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सेक्स, दस्यु सुंदरी और भूत-पिशाच, कैसी थी बॉलीवुड में 'बी' ग्रेड फ़िल्म की दुनिया?
- Author, चेरलेन मोल्लन और मेरिल सेबेस्टियन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"फिल्म का हर सीन आपके दिमाग, दिल या कमर के नीचे के हिस्से को छूने वाला होना चाहिए." बॉलीवुड में 'बी' ग्रेड कही जाने वाली फिल्में बनाने वाले डायरेक्टर दिलीप गुलाटी की अपनी फिल्मों के बारे में यही राय है.
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में इस तरह की फिल्मों पर अमेजन प्राइम की डॉक्यूसिरीज में गुलाटी और इन जैसे निर्देशक ऐसी फिल्मों के बारे में तफसील से बात करते और इनके प्रोडक्शन के बारे में बात करते दिखते हैं.
बॉलीवुड में 'बी ग्रेड' कही जाने वाली फिल्मों को कमतर समझा जाता है. लुगदी उपन्यासों की तरह ही इन 'पल्प' फिल्मों की भी अलग दुनिया है. ये फिल्में काफी छोटे बजट और बेहद कम समय में बनाई जाती हैं.
इनमें अनाम कलाकार काम करते हैं. फिल्म की कहानी छोटी होती है. भावुक संवादों, बेहद भड़कीले सेट और सेक्स ऐसी फिल्मों के अहम तत्व होते हैं.
1990 के दशक के दौरान ऐसी फिल्मों का जलवा हुआ करता था. उन दिनों इन फिल्मों के देखने के लिए सिनेमाघरों में भारी भीड़ उमड़ती थी लेकिन 2004 आते-आते ऐसी फिल्मों के सितारे गर्दिश में चले गए.
अमेजन प्राइम ने इन फिल्मों पर छह भाग में एक डॉक्यूमेंट्री सिरीज बनाई है. डॉक्यूसीरीज का नाम है- 'सिनेमा मरते दम तक.' इस सिरीज में इस तरह की फिल्मों पर खास रोशनी डाली गई है.
ये सिरीज ऐसी फिल्मों के मिजाज और इनके निर्माण में लोगों की कहानी कहती है. ये सिरीज इस तरह की फिल्मों की मौजूदगी की वजह और इनके ढलते दौर से भी रूबरू कराती है.
पुराने दिनों को याद दिलाने वाली डॉक्यूसिरीज
विनोद तलवार, जे नीलम, किशन शाह और दिलीप गुलाटी की इस तरह की फिल्में काफी हिट रही हैं. इस डॉक्यूसिरीज में इन चारों को एक टाइट टाइमलाइन और काफी कम बजट में उनके स्टाइल की एक फिल्म का निर्देशन करने को कहा जाता है.
इस असाइनमेंट के मिलते ही ये डायरेक्टर दशकों बाद अपने हुनर के साथ फिल्म बनाने उतर पड़ते हैं. पुराने दोस्तों और सहयोगियों से संपर्क साधते हैं और फिल्म बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है.
ये शो इन डायरेक्टरों का काम दिखाता है और इसके साथ ही सिरीज देखने वाले लोग उनके साथ नब्बे के दशक में चल पड़ते हैं.
इस दौरान दर्शकों को इन निर्देशकों की पुरानी फिल्मों की झलक मिलती जाती है. उनका सामना फिल्मों के चौंकाने वाले टाइटिल से होते हैं. जैसे-'मौत के पीछे मौत', 'कुंवारी चुड़ैल' और 'मैं हूं कुंवारी दुल्हन.'
उस दौर की ये फिल्में सिंगल सेट में शूट की जाती थी और डायरेक्टर ही आर्ट डायरेक्टर, कॉस्ट्यूम डिजाइनर और कभी-कभी एक्टर का भी काम करते. इन फिल्मों को कभी-कभी और भड़कीले टाइटिल के साथ रिलीज किया जाता था ताकि और दर्शक जुटें. कभी-कभी फिल्मों की कहानी थोड़ी बदल भी दी जाती थी.
कभी-कभी कुछ सीन के लिए बॉलीवुड के स्टार भी ले लिए जाते थे और उन्हें हर दिन के काम के हिसाब से पैसे दे दिए जाते थे.
इस तरह की फिल्में बनाने में माहिर कांति शाह बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपनी कुछ फिल्मों में गोविंदा, मिथुन चक्रवर्ती और धर्मेंद्र जैसे नामी स्टार को लिया था.
सेक्स,भड़कीले संवाद और अजीबो-ग़रीब सीन
इस तरह की फिल्मों में कुछ भी निषिद्ध, कल्पना से परे नहीं था. भड़कीले से भड़कीले दृश्यों की भी यहां कल्पना की जा सकती थी. चाहे अपने गैंग में पुरुष मालिशिये की भर्ती करने वाली दस्यु सुंदरी हो या लिंग बदल कर नौकरानियों से यौन संबंध बनाने वाला भूत. फिल्म की कहानी के मुताबिक हर मसाला तैयार रहता था.
फिल्म रिसर्चर असीम चंदावर याद करते हुए कहते हैं कि कैसे एक फिल्म 'खूनी ड्रैकुला' में एक पिशाच स्लम में घुसकर खुले में नहाने वाली महिला से यौन संबंध बनाता है.
वो हंसते हुए कहते हैं, ''मुख्यधारा की फिल्मों में अगर कोई भूत इंसान से यौन संबंध बना रहा हो तो कम से कम उसे किसी अच्छी जगह कम से कम बाथटब में ऐसा करते हुए हुए दिखाया जाएगा.''
''लेकिन इन दर्शकों को अपनी फिल्मों के दर्शकों के बारे में पता होता था. इसलिए उन्हें स्क्रीन पर इस तरह के दृश्य उतारने में कोई गुरेज नहीं होता था.''
लेकिन ये फिल्में खूब चलती थीं. कई बार सिनेमाघरों में उमड़ी भीड़ के लिए अतिरिक्त कुर्सियां लगवानी पड़ती थीं.
इन फिल्मों को देखने वाले भी कामगार वर्ग के लोग थे. टुक-टुक और टैक्सी ड्राइवर, सड़कों पर फेरी लगाने वाले, मजदूर, दूर-दराज से आने वाले छोटे शहरों के लोग और बेहद कम मजदूरी में काम करने वाले लोग इस तरह की फिल्में देखने आया करते थे.
ये फिल्में उनकी हर दिन की धूमिल जिंदगी से कुछ देर के लिए मुक्ति का माध्यम होती थीं. धीमी रोशनी में कुछ घंटों के लिए वो इन फिल्मों की दुनिया में खो जाते थे. वो इन्हें गुदगुदाती थीं. आनंद देती थीं.
कलाकारों को क्या झेलना पड़ता है?
अमेजन की डॉक्यूसिरीज में उस दंश और संघर्ष का भी जिक्र है, जो इन फिल्मों में काम करने की वजह से इसके कलाकारों को झेलना पड़ता है. अक्सर कम बजट की हॉरर फिल्मों में काम करने का दंश उन्हें झेलना पड़ता है. इस वजह से उनके लिए मुख्यधारा की उन फिल्मों में काम करना मिलना मुश्किल होता है, जिन्हें अपेक्षाकृत गंभीर समझा जाता है.
ये फिल्में कई बार सेंसर बोर्ड में फंसती रही हैं. डिस्ट्रीब्यूटर्स फिल्में चलवाने के लिए कुछ ज़्यादा जोखिम वाले दृश्य जुड़वाने पर जोर देते थे. ये दृश्य दर्शकों की मांग पर जोड़े जाते थे. चूंकि इन दृश्यों पर सेंसर रोक लगा देता था. इसलिए ये दृश्य अलग से फिल्माए जाते थे लेकिन स्क्रीन के दौरान इन्हें इनमें जोड़ दिया जाता था.
लेकिन हंगामा तब मचा जब प्रोजेक्टर चलाने वाले फिल्म में एक ऐसा सेक्स सीन घुसा दिया, जिसमें भाई-बहन शामिल थे. इस वजह से खूब बवाल हुआ और पुलिस ऐसी फिल्मों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू कर दी.
2004 तक बी-मूवी इंडस्ट्रीज लगभग मरने लगी थी. और इसके साथ इस तरह की फिल्मों से जुड़े सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिनने की शुरुआत हो गई थी.
बी ग्रेड फिल्म का सुनहरा दौर भले बीत चुका है, लेकिन इस तरह के फिल्मों को पंसद करने वाले लोगों, मीम्स स्पूफ और चुटकुलों में ये विरासत जिंदा है.
फिल्म स्कॉलर विभूषण सुब्बा कहते हैं, ''ये फिल्में असाधारण सरलता, कहानी और बढ़-चढ़ कर एक अलग तरह के सौंदर्यबोध के जरिये एक बड़ा फैन बेस बना लिया था. भले ही छोटे स्तर पर लेकिन इन फिल्मों ने पॉपुलर कल्चर में एक जगह बना ली है.''
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