शाहरुख़ और दिलीप कुमार की देवदास: क्या पारो और चंद्रमुखी ही हैं असली नायक?

    • Author, वंदना
    • पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर

100 साल से भी पहले, दूर बंगाल में, पन्नों पर लिखा एक किरदार. किरदार जो किताब से निकलकर फ़िल्म के पर्दे पर आया और फिर फ़िल्मी स्क्रीन से निकलकर लोगों के ज़हन में उतर गया.

और देखते ही देखते देवदास नाम का वो पात्र सिर्फ़ एक काल्पनिक किरदार नहीं बल्कि एक जीवनशैली, ज़िंदगी जीने का एक ढंग बन गया. तभी तो कई बार आपने सुना होगा- बड़ा देवदास बना फिरता है, ख़ासकर तब जब कोई उदास, डूबा हुआ सा, ख़ुद को बर्बाद करने वाले काम कर रहा हो.

1917 में लिखी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी देवदास को आज की पीढ़ी शाहरुख़ खान के ज़रिए जानती है जिनकी फ़िल्म देवदास 20 साल पहले 12 जुलाई, 2002 को रिलीज़ हुई थी.

वहीं पहले की पीढ़ी दिलीप कुमार के ज़रिए देवदास (1955) को जानती है और उससे भी पहले केएल सहगल वाली देवदास (1936). अलग-अलग भाषाओं में कोई 15 से 20 बार देवदास या उसके इर्द-गिर्द फ़िल्म बनाई जा चुकी है.

लोग इसे 'मदर ऑफ़ लव स्टोरीज़' भी कहते हैं. आख़िर ऐसा क्या है देवदास की इस कहानी में? हर दौर में दिखाया देवदास कितना अलग है? और क्या ये वाकई देवदास की कहानी है या दरअसल उन दो औरतों की कहानी ज़्यादा है, जो देवदास की ज़िंदगी में थीं- पारो और चंद्रमुखी?

देवदास- मजबूर, विद्रोही या कमज़ोर?

अमीर, सामंतवादी, ऊंची जाति वाले परिवार में जन्मे देवदास को देखने के कई नज़रिए हो सकते हैं- नेक दिल वाला एक बेचारा आशिक़ जो अपनी बचपन की दोस्त और प्रेमिका पारो को जान से भी ज़्यादा चाहता था. लेकिन परिवार ने जाति और हैसियत के नाम पर प्यार को परवान नहीं चढ़ने दिया. जब पारो उसे न मिल सकी तो उसके प्यार में शराब पी पीकर ख़ुद को बर्बाद कर दिया. समाजशास्त्र में और फ़िल्मी जुमले में इसे 'देवदास सिंड्रोम' भी कहते हैं.

कब-कब बनी देवदास

  • 1928- साइलेंट मूवी
  • 1935- बंगाली, पीसी बरुआ
  • 1936- हिंदी, पीसी बरुआ
  • 1955- हिंदी, बिमल रॉय
  • 2002- हिंदी, संजय लीला भंसाली
  • 2009- हिंदी (देव डी), अनुराग कश्यप

वहीं एक औरत के नज़रिए से देखें तो देवदास को कुछ यूँ भी देखा जा सकता है- नादान, नासमझ, उलझा हुआ, ख़ुद को बर्बाद करने वाला या आत्म-विनाशकारी पुरुष जो आत्ममुग्ध है, जिसे लगता है कि दुनिया सिर्फ़ उसके इर्द-गिर्द घूमती है, एक ऐसा मर्द जो अपने दर्द से निपटने में अक्षम है, जो ख़ुद के लिए फ़ैसले या स्टैंड नहीं ले सकता. वो फ़ैसले लेता भी है तो तैश और आवेग में आकर. जो कभी ज़िंदगी का सामना नहीं कर पाया ज़िंदगी भर और ज़िंदगी से भागता रहा.

पारो और चंद्रमुखी- मज़बूत और परिपक्व

वहीं पारो और चंद्रमुखी के किरदार देवदास से एकदम अलग ज़्यादा मज़बूत और ज़्यादा परिपक्व नज़र आते हैं.

जेएनयू में सिनेमा स्टडीज़ की प्रोफ़ेसरइरा भास्कर

देवदास के महिला किरदारों के बारे में इरा भास्कर कहती हैं, "पारो और चंद्रमुखी की बात करें तो दोनों पात्र औरत के समर्पण और निष्ठा की शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं- ऐसा समर्पण जो सामाजिक बंधनों के दायरे से परे हैं. पारो एक खुद्दार औरत है जो अपने प्यार को सब कुछ दे देती है लेकिन वो अपमान बर्दाश्त नहीं करेगी. वो अपने फ़ैसले पर खड़े रहने की क्षमता रखती है हालांकि वो देवदास के प्रति हमेशा वफ़ादार रहती है .चंद्रमुखी भी देवदास के प्रति पूरी तरह निष्ठावान हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे पारो है. अपने प्रेम से अलग रहने का फ़ैसला उनका अपना है लेकिन देवदास के प्रति उनकी निष्ठा में कोई कमी नहीं. दोनों में एक आंतरिक शक्ति है, दोनों की शख़्सियत ज़्यादा मज़बूत और परिपक्व है. वो निर्णय लेने की काबिलियत रखती हैं."

इन तमाम परतों को और समझने के लिए मैंने देवदास पर बनी चार फ़िल्में देखी और किरदारों को समझने की कोशिश की - सिर्फ़ देवदास नहीं बल्कि पारो और चंद्रमुखी के नज़रिए से भी जिनके किरदार कहीं ज़्यादा मज़बूत, सुलझे हुए, खुद्दार नज़र आते हैं. और निडर भी.

मसलन फ़िल्म देवदास का वो सीन जब देवदास के परिवारवाले शादी से इंकार चुके होते हैं. देवदास के प्यार में ग़ुम पारो रात के दो बजे अंधेरे में देवदास के कमरे में आती है, ये जानने के लिए क्या वो उससे शादी करेगा. ये सीन 1936, 1955 और 2002 तीनों देवदास में हैं.

यहाँ सहगल वाली देवदास में दोनों के बीच का संवाद देखिए...

देवदास- इतनी रात गए और बिल्कुल अकेली, तुम्हें किसी का डर नहीं. तुम्हें किसी ने देखा तो नहीं?

पारो- दरबान मुझे पहचानता है. पर मालूम होता है, आज मैं किसी से नहीं डरती.

देवदास- छी छी पार्वती, कल दुनिया को कैसे मुँह दिखा सकोगी. क्या शर्म से तुम्हारी गर्दन उठ सकेगी? मैं भी दुनिया को कैसे मुँह दिखाऊँगा.

पारो- अगर मेरी बदनामी इसमें होती है कि मैं तुमसे मिलने छुप-छुप कर आई हूँ, तो हो बदनामी. मुझे इसकी परवाह नहीं.

फ़िल्म का ये सीन दिखाता है कि देवदास के लिए वो कुछ भी करने की हिम्मत रखती थी. उस दौर में औरत होकर ये कर पाना आसान न रहा होगा. लेकिन पारो से उलट देवदास को पहले इस बात की परवाह है कि उसकी बदनाम होगी और लोग क्या सोचेंगे. और उसके बाद वो पारो के बारे में सोचता है.

अपने लिए स्टैंड लेने की क़ुव्वत

देवदास की तुलना में पारो और चंद्रमुखी कहीं ज़्यादा 'जिगरवाली' नज़र आती हैं, वो फ़ैसला करने से पहले सोचती हैं, और ज़रूरत पड़ने पर अपने लिए स्टैंड भी लेती हैं.

जैसे जब परिवार से रूठकर लाडला देवदास सब छोड़ आवेश में कलकत्ता चला जाता है, तब वो ये नहीं सोचता कि पारो का क्या होगा. जब अपनी ग़लती का एहसास होने पर देवदास वापस आता है तो ये उम्मीद करता है कि पारो अपनी शादी तोड़ दे.

लेकिन ख़ुद्दार पारो अपने लिए स्टैंड लेती है- भंसाली वाली देवदास में शाहरुख़ और ऐश्वर्या राय का शादी को लेकर ये संवाद इसकी गवाही देता है.

अलग- अलग भाषाओं में कब-कब बनी देवदास

  • 1953- तेलुगु, देवदासु
  • 1953- तमिल, देवदास
  • 1965- उर्दू, पाकिस्तानी फ़िल्म
  • 1982- बंगाली, बांग्लादेशी फ़िल्म
  • 1989- मलयालम, देवदास

देवदास- मैं जैसे तैसे अपने माता-पिता को मना लूँगा.

पारो- तुम्हारे माता-पिता हैं तो मेरे नहीं?... तुम्हारे परिवार की इज़्ज़त है तो हमारी नहीं? तुम्हारे माता-पिता ज़मींदार तो मेरे कुछ भी नहीं?

देवदास- तुम तो जानती हो कि तुम्हारा देव कोई भी काम सोच कर नहीं करता. वो मेरी नामसझी थी.

पारो- ऐसी कैसी नासमझी देव कि जब चाहे कंगन पहना गए और जब चाहा चिट्ठी लिख दी कि हमारे बीच में प्यार नहीं? तुम्हारे पास है ही क्या? सिर्फ़ रुतबा और दौलत? मेरे पास गुण भी हैं और रूप भी और आज के बाद दौलत भी. आज से हमारी तुम्हारी बराबरी होगी देव. अगर लोग तुम्हें ज़मींदार कहेंगे तो मैं भी ठकुराइन सुनकर इतराऊँगी.

देवदास को आईना दिखाने की कोशिश

देवदास की कहानी जानने समझने पर ये भी एहसास होता है कि पारो और चंद्रमुखी समय समय पर देवदास को आईना दिखाने की नाकाम कोशिश भी करती हैं.

मसलन जब देवदास (शाहरुख़) तवायफ़ कहकर पहली बार चंद्रमुखी की तौहीन करता है तो चंद्रमुखी (माधुरी) एक तरह से देवदास को ललकारते हुए कहती है- अब समझ में आया कि पारो ने आपको छोड़ा तो क्यों छोड़ा. इश्क़ तो दूर की बात आप तो हमदर्दी के भी लायक नहीं है.

तो क्या देवदास सचमुच इतना लाचार और अकेला है ? क्या उससे हमदर्दी होनी चाहिए या फिर वो सिर्फ़ एक कमज़ोर, नासमझ, भगोड़ा पुरुष है, जो कोठे पर बैठी तवायफ़ को हिक़ारत और नफ़रत भरी नज़र से तो देखता है लेकिन रोज़ उसी के कोठे पर जाकर शराब भी पीता है.

चंद्रमुखी (वैजयंतीमाला) जब देवदास (दिलीप कुमार) को शराब पीने पर टोकती है तो उसे ये कहने की हिमाक़त भी रखता है- "हाथ मत लगाओ मुझे चंद्रमुखी. तुम नहीं जानती कि मैं तुमसे कितनी नफ़रत करता हूँ और करता रहूँगा. फिर भी आऊँगा तुम्हारे पास, बातें करूँगा. इसके सिवा उपाय भी क्या है."

पारो और चंद्रमुखी का रिश्ता

प्रोफ़ेसर इरा भास्कर देवदास को कुछ इस नज़रिए से देखती हैं, "देवदास एक ऐसा किरदार है जिसमें उस समय के हालात के विरोधाभास नज़र आते हैं. विद्रोह करने का उसके पास एक ही तरीक़ा है कि वो ख़ुद को तबाह कर ले, क्योंकि जिस सामाजिक-पारिवारिक ढाँचे में वो रहने को मजबूर था, वो समाज तो उसे अपने असल रूप में रहने की अनुमति ही नहीं देता."

देवदास को देख पढ़कर एक अलग नज़रिया ये भी बनता है कि देवदास की नासमझी के उलट, कैसे दोनों महिला पात्र एक दूसरे को न जानते हुए भी एक-दूसरे को समझती थीं.

2009 में आई अनुराग कश्यप की फ़िल्म 'देव डी' भी देवदास की आधुनिक एडैप्टेशन ही थी.

उस फ़िल्म में जब देव (अभय देओल) चंदा यानी चंद्रमुखी (कल्कि) को पारो के बारे में बताता है, तो चंदा पारो का ही पक्ष लेती है और देव से कहती है कि तुम एक बार भी जाकर नहीं बोल पाए पारो से कि शादी मत करो?

1955 की चंद्रमुखी भी 2009 की चंदा से अलग नहीं थी. बिमल रॉय की देवदास में जब आख़िरकर देवदास चंद्रमुखी के अस्तित्व को स्वीकार करने लगता है तो पहली बार दोनों में खुल कर बातें होती हैं.

तब चद्रमुखी (वैजयंतीमाला) कहती है- "शायद पार्वती बहुत रूपवती है. लेकिन फिर भी मैं ये जान पाई हूँ कि पहले वही तुम्हारे प्रेम में पड़ी होगी. पहले उसी ने बात ज़ाहिर की होगी."

चंद्रमुखी की इस बात में कितनी गहराई है जहाँ वो पारो को न जानकर भी ये बता सकती है कि प्रेम की बात पहले पारो ने ही ज़ाहिर की होगी क्योंकि देवदास के पास शायद दूसरों के जज़्बात जानने और समझने की वो नज़र ही नहीं थी.

जब भंसाली ने पारो और चंद्रमुखी से मिलवाया

यूँ तो शरतचंद्र की कहानी में पारो और चंद्रमुखी की कभी मुलाक़ात नहीं होती लेकिन असल कहानी के नैरेटिव को बिल्कुल तोड़ते हुए भंसाली की दुनिया में पारो और चंद्रमुखी का आमना-सामना होता है.

इसे दो प्रेमिकाओं की भिंडत के रूप में दिखाया जा सकता था लेकिन ऐसा हुआ नहीं . बल्कि भंसाली ये दिखाते हैं कि दोनों औरतों को एक दूसरे को बख़ूबी समझने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगता है.

स्क्रीनप्ले का ये मोड़ असल में लिखी कहानी से बहुत अलग है और इस बदलाव के लिए भंसाली की आलोचना भी हुई. लेकिन अगर पारो और चंद्रमुखी को वाकई मिलना ही होता तो दोनों औरतों से कुछ इसी तरह की गहराई, ग्रेस और परिपक्वता की ही उम्मीद रहती क्योंकि शरतचंद्र ने पारो और चंद्रमुखी को बहुत मज़बूत और परिपक्व दिखाया है.

नए ज़माने का देवदास

नए ज़माने की बात करें तो देवदास को अपने अपने तरीके से पर्दे पर उतारा गया है. अभिनेता अभय देओल देवदास को 21वीं सदी के आइने से दिखाना चाहते थे जहाँ औरत-मर्द के बीच बराबरी वाले रिश्ते का नैरेटिव है.

2009 में अभय के कॉन्सेप्ट नोट के साथ अनुराग कश्यप ने देव डी बनाई.

देवदास के बारे में अभय देओल ने तब लिखा था, "मैंने उपन्यास पढ़ा था. मेरे हिसाब से देवदास का किरदार मिसोजिनिस्ट (नारी से द्वेष करने वाला) था, घमंडी था, उसे लगता था कि सब कुछ उसी के इर्द-गिर्द घूमता है. फिर भी इस किरदार को दशकों तक रोमेंटिसाइज़ किया गया है. जबकि दोनों औरतें कहीं ज़्यादा मज़बूत थीं, उनमें ईमानादरी और निष्ठा थी. उनसे उम्मीद की जा रही थी कि कुछ भी हो जाए वो देव को प्यार करती रहें. मैं वो नैरेटिव बदलना चाहता था."

अभय देओल ने लिखा था, "इसीलिए देव डी में पारो देव को उसकी ग़लतियाँ बताती है और उसे उसकी औकात दिखाती है. मेरी फ़िल्म में चंदा अपने सेक्स वर्कर होने पर शर्मिंदा नहीं है."

हालांकि, पीसी बरुआ की 1936 में आई देवदास की तुलना में बाद में आई फ़िल्मों में देवदास को ज़्यादा ह्यूमनाइज़ करके या ज़्यादा नर्म दिखाया गया है, जहाँ देर से ही सही उसे ग़लतियों का एहसास होता है.

देवदास के नज़रिए से पारो और चंद्रमुखी

वैसे तो उपन्यास का पूरा नैरेटिव ज़्यादातर देवदास के नज़रिए से ही बयां होता आया है पर फ़िल्म में एक जगह देवदास पारो और चंद्रमुखी की तुलना करने की हिमाक़त करता है और ये सीन हर देवदास में हैं.

दिलीप कुमार कहते हैं- "तुम दोनों में कितना फ़र्क़ है फिर भी तुम दोनों एक जैसी हो. एक ख़ुद्दार और चंचल. दूसरी शांत और गंभीर. वो (पारो) कुछ भी सहन नहीं कर सकती और तुम (चंद्रमुखी) सब कुछ सह लेती हो. उसकी कितनी इज़्ज़त है और तुम कितनी बदनाम. उसे सभी प्यार करते हैं और तुमसे नफ़रत."

सच में पारो और चंद्रमुखी अलग होते हुए भी कितनी एक जैसी थीं.

जब देवदास लिखी गई थी और पहली बार पर्दे पर आई थी तो ये एक साहित्यक ही नहीं, एक बड़ी सामाजिक घटना भी थी.

वरिष्ठ फ़िल्म आर्काइविस्ट पीके नायर ने किताब 'येस्टरडेज़ फ़िल्म्स फॉर टूमॉरो' में 'द देवदास सिंड्रोम इन इंडियन सिनेमा' नाम का लेख लिखा था.

वे लिखते हैं, "1936 में फ़िल्म देवदास की अपार सफलता ने देवदास को कल्ट हीरो बना दिया था. पर इस किरदार ने धीरे-धीरे देश के युवा वर्ग पर नकारात्मक असर डाला. इस किरदार का सामाजिक स्तर पर असर इतना गहरा था कि उन दिनों जिन युवाओं की प्रेम कहानी विफल हो जाती थी, वो शराब पीने लग जाते थे और बर्बादी की राह पर चलने लगते थे. निर्देशक शांताराम तो देवदास की लोकप्रियता से काफ़ी परेशान थे. हीरो की नेगेटिव सोच को काउंटर करने के लिए 1939 में उन्होंने 'आदमी' फ़िल्म बनाई, जो एक पुलिसवाले और एक तवायफ़ की कहानी थी, हारा हुआ हीरो आत्महत्या करने जाता है, लेकिन फिर वो मन बदल लेता है और घर लौट आता है. अंग्रेज़ी में फ़िल्म का नाम था- लाइफ़ इज़ फॉर गिविंग."

क्यों एक सदी से बरकरार है देवदास का जादू

साल दर साल, फ़िल्म दर फ़िल्म न जाने कितने हीरो आए, जिन्हें पर्दे पर देवदास बन ग्लोरिफ़ाई होते देखा. कभी वो केएल सहगल थे, कभी दिलीप कुमार तो कभी शाहरुख़. 'मुक़द्दर का सिकंदर' में अमिताभ का सिकंदर भी तो देवदास ही था, जहाँ वो ज़ोहरा के कोठे पर चंद्रमुखी को ढूँढने जाता है. गुरु दत्त की 'प्यासा' और 'कागज़ के फूल' में भी देवदास की झलक ही तो दिखती है.

आख़िर इस कहानी में ऐसी क्या बात है कि दशकों से इसका जादू बरक़रार है.

प्रोफ़ेसर इरा भास्कर कहती हैं, "देवदास की कहानी आज भी लोगों को इसलिए आकर्षित करती है, क्योंकि जिन सामाजिक बंधनों और जकड़नों को इसमें दिखाया गया है, वो आज के दौर में भी बने हुए हैं. पुरुष प्रधान समाज के नियमों और निजी इच्छाओं की बीच का टकराव जो देवदास में दिखाया गया है, भारत जैसे देशों में आज भी आधुनिक और पारंपरिक सोच के बीच ये टकराव जारी है.

आख़िर में एक बात और. कई महिलाओं को देवदास की कहानी इसलिए भाती रही है, क्योंकि इसमें एक ऐसा प्रेमी है जो अपनी आख़िरी साँस तक उस प्रेमिका के प्रति समर्पित रहता है जिसे वो बचपन से प्यार करता आया है और जो उसी समर्पण की वजह से मर भी जाता है. ये एक ऐसा जज़्बात है जो वक़्त की सीमाओं से परे है."

यूँ तो इस उपन्यास और फ़िल्मों के केंद्र में देवदास है. पर सवाल ये है कि देवदास नाम के इस भंवर में फँसी तो पारो और चंद्रमुखी भी न- देवदास के रहते हुए भी और देवदास की मौत के बाद भी.

तो इस कहानी का नायक क्या सही मायने में पारो और चंद्रमुखी नहीं? जवाब 'हाँ' भी हो सकता है और 'न' भी.

शायद पीसी बरुआ की 30 के दशक में बनी फ़िल्म देवदास देखें तो एक फ्रेम में वो अपने हिसाब से इसका जवाब देते हैं.

देवदास पर बनी फ़िल्मों में जब पारो के चौखट पर देवदास दम तोड़ देता है और पारो का परिवार घर के किवाड़ बंद कर देता है, ताकि वो मरे हुए देवदास को भी न देख पाए तो ज़्यादातर फिल्में देवदास के बेदम चेहरे पर अपना आख़िरी फ्रेम ख़त्म करती हैं. फिर चाहे वो बिमल रॉय हों या भंसाली.

लेकिन पीसी बरुआ की फ़िल्म किवाड़ के अंदर बंद पारो के क्लोज़ अप, चेहरे पर ख़त्म होती है. वो आख़िरी फ़्रेम और चेहरे के भाव पारो और चंद्रमुखी के सामूहिक दर्द को समाए बहुत कुछ बयां कर जाते हैं- जैसे पूछ रही हों कि आख़िर हमारी कहानी कौन बताएगा.

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