यूपी का अपराध, सिनेमा और वेब सीरीज़ में क्यों दिखाया जा रहा है?

    • Author, मेरिल सेबास्टियन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली

पिछले कुछ सालों में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने फ़िल्म निर्माताओं को कहानियों का दायरा बढ़ाने के मौके दिए हैं. आबादी के लिहाज़ से भारत का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश फ़िल्म निर्माताओं के लिए आकर्षक ठिकाना बन गया है. लेकिन यहां आधारित कहानियों में आमतौर पर अपराध और गैंग हिंसा को ही दिखाया जाता है. और इसके बीच राज्य की समृद्ध संस्कृति और इतिहास पीछे छूट जाता है.

उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों और क़स्बों पर आधारित कम बजट की फ़िल्मों की कामयाबी ने फ़िल्म और टीवी उद्योग को यहां और अधिक कहानियां बनाने के लिए आकर्षित किया है.

अपने बड़े आकार और आबादी की वजह से भारत की राजनीति पर हावी रहा उत्तर प्रदेश अब फ़िल्म निर्माताओं की पहली पसंद बनता जा रहा है.

नई फ़िल्मों और वेब सीरीज़ पर नज़र रखने वाले ट्विटर अकाउंट सीनेमा रेयर ने मज़ाकिया लहजे में कहा कि अब शायद ही उत्तर प्रदेश का कोई शहर या क़स्बा बचा हो जिस पर फ़िल्म ना बन गई हो.

राज्य सरकार भी छूट और विशेष व्यवस्था का प्रलोभन देकर फ़िल्म निर्माताओं को अधिक से अधिक संख्या में आकर्षित कर रही है.

मिर्ज़ापुर से लेकर पाताल लोक तक (और कई कम लोकप्रिय) लोकप्रिय शो राज्य पर ही आधारित हैं. इनमें पारिवारिक दुश्मनी और हिंसक हत्याओं को दिखाया गया है.

बॉलीवुड के लिए अपराध की कहानियां कोई बात नई नहीं है. 1998 में मुंबई पर आधारित गैंगस्टर ड्रामा फ़िल्म 'सत्या' के बाद ऐसी 'हिंसक और डार्क' फ़िल्मों का सिलसिला शुरू हुआ जो शहर की सतह के नीचे चल रहे अपराध लोक की यात्रा कराती हैं.

यूपी से आने वाले निर्देशकों ने सिनेमा बदला

हालांकि सत्या के बाद से मुंबई अंडरवर्ल्ड की आम जन-मानस पर छाप कमज़ोर हुई है लेकिन नए दौर की अपराध आधारित फ़िल्मों पर इसका असर अब भी दिखाई देता है.

फ़िल्म आलोचक उदय भाटिया ने अपनी किताब 'बुलेट्स ऑवर बॉम्बे' में लिखा है, "सत्या हिंदी सिनेमा में बड़ा बदलाव लेकर आई, लेकिन इसकी विरासत में वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने इस पर काम किया, उन्होंने इसकी कामयाबी से फ़ायदा उठाया और अपने तरीक़े से हिंदी सिनेमा को बदला."

इनमें निर्देशक अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज भी शामिल हैं, जो दोनों ही उत्तर प्रदेश से आते हैं. विशाल भारद्वाज ने उत्तर प्रदेश पर आधारित कई हिट फ़िल्में बनाई हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली लेखिका और फ़िल्म निर्माता अनुभा यादव कहती हैं कि सत्या से पहले तक हिंदी फ़िल्में कहानी पर बहुत अधिक फोकस नहीं होती थीं.

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि हिंदी सिनेमा के लिए प्लॉट महत्वपूर्ण हो गया और इसके बाद फ़िल्मों में एक अलग तरह की सौंदर्यता दिखने लगी. मुझे लगता है कि वेब सीरीज़ अब इसे एक नए स्तर तक ले जा रही हैं."

लेकिन कुछ आलोचक एक समस्या की तरफ़ भी ध्यान दिलाते हैं.

उत्तर प्रदेश के शाहबाद में रहने वाले समाजशास्त्री मोहम्मद सईद कहते हैं, "सत्या असली थी. उसके बाद आई सभी फ़िल्में एक ही चीज़ की कॉपी सी लगती हैं लेकिन उनमें बस नए मुहावरे होते हैं, नई कहावतें होती हैं और नई गालियां होती हैं."

वहीं यादव कहती हैं, सत्या की कामयाबी के बाद जो नई शैली बनी वो दर्शकों को गुदगुदाने के लिए एक ख़ास क़िस्म के मर्दवाद और हिंसा का सहारा लेती है.

उत्तर प्रदेश अपने भौगोलिक स्थिति और आबादी की विविधता की वजह से फ़िल्म निर्माताओं को लाभ देता है. लेकिन इसके अलावा भी राज्य के पास बहुत कुछ है. राज्य को उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब (हिंदु मुसलमानों की साझा संस्कृति) का श्रेय तो दिया ही जाता है. इसके अलावा यहां साहित्य, कला, संगीत और नृत्य जगत के कई धुरंधर भी पैदा हुए हैं.

लेकिन आज के दौर के शो में प्रदेश की ये पेचीदगी अगर है भी तो बस झणभंगुर ही है.

यादव कहती हैं, "ये कवियों की भूमि है. ये शायर ग़ालिब की ज़मीन हैं. इसके पास 1857 की क्रांति जैसी सबसे बड़ी ऐतिहासिक कहानियां हैं."

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि राज्य में अपराध नहीं हैं. पुलिस एनकाउंटर, नफ़रत से प्रेरित हिंसा और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध यहां सुर्ख़ियों में रहते ही हैं.

लेकिन फ़िल्मों और टीवी शो में दूसरे बड़े राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की हिंसा को ही अधिक दिखाया जाता है. हालांकि इन राज्यों में भी हर साल दसियों हज़ार अपराध दर्ज होते हैं.

हिंसा के उलट यूपी को दिखाती कहानियां

2020 में दिए एक इंटरव्यू में पटकथा लेखिका जूही चतुर्वेदी ने कहा था, "यहां कितना सारा इतिहास, कला और संगीत हैं. यहां बंदूकों के सिवा भी बहुत कुछ है."

बीते साल आई चतुर्वेदी की लिखी हुई फ़िल्म गुलाबो-सिताबो में एक मकान मालिक और किरायेदारों के बीच पुराने बंगलों को लेकर खींचतान दिखाई गई. लेखिका ने फ़िल्म को लखनऊ पर बनाया जहां वो स्वयं पली बढ़ी हैं. उन्होंने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय कठपुतली कला का सहारा लिया.

कई और फ़िल्में भी ऐसी आई हैं जिन्होंने बिना एक गोली चलाए उत्तर प्रदेश की मज़ाकियां कहानियां दिखाई हैं. शुभ मंगल ज़्यादा सावधान और बरेली की बर्फ़ी इसके उदाहरण हैं.

चतुर्वेदी कहती हैं, "किसी शहर या माहौल की कई दिशाएं होती हैं, हां अपराध भी उसका एक हिस्सा होता है. लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अपराध के अलावा भी बहुत कुछ है."

यादव मानती हैं कि समस्या तब खड़ी होती है जब कोई ऐसा व्यक्ति जिसे राज्य की गहरी समझ ना हो वो इसके बारे में चर्चित मुहावरे- "सबसे बड़ी आबादी का राज्य, एक बहुत सांप्रदायिक जगह, एक जातिवादी जगह" का इस्तेमाल क्षेत्र और उसके अलग-अलग रंगों को देखे बिना करता है.

यादव और सईद दोनों का ही ये मानना है कि राज्य से आने वाली अपराध की ख़बरें और इस तरह के सामान्यकरण का जब इस्तेमाल किया जाता है तो इससे राज्य और उसके लोगों को अलग करके दिखाया जाता है.

एक शो के लिए शोध में मदद करने वाले सईद मानते हैं कि राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह देखा जाता है इसे लेकर इसके व्यापक प्रभाव हैं.

पहले निर्देशकों ने उत्तर प्रदेश पर आधारित बहुमुखी फ़िल्में बनाई हैं वो भी बिना उसकी हिंसा से बचे हुए.

यादव कहती हैं, "विशाल भारद्वाज की ओमकारा में भी हिंसा है लेकिन ये कभी भी हावी नहीं होती है और फ़िल्म का मूल नहीं बनती हैं."

मसान जैसी स्वतंत्र फ़िल्मों ने राज्य के रोज़मर्रा के अपराध को दर्शाया है.

साल 2012 में जब अनुराग कश्यप ने कोयला माफ़िया पर आधारित फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर बनाई तब स्थानीय लोगों ने अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के असंवेदनशील प्रदर्शन का विरोध किया और इसके भ्रामक होने की आलोचना भी की. दो हिस्सों में आई गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में अविभाजित बिहार के वासेपुर शहर को दिखाया गया था. कई लोगों ने फ़िल्म को ख़तरनाक़ तक कहा था हालांकि निर्देशक ने ये कहते हुए बचाव किया था कि फ़िल्म वास्तविकता के नज़दीक है.

सईद याद करते हैं, "अनुराग कश्यप की फ़िल्म से बिहार और झारखंड असहज हो गए थे- फ़िल्म में चटनी संगीत था (ये भारतीय लोक संगीत की एक शैली है) जिसे उनके क्षेत्रीय संगीत के तौर पर पेश किया गया था. यहीं नहीं हिंसक प्रतिनिधित्व ने भी लोगों को परेशान किया था."

वहीं यादव कहती हैं कि नए शो में हिंसा को एक फॉर्मूले की तरह इस्तेमाल किया जाता है और ये फ़िल्म की लोकेशन से अलग लगता है. इसकी वजह से शो भाषा और क्षेत्र से बाहर निकल जाते हैं क्योंकि संदर्भ यहां कम मायने रखता है.

शहरों पर आधारित थ्रिलर शो जैसे सेक्रेड गेम्स और आर्या के लिए भी स्थितियां बहुत अलग नहीं हैं.

यादव कहती हैं, "कल्पना कीजिए की सेक्रेड गेम्स उत्तर प्रदेश पर आधारित है. तो फिर ये कितना बदलेगा? मुझे नहीं लगता है कि ये बहुत अधिक बदलेगा क्योंकि हिंसा का प्रस्तुतिकरण वैसा ही रहेगा."

वो कहती हैं, "यदि मिर्ज़ापुर को गुजरात में बनयाा जाता है तो हो सकता है बहुत अधिक बदलाव न हों, सिवाए भाषाई तर्क के."

वो कहती हैं कि हालांकि मुक्ति भवन और मसान जैसी फ़िल्मों की बात अलग है, जो बनारस की संस्कृति और भाव को दिखाती हैं. ये शायद कहीं और बन ही ना पाएं.

आजकल इस तरह के शो को बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म बना रहे हैं जिनके पास प्रचार-प्रसार के लिए बड़ा बजट होता है.

यादव कहती हैं, "यदि यह बदलता है तो मुझे लगता है कि और भी बहुत से बदलाव आ सकते हैं."

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