गैंग्स ऑफ वासेपुर-2: फ़िल्म समीक्षा

- Author, अर्णब बनर्जी
- पदनाम, फ़िल्म समीक्षक
सभी को अनुराग कश्यप की इस फिल्म के दूसरे हिस्से का बेसब्री से इंतजार था.
पहले भाग की कामयाबी से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि गैंग्स ऑफ वासेपुर का दूसरा हिस्सा भी लोगों को पसंद आएगा.
यहां भी प्रतिशोध, गोली मार बहिष्कार, सत्ता संघर्ष और आपराधिक परिवारों की कहानी के साथ हिंसा और भी ज्यादा विकट हो जाती है.
बड़ा सवाल- क्या दूसरा भाग, पहले से ज्यादा बेहतर है ? कहना मुश्किल है.
<link type="page"><caption> क्या फ़िल्म जीतेगी लोगों का दिल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/entertainment/2012/08/120808_gow_story_skj.shtml" platform="highweb"/></link>
पहले हिस्से में रामाधीर सिंह (तिग्मांशु धूलिया) और सरदार खान (मनोज वाजपेयी) की दुश्मनी दिखाई गई थी. दूसरे हिस्से में सरदार खान (जिसकी हत्या हो चुकी है) का बेटा फैजल (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) बदले की इस कहानी को आगे बढ़ाता है.
दूसरे हिस्से में अनुराग ने भरपूर खून खराबा और हिंसा का नजारा पेश किया है. फिल्म में ढेर सारे किरदार हैं, जो कई बार दर्शकों को भ्रमित भी कर देते हैं.
पहले भाग में दिखाया गया कि कैसे वासेपुर में कोयला माफिया आया और वहां संगठित अपराध की शुरूआत हुई.
सरदार खान के पहली पत्नी नगमा खातून (ऋचा चड्ढा) से चार बेटे हैं और एक बेटा डेफिनेट (जीशान कादरी) दूसरी पत्नी (रीमा सेन) से है. इस परिवार की कमान फैजल (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) संभालता है.
वासेपुर में अब आधुनिकता ने अपने कदम पसार दिए हैं. अब यहां इंटरनेट है, चुनाव धांधली और बूथ पर कब्जा जैसी घटनाएं आम है. भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों की मुनाफाखोरी के जरिए अवैध हथियारों का स्क्रैप व्यापार खूब फल फूल रहा है.

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हर कोई यहां फैजल खान से जुड़ना चाहता है क्योंकि वो बेहद ताकतवर हो चुका है. फैजल खान का मकसद है रामाधीर सिंह से बदला जिसने उसके पिता सरदार खान को मरवाया था.
गैंग्स ऑफ वासेपुर का पहला हिस्सा 1940 के दशक से 1990 के दशक तक चलता है. दूसरा हिस्सा 1990 के दशक से 2009 तक चलता है.
जहां फिल्म के दूसरे हिस्से में सभी कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया है, वहीं कभी कभी हिंसा और खून खराबे की अधिकता से उकताहट होने लगती है और फिल्म कभी कभी प्रिडक्टबल हो जाती है.
जो लोग कहानी से जुड़ नहीं पाते उन्हें फिल्म उबाऊ लग सकती है. लेकिन नवाजुद्दीन, पीयूष मिश्रा, पंकज त्रिपाठी, ऋचा चड्ढा, हुमा कुरैशी जैसे कलाकारों का लाजवाब अभिनय आपको जरूर लुभाएगा.
फिल्म में डार्क ह्यूमर (हास्य) भी है, जो तनाव कम करने में मदद भी करता है.
और हां, गैंग्स ऑफ वासेपुर की बात इसके संगीत का जिक्र किए बिना हो ही नहीं सकती. फिल्म की संगीतकार स्नेहा खानवल्कर ने बेहतरीन काम किया है और अनुराग कश्यप की इस कहानी को बेहतरीन तरीके से समझते हुए जबरदस्त बैकग्राउंड संगीत भी दिया है और बेहद लुभावने भोजपुरी बोलों में गाने भी दिए हैं.
गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं. धनबाद और उसके आसपास की संस्कृति को ध्यान में रखते हुए गानों में हारमोनियम और ढोलक का बखूबी इस्तेमाल किया गया है.
जीशान कादरी, अखिलेश जायसवाल, अनुराग कश्यप और सचिन लालकृष्ण लिखित और अनुराग कश्यप निर्देशित ये फिल्म लोगों को पसंद आएगी.












