बॉलीवुड को ज़बान संभालने की ज़रूरत?

करीना कपूर,अभिनेत्री

वर्ष 2012 मे यू-ट्यूब के शीर्ष 10 वीडियो की लिस्ट में पंजाबी रैपर हनी सिंह का नाम सबसे ऊपर था.

2013 के दो दिन पहले हनी सिंह ने अपना नया गाना निकाला है और यू ट्यूब पर एक हफ्ते में उसे 17 लाख से अधिक हिट्स मिले हैं.

हनी सिंह के गानों के खिलाफ चल रहे विरोध का असर उनके प्रशंसकों पर पड़ा है या नहीं इसका अंदाज़ा ऊपर दी गई जानकारी से लगाया जा सकता है.

लेकिन इस पूरे तमाशे में अगर कोई कटघरे में खड़ा हुआ है तो वो है हिंदी सिनेमा जिसमें गाना एक अहम हिस्सा होते हैं. निशाने पर हैं फिल्मी गाने जिन्हें उनकी हदें याद दिलाई जा रही हैं.

हंसी मज़ाक या अश्लीलता

मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार गटकाले मुझे एलकोहॉल से- ये है दबंग2 के गीत फेवीकॉल के बोल जो इन दिनों चर्चा में है.

इस गाने के तीन गीतकारों में से एक साजिद अली हैं. उनका कहना है, "अगर आप साबित कर दें कि ये गीत अश्लील है तो मैं गाने बनाने बंद कर दूंगा. ये केवल हंसी मज़ाक है और इसकी अश्लील गानों से तुलना करना गलत है.

वहीं संगीत समीक्षक पवन झा कहते हैं, "देखिए ये गाली देना, अश्लील भाषा का इस्तेमाल ये सब हमारे गली मोहल्ले में हमेशा से होता आया है. लेकिन फिल्मी गानों में इनका इस्तेमाल इतने रुखे तरीके से पहले कभी नहीं हुआ. ना पोएट्री है ना कला है, एक जोक की तरह गाने लिखे जाते हैं."

मनोरंजन एक धंधा है

फिल्मकार महेश भट्ट का कहना, "मनोरंजन की इंडस्ट्री मुनाफे पर चलती है. अगर वो देखती है कि हमारे गाने को या कंटेंट को लोगों ने गले लगाया है तो ही वो उसे दोबारा परोसती है.पूरी तरह बॉलीवुड पर उंगली उठाना सही नहीं है. हमाम में सब नंगे है. इसमें लोगों का भी तो योगदान है."

उधर गीतकार प्रसून जोशी मानते हैं कि ऐसी चीज़े बिकती हैं. लेकिन वे ये भी कहते हैं कि समाज के दायरे में रहकर समाज की इज़्जत करके लोगों का मनोरंजन करना ज़्यादा बड़ा चुनौतीपूर्ण काम है. प्रसून का सवाल है, "वैसे तो खिड़की के बाहर कपड़े उतारकर खड़े हो जाने से भी प्रसिद्धि मिलती है पर क्या इज़्जत मिल पाती है."

किसकी ज़िम्मेदारी

फिल्मकार अनुराग कश्यप की राय इस पर कुछ अलग है. उन्होंने इस विषय पर एक अख़बार में लिखा है "आइटम नंबर लोगों को थिएटर तक खींचकर लेकर आते हैं और ये हफ्ते दर हफ्ते हो रहा है. ऐसे में हम फिल्मकारों से आप क्या उम्मीद करते हैं. चटगांव और आई एम जैसी फिल्में कोई देखने ही नहीं आता. ज़िम्मेदारी उठानी है तो सब उठाओ पर किसी एक पर थोपो मत."

लेकिन फिल्म समीक्षक पवन झा कहते हैं कि आज दर्शक उपभोक्ता हो गया है जिसे कुछ अलग की तलाश है. और इस 'अलग' के नाम पर उस पर कुछ भी थोपा जा रहा है. इसका एक ही उपाय है कि लोग टीवी बंद कर दें.

एक तरफ गेंद दर्शक के पाले में है कि क्या देखना है क्या नहीं वो खुद तय करो. तो दूसरी तरफ सवाल ये है कि क्या वाकई में शब्दों का धंधा करने वालों के लिए ये कंगाली का दौर है ?