
उनकी हालिया फिल्म में उनकी लैंगिकता को अभिव्यक्ति मिली, जिसमें उन्होंने अभिनय भी किया- अर एकती प्रीमर गोल्पो, मैमोरिज़ इन मार्च और चित्रांगदा. ऋतुपर्णो ने स्त्री की तरह दिखने के लिए कुछ सर्जरियाँ करवाईं और हॉर्मोन थेरेपी का सहारा भी लिया.
इन फिल्मों को बनाने और खुद को सबके निशाने पर रखने के पीछे उनकी राजनीतिक मंशा भी थी. उनका व्यक्तित्व फीका और सावधानीपूर्ण हो चुका था, और वह पूरी तरह से स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगे थे, लेकिन वह जानते थे कि वह अपने सेलेब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल एलजीबीटी समुदाय के लिए कर सकते हैं.
महान कलाकार

उन्होंने जो भी किया वह साहस की एक दास्तान बन गई. लेकिन एक फिल्म निर्माता के रूप में उनकी उत्कृष्ट प्रतिभा, सौन्दर्य शास्त्र और साहित्य तथा मानवता को लेकर उनकी गहरी समझ को महज उनकी लैंगिक वरीयता से जोड़कर देखना दु:खद है.
एलजीबीटी समुदाय को अपने सबसे बड़े समर्थक के जाने का गम है, जिन लोगों ने उनके साथ काम किया वे भी दु:खी है. लेकिन ऋतुपर्णो जैसे निर्देशकों का जाना पूरे समाज की क्षति है- वह समाज जिसे उन्होंने अपनी फिल्मों में बेहद खूबसूरती और साहस के साथ दर्शाया.
ऋतुपर्णो घोष केवल गे फिल्म निर्माता नहीं थे, बल्कि लैंगिकता से परे वह एक महान फिल्म निर्माता और कलाकार थे.
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