बड़े गुलाम अली ख़ानः शास्त्रीय संगीत के महान कलाकार पाकिस्तान छोड़कर भारत क्यों आ गए थे?

    • Author, ताहिर सरवर मीर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू के लिए

एक तरफ, भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस महान कलाकार के आभारी थे, तो दूसरी ओर, पाकिस्तान में एक सरकारी अधिकारी ने उनका अपमान करके उन्हें अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिये मजबूर कर दिया.

यह कहानी है उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान की, जिनके बारे में संगीत के उस्तादों का कहना है कि वो शास्त्रीय संगीत के इतिहास में सबसे विश्वसनीय, सम्मानित और प्रसिद्ध उस्ताद हैं.

स्वतंत्रता के बाद, राष्ट्रपिता गांधी जी को राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रार्थना करानी थी, गांधी जी के भाषण और प्रार्थना से पहले, कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान को अपनी कला का प्रदर्शन करना था, लेकिन उन्हें आने में देर हो गई,

बड़े ख़ान साहब मुंबई के ट्रैफिक में फंस गए थे और पूरे देश के साथ-साथ बापू भी उनका इंतजार कर रहे थे.

ख़ान साहब के आते ही लोगों ने तालियां बजानी शुरू कर दी. उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान साहब की सांसें फूली हुई थी. उनके मोटे शरीर और बड़ी-बड़ी मूंछें देख कर ऐसा लगता था जैसे कोई अधेड़ उम्र का पहलवान हो.

गांधी जी की नज़र ख़ान साहब पर थी जो इतने महत्वपूर्ण समारोह में देरी से आने की वजह से शर्मिंदा थे.

गांधी जी ने जब देखा कि ख़ान साहब परेशान हैं, तो उन्हें देखते हुए कहा कि ख़ान साहब आप बहुत हट्टे-कट्टे हैं और मैं दुबला-पतला हूं इसलिए आपसे लड़ नहीं सकता. यह सुन कर ख़ान साहब की शर्मिंदगी ख़त्म हो गई और फिर उन्होने गाना शुरु किया.

स्वतंत्रता के इस यादगार समारोह में, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान सहाब ने राग पहाड़ी में एक बंदिश सुनाई जिसका मुखड़ा था-हरिओम तित सत जपा कर, जपा कर.

उस्ताद ने भजन भी सुनाये. भजन सुनने के बाद गांधी जी ने कहा कि मानव आत्मा कभी समाप्त नहीं होती. आत्मा कुछ खाती-पीती नहीं है. अगर उसे कुछ खाना हो, तो यह भजन उसका भोजन हो सकता है. गांधी जी ने उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान की तरफ इशारा करते हुए, शुद्ध संस्कृत में कुछ कहा, जिसका अर्थ था कि मानवता की भलाई की शिक्षा एक महान आवाज से अमर हो गई.

उसके बाद ज़ोरदार तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी और बड़े ख़ान साहब देर तक गाते रहे.

गांधीः बड़े ख़ान साहब के प्रशंसक

गांधी जी भी उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के प्रशंसक थे. इसका इज़हार उन्होंने 26 मई 1944 को बड़े ख़ान साहब की महान कला के सम्मान में एक पत्र लिखकर किया था.

गांधी जी लिखते हैं कि आपने यहां आकर मधुर भजन सुनाया इसके लिये मैं आपका आभारी हूं. मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता हूँ. मैंने उस्तादों का गाना बहुत कम सुना है इस लिये बहुत कम समझता हूँ, लेकिन जिस गीत में ईश्वर का नाम आता है वह मुझे बहुत भाता है.

आपका मोहनदास करमचंद गांधी

मियां तानसेन को अगर रिकॉर्ड किया जाता, तो वह भी बड़े ख़ान साहब से सुरीले न होते

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान को 'जगत उस्ताद' माना गया है. संगीत की दुनिया में, बड़े-बड़े नामी गायक हुए हैं, लेकिन जो सम्मान, प्रसिद्धि और स्थायित्व उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के नाम के साथ जुड़ा वो किसी और के साथ नहीं जुड़ सका.

दुनिया में रिकॉर्डिंग 1877 में शुरू हुई. संयुक्त भारत में, गोहर जान वो पहली गायिका थी, जिनकी आवाज़ को 1902 में सबसे पहले रिकॉर्ड किया गया था. उस्तादों का कहना है कि 'मुगल.ए.आज़म' के दरबारी गायक मियां तानसेन को संगीत की दुनिया में पूजनीय माना जाता है.

ऐसा माना जाता है कि तानसेन सुरों के सम्राट थे और ताल उनकी दासी थी. मियां तानसेन की कला और आवाज़ के बारे में माना जाता है कि उनके जैसा कोई नहीं हो सकता.

तानसेन को रिकॉर्ड नहीं किया जा सका, लेकिन अगर उनके पास रिकॉर्डिंग की सहूलियत होती और उनकी आवाज को संरक्षित भी कर लिया जाता, तब भी संगीत प्रेमी अपना वोट उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान को ही देते.

जो भी गायक संगीत रिकॉर्ड कराएगा, मारा जाएगा, बड़े ख़ान साहब ने इस धारणा को गलत साबित किया.

पुराने समय में यह मशहूर था कि जो गायक अपना गाना रिकॉर्ड कराएगा, वह मर जाएगा. यह धारणा इस लिए मज़बूत हो गई थी कि संयोग से उस दौर में अपना संगीत रिकॉर्ड कराने वाले कुछ गायकों की मौत हो गई थी. इसलिए बड़े-बड़े गायक रिकॉर्डिंग कराने से बचते रहे.

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि सन 1902 में, गोहर जान पहली गायिका थी, जिन्होंने अपने गाने की रिकॉर्डिंग कराई थी. गोहर जान का असली नाम एंजेलिना था, जो एक ईसाई परिवार में पैदा हुई थी. बाद में वह मुसलमान हो गई और उनका नाम गोहर जान रखा गया. गोहर जान उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के चाचा और उस्ताद काले ख़ान की शागिर्द थी.

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ने इस धारणा को गलत बताते हुए अपनी युवावस्था में रिकॉर्डिंग शुरू कर दी और बहुत सारा संगीत रिकॉर्ड कराया. उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान एक आज़ाद सोच के उस्ताद थे, जिन्होंने शास्त्रीय संगीत का सभी लोगों से इस तरह परिचय कराया जैसे कि यह भी लोकप्रिय संगीत हो. बड़े ख़ान साहब ने बीसियों राग तीन-तीन मिनट के रिकॉर्ड कराये, जिन्हें गाते हुए उनके समकालीन गायक सुबह से शाम कर देते थे.

लता और मोहम्मद रफी का पेमेंट 500 रुपये जबकि बड़े ख़ान साहब को 25 हज़ार रुपये दिए गए.

साठ के दशक में निर्देशक के आसिफ फिल्म 'मुगल-ए-आजम' बना रहे थे. फिल्म के एक दृश्य में, शाही गायक मियां तानसेन की आवाज़ की ज़रूरत पड़ी, तो संगीत निर्देशक नौशाद ने के आसिफ़ से कहा कि तानसेन की आवाज़ के लिए, हमें आज के तानसेन उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान से निवेदन करना चाहिए. बड़े ख़ान साहब से संपर्क किया गया, तो उन्होंने मना कर दिया, क्योंकि वह फिल्मी संगीत को अपनी शान के बराबर नहीं मानते थे.

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान साहब ने कहा कि शास्त्रीय संगीत अवाम की नहीं ख़ास की कला है. यह मेलों, ठेलों और नौटंकियों के लिए नहीं है. इसे सुनने के लिए, इसका शौक़ रखने वाले दो सौ से तीन सौ लोग महफ़िल सजाते हैं. इस पर, नौशाद ने कहा कि उस्ताद अपनी महान कला से भारत की तब की 45 करोड़ जनता को वंचित मत रखिये. संक्षेप में यह कि 'मुग़ल.ए.आज़म' के लिए उस्ताद की आवाज़ रिकॉर्ड करने का भुगतान 25 हज़ार रुपये अदा किया गया था. उस समय, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी जैसे मुख्यधारा के गायक चार सौ से पांच सौ रुपये फीस ले रहे थे.

मुग़ल-ए-आज़म जिसे फ़िल्मी इतिहास में एक क्लासिक की हैसियत हासिल है, उसे यादगार बनाने के लिए उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान की आवाज़ ने भी अपना जादू दिखाया था.

जहां 40 गुरुवार तक दीप जलाने से, मन्नत मांगने वाला सुरीला हो जाता है

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का जन्म बाबा बुल्ले शाह के शहर क़सूर में 2 अप्रैल, 1902 को हुआ था. शुरुआत में, उनके घराने को 'कसूर घराना' कहा जाता था, जो बाद में पंजाब के मशहूर पटियाला घराने में विलय हो कर उपमहाद्वीप के संगीत में प्रामाणिक और सबसे अलग घराना कहलाया.

उनके पूर्वज फाजिल पीरदाद गजनी से आ कर कसूर में बस गए थे. उनके बारे में मशहूर है कि वो दरवेश क़िस्म के गायक थे जो जंगलों में चले गए थे.

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के पोते मज़हर अली ख़ान ने बीबीसी को बताया कि यह बाबा बुल्ले शाह के समय की घटना है. कसूर और आसपास के क्षेत्र में मशहूर था कि जो कोई बाबा फाजिल पीरदाद की कब्र पर 40 गुरुवार तक दीप जलाएगा, क़ुदरत उसे सुर और ताल आता करेगी.

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के पिता अली बख्श ख़ां और चाचा उस्ताद काले ख़ां अपने समय के बेमिसाल गायक थे. दोनों पटियाला घराने के उस्ताद फतेह अली ख़ां के शागिर्द बने, जिससे उपमहाद्वीप के संगीत को और भी विस्तार मिला.

मियां तानसेन, अमीर खुसरो और उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान

शास्त्रीय और अर्ध-शास्त्रीय संगीत के इतिहास पर नज़र डालें, तो सदियों में ये तीन चरित्र अहम दिखाई देते हैं. मियां तानसेन को पूर्वी संगीत का पूर्वज माना जाता है, अमीर खुसरो ने साज़, उपकरण और राग का आविष्कार किया, जबकि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान को गायक और अविष्कारक दोनों में प्रामाणिक उस्ताद माना जाता है. बड़े ख़ान साहब के बाद, जिसने भी गाया उन्हीं की तरह गाया.

शाम चौरासी घराने के उस्ताद नजाकत सलामत हों या पटियाला घराने के अमानत अली फतेह अली, सभी ने उनके रंग से रंग मिलाया. उस्ताद जी का उपनाम 'सब रंग' था और उनका संगीत सच में उनके नाम की तरह था. उनके संगीत में हर रंग था. संगीत की दुनिया के बड़े-बड़े गायक. खूब अभ्यास करने वाले साज़िंदे, संगीतकार और फिल्मी जगत के गायक सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बड़े ख़ान साहब के शागिर्द बने.

हालांकि बड़े गुलाम अली ख़ान फिल्मी संगीत के खिलाफ थे और उस समय की नई शैली को झूठ और कोढ़ कहते थे. लेकिन फिल्म निर्माताओं ने उस्ताद बड़े गुलाम के संगीत, राग, रागनियों और विशेष रूप से ठुमरियों से सीखते हुए, फिल्मी संगीत को एक बेहतरीन कला का दर्जा दिलाया.

हम हुए, तुम हुए कि मीर हुए

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का एक पूरा दौर प्रशंसक रहा है. उपमहाद्वीप में कोई ऐसा नहीं है जो उनकी कलात्मक महानता से इंकार करता हो. मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां उनकी शागिर्द थी. लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्नाडे, किशोर कुमार, आशा भोंसले, मेंहदी हसन, तुफैल नियाज़ी, परवीन सुल्ताना, उस्ताद हुसैन बख्श ग्लू, गुलाम अली, जगजीत सिंह, हरि हरन, सुरेश वाडेकर, उस्ताद नुसरत फतेह अली ख़ान, उस्ताद राहत फ़तेह अली ख़ान, उस्ताद राशिद अली ख़ान, पंडित जसराज, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, शिवकुमार शर्मा, तबला वादक उस्ताद जाकिर ख़ान, उस्ताद ताफू, उस्ताद तारी ख़ान, पन्ना लाल घोष, सितारा देवी, भीमसेन जोशी समेत हर कोई उन्हें पसंद करने के साथ-साथ उनकी कला से सीखता हुआ दिखाई देता है.

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के बारे में लता मंगेशकर की यादें

91 वर्षीय लता मंगेशकर के मधुर और सुरीले लहजे की खनक आज भी बरकरार है. टेलीफोन पर बात करते हुए उनकी मधुर आवाज़ कानों में रस घोल रही थी.

लता मंगेशकर कहती हैं कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान जैसे कलाकार रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते.

उन्होने कहा कि "मैं वो भाग्यशाली हूं जिसने उन्हें कई बार सामने बैठ कर सुना है. उस्ताद जी मुझसे बहुत प्यार करते थे और मुझे अपनी बेटी की तरह मानते थे. वे मुझसे कहते थे कि लता तुम मेरी बेटी हो."

लता मंगेशकर ने बताया कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ने उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर की बरसी पर गाया था.

"मुझे याद है उस्ताद जी पंडाल में सामने बैठे थे और मैं स्टेज पर गा रही थी. मेरे माथे पर पसीना था और पैर काँप रहे थे. खुदा-खुदा करके, मैंने गाना ख़त्म किया और मेरी जान में जान आई. मैं गाते समय कभी घबराती नहीं थी, लेकिन उस दिन मेरे साथ ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सामने ख़ान साहब विराजमान थे."

मेरे बाद, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ने गाया और ऐसा गाया कि इंसानों के साथ-साथ, उन्हें हवाओं और पक्षियों ने भी सुना. ख़ान साहब ने शुरुआत में, ख्याल गायकी में राग सुनाया और फिर गाना गाते हुए उन्होंने लयकारी का भी लाजवाब प्रदर्शन किया. इसके बाद ख़ान साहब ने ठुमरियां पेश की, ठुमरी गाने में तो उन्हें कमाल की महारत थी. पंडित दीनानाथ मंगेशकर की याद में आयोजित इस समारोह में, उस्ताद जी ने राग और ठुमरी गाने के बाद गजलें भी सुनाई थी, वह एक यादगार कार्यक्रम था.

उस्ताद जी ने लता मंगेशकर से कहा, "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती."

लता जी से जब पूछा गया कि क्या आपके गाने की तारीफ़ करते हुए उस्ताद जी ने ये कहा था कि "कम्बख़्त कभी बेसुरी नहीं होती", तो लता जी हंसी.

फिर अपनी जादू भरी आवाज़ में कहने लगी, "यह बात मुझे एक पंडित जी ने बताई थी कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान साहब ने मेरे कुछ फिल्मी गाने सुने और कहा कि कम्बख़्त लता कभी बेसुरी नहीं होती."

यह बात करते समय लता जी को पंडित जी का नाम भी याद आ गया तो उन्होंने बताया कि बड़े ख़ान साहब ने यह बात पंडित जसराज जी से कही थी.

"पंडित जी से मैंने पूछा था कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ने मुझे 'कम्बख़्त' कहा था. इस पर पंडित जी ने जोर देते हुए कहा कि हां उस्ताद जी ने तुम्हे 'कम्बख़्त' ही कहा था. लता जी ने कहा कि जाहिरी तौर पर 'कमबख़्त' का अर्थ कुछ और है लेकिन यह एक दरवेश कलाकार का कोड है, जिसे मैं अपने लिए बहुत बड़ी खुशनसीबी मानती हूं. सुरों और संगीत के इतने महान उस्ताद ने मुझे यह कहा कि मैं सुर में गाती हूं, तो यह मेरे लिए उनकी दुआ ही थी."

उपमहाद्वीप का संगीत उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का आभारी रहेगा

उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान की गायन शैली ने उपमहाद्वीप के शास्त्रीय, अर्ध-शास्त्रीय और विशेष रूप से फिल्मी संगीत पर क्या प्रभाव डाले?

इस सवाल के जवाब में लता जी ने कहा कि फिल्मी संगीत ठुमरी से लिया गया है. जैसा कि मैंने कहा, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ठुमरी के भी महान गायक थे, उनके द्वारा गायी हुई ठुमरी बहुत से संगीतकारों ने गायी हैं.

"का करूं सजनी आये न बालम", यह राग जंगल भैरवी में ख़ान साहब की गायी हुई मशहूर ठुमरी है. इसे फ़िल्म में शामिल किया गया था.

"प्रेम जोगन बन के सुंदर पिया ओर चली रे", उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ने यह ठुमरी राग सोहनी में गायी थी. यह ठुमरी नौशाद साहब ने फिल्म 'मुगल-ए-आजम' के लिए ख़ान साहब से गवायी थी.

इसी तरह, ख़ान साहब की राग भैरवी में गायी ठुमरी, "नैना मोरे तरस गए आजा बलम परदेसी" भी फिल्म में शामिल की गई थी.

बड़े ख़ान साहब फिल्मी संगीत को झूठ और शास्त्रीय संगीत को सच कहा करते थे

भारत में फिल्मी संगीत तब अपनी प्रारंभिक अवस्था में था. उन दिनों, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान ने अपने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा था कि राग और शास्त्रीय संगीत सच्चाई है और फिल्म संगीत खोट, कोढ़ और झूठ है, इसलिए यह पनप नहीं पाएगा.

इस सवाल के जवाब में लता जी ने कहा कि ऐसा मैंने नहीं सुना कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान फिल्मी संगीत के खिलाफ थे.

उन्होंने कहा कि "ख़ान साहब मेरी तो हमेशा तारीफ ही करते थे. जैसा कि मैंने बताया, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान मुझे अपनी बेटियों की तरह मानते थे और मेरे पास उनकी एक तस्वीर है जिसमे उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा हुआ है. वह तस्वीर मेरे लिए एक संपत्ति की हैसियत रखती है."

नूरजहां को गंडा उस्ताद जी ने बांधा, लता जी को गंडा किसने बांधा?

लता मंगेशकर ने बताया कि नूरजहां को उस्ताद जी ने गंडा बांधा था और वैसे भी वह जगत उस्ताद थे और सभी ने जाने या अनजाने में उनसे सीखा है. लेकिन मुझे सबसे पहले मेरे पिता दीनानाथ मंगेशकर ने पांच साल की उम्र में गंडा बांधा था.

बाद में, मुझे अमानुल्लाह ख़ान साहब भिंडी बाजार वालों ने और अमानत अली ख़ान साहब से भी गंडा बंधा मैंने उनसे भी सीखा.

लता जी ने बताया कि वह कई वर्षों से 23 अप्रैल को उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान और 24 अप्रैल को अपने दिवंगत पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बरसी मना रही हैं. इन कार्यक्रमों में उपमहाद्वीप के महान कलाकार शामिल होते हैं, लेकिन इस बार क्योंकि पूरे विश्व समेत भारत भी कोविड-19 के गंभीर हमले का सामना कर रहा है, इसलिए इस बार संगीत समारोह नहीं हो पायेगा.

जब बड़े ख़ान साहब ने 9 साल की परवीन सुल्ताना को गाने के लिए कहा

भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका बेगम परवीन सुल्ताना, जो ख्याल गायकी के साथ-साथ ठुमरी और गज़ल गाने में भी मशहूर हैं, उनकी द्वरा गायी गई एक ग़ज़ल जिसे आरडी बर्मन ने कम्पोज़ किया था: "हमे तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते" बहुत मशहूर हुआ था.

बेगम परवीन सुल्ताना ने कहा कि ज़िन्दगी का कोई दिन ऐसा नहीं जब मैंने उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का कोई राग या ठुमरी न सुनी हो.

वो कहती हैं "मैं तो उनके संगीत की दीवानी हूं और उनके गीतों को सुनकर मैं बड़ी हुई हूं." मैं वो खुशनसीब हूं कि मुझे उस्ताद जी के सामने गाने का भी मौक़ा मिला. मेरे पिता इकरामुल्लाह मजीद भी बड़े ख़ान साहब के प्रशंसक थे. ख़ान साहब ने मेरे पिता से कहा कि परवीन कुछ गा कर सुनाये, तो मैंने गाना सुनाया. गाना सुनने के बाद उन्होंने मुझे दुआ दी, उस समय मेरी उम्र नौ साल थी."

"ख़ान साहब ने कहा था कि परवरदिगार ने इसे सुंदर आवाज दी है ये बहुत नाम करेगी. ख़ान साहब से मेरी मुलाक़ातें कलकत्ता और मुंबई में होती रही. शुरुआती तौर पर, मुझे पटियाला घराने की शिक्षा मिली. मुझे चिन्मय लहरी ने गंडा बांधा था, जो उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के शागिर्द थे. उनके बाद मैंने अपने पति उस्ताद दिलशाद ख़ान से भी सीखा. मेरे पति भी उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के प्रशंसक हैं."

तबला वादक जाकिर ख़ान ख़ान साहब के घर क्या करने जाते थे?

अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारतीय तबला वादक उस्ताद जाकिर ख़ान ने कहा कि उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान सदियों के कलाकार हैं. उन्होंने शास्त्रीय संगीत को विकसित किया, इसे निखारा, संवारा लेकिन परंपरा से जोड़ कर भी रखा.

ज़ाकिर ख़ान ने कहा कि "मेरे पास बड़े ख़ान साहब की बहुत अच्छी यादें हैं. जब मैं बहुत छोटा था, तो अपनी माँ और पिता उस्ताद अल्लाह रक्खा ख़ान के साथ मुंबई मालाबार में बड़े ख़ान साहब के बंगले पर जाता था. हम सब बहन भाई उन्हें फूफा जान कहते थे. थोड़े बड़े हुए, तो फूफा जान कहना बंद कर दिया और बड़े ख़ान साहब कहना शुरू कर दिया, क्योंकि हम जान चुके थे कि वह कितने महान कलाकार हैं."

"जब और बड़ा हुआ, तो सार्वजनिक परिवहन से ख़ान साहब के यहां चला जाता था. वह हर समय रियाज़ कर रहे होते थे और मुझे बगल में बैठा लेते थे."

ज़ाकिर ख़ान ने गर्व के अंदाज़ में हंसते हुए कहा कि ख़ान साहब तो अपना रोज़ाना का रियाज़ कर रहे होते थे और हमारे जीवन के लिए यह एक महान स्मृति के रूप में संरक्षित हो रहा था.

बड़े ख़ान साहब ने पाकिस्तान छोड़कर भारतीय नागरिकता क्यों ली?

संयुक्त भारत में, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान प्रिय गायक और जगत उस्ताद माने जाते थे. जैसा कि ऊपर कहा गया है कि 'राष्ट्रपिता' गांधी जी और पूरा देश उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान का इंतज़ार कर रहा था.

दूसरी ओर, पाकिस्तान में, राज्य, सामाजिक और सार्वजनिक स्तर पर संगीत और इससे जुड़े लोगों को तुच्छ समझ कर 'मीरासी' लिखा और कहा जाता था, लेकिन इसके बावजूद उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान और दूसरे बहुत से कलाकार, जिनमे नूरजहां, उस्ताद फतेह अली ख़ान, अमानत अली ख़ान, उस्ताद नज़ाकत सलामत, उस्ताद फ़तेह अली ख़ान, मुबारक अली ख़ान (उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान के पिता और ताया) उस्ताद ग़ुलाम हसन शंगन, मेहदी हसन, तुफ़ैल नियाज़ी अपने घर छोड़कर पाकिस्तान चले गए.

समय का पहिया घूमा, ज़िंदगी आगे बढ़ी, लेकिन संकीर्णता बढ़ती गई और संकीर्णता ने धीरे-धीरे उग्रवाद का रूप ले लिया.

यदि व्यक्तिगत रूप से इस ऐतिहासिक घटना की समीक्षा करें, कि इतने महान उस्ताद ने अपनी जन्मभूमि छोड़ कर भारतीय नागरिकता क्यों ली? तो सच कुछ इस तरह है.

असल घटना क्या थी?

ज़ेडए बुखारी रेडियो पाकिस्तान के पहले जनरल मैनेजर थे. वह पतरस बुखारी के भाई होने के साथ-साथ एक बड़े प्रसारक भी थे. वह उर्दू, अंग्रेजी, अरबी और फारसी के अलावा भी भाषाएं जानते थे और उन्हें संगीत में भी रुचि थी.

उस समय, राज्य स्तर पर जानबूझ कर यह प्रयास भी किया जा रहा था कि हम पाकिस्तानी एक अलग राष्ट्र हैं, जिनका अपना धर्म और अपनी संस्कृति है.

इस अभियान के तहत, शास्त्रीय संगीत में ख़याल गायकी और ठुमरी को भारतीय संगीत समझते हुए ग़ज़ल को जानबूझकर बढ़ावा दिया जा रहा था. विभिन्न राग-रागनियों जिनके नाम संस्कृत और हिंदी में थे, उन्हें पाकिस्तानी नाम दिए जा रहे थे.

इस संबंध में, ज़ेडए बुखारी ने 'राग दरिया' के नाम से एक पुस्तक का संकलन किया, जिसमें लगभग सौ बंदिशें शामिल की गई. संगीत के उस्तादों को इस पर आपत्ति थी कि वे अधूरे अंतरे थे, जिनमें ज़्यादातर नक़ल करके उनमे उर्दू, फारसी और अरबी तरकीब इस्तेमाल की गई थी.

रागों और रागनियों से संस्कृत और हिंदी शब्दों को ख़त्म करने की मुहिम चलाई गई.

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान अपने कसूर और पटियाला घराने की स्थाइयां गाते थे. इनमे जगह-जगह संस्कृत और हिंदी शब्द और तरकीब इस्तेमाल की गई थी. शास्त्रीय संगीत इस क्षेत्र के महान अतीत की एक सांस्कृतिक विरासत थी, जिसे जबरन बदलने की कोशिश की जा रही थी.

उसी माहौल में, ज़ेडए बुखारी और उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के बीच तकरार हो गई. उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान के पोते नक़ी अली ख़ान बताते हैं कि बड़े ख़ान साहब हाथ में छड़ी लिए बुखारी साहब के कमरे का दरवाज़ा खोल कर अंदर गए, तो ज़ेड बुखारी ने अजीब अंदाज़ में कहा, "आप बिना इजाज़त मेरे कमरे में कैसे दाख़िल हो गए?"

"बड़े ख़ान साहब को ये अंदाज़ बुरा लगा कि एक सरकारी कर्मचारी, जो वास्तव में लोगों का सेवक होता है, उसके ये लक्षण. बड़े ख़ान साहब ने कहा कि बुखारी साहब आप जैसे बीए तो इस देश में हज़ारों लाखों होंगे, लेकिन ग़ुलाम अली एक ही हैं."

अय्यूब औलिया ने बताया कि वरिष्ठ संगीत निर्देशक रफीक गज़नवी ने देखा कि बड़े ख़ान साहब जनरल मैनेजर के कमरे के बाहर इस विचार से बैठे हैं कि मामले को ख़त्म किया जाये, लेकिन दूसरी ओर उस अधिकारी ने शाही रवैय्या अपना कर उपमहाद्वीप के इस महान कलाकार को नज़रअंदाज़ कर दिया.

रेडियो पाकिस्तान के पूर्व महानिदेशक मुर्तजा सोलंकी ने बताया कि बड़े ख़ान साहब विवाद ख़त्म करने के लिए ज़ेडए बुखारी के दफ़्तर गए थे, लेकिन उन्होंने इतने महान कलाकार को बाहर बैठाया और चपरासी से कहा कि "बैठे रहने दो मीरासी को बाहर."

कहते हैं कि यह आवाज उस्ताद साहब ने सुन ली थी और वहीं उन्होंने फैसला किया कि अब वह पाकिस्तान में नहीं रहेंगे.

टाटा बिरला और भारत सरकार ख़ान साहब को क्या प्रस्ताव देते रहे?

बड़े ख़ान साहब के पोते, नकी अली ने बताया कि भारतीय व्यापार अभिजात वर्ग, जिनमें टाटा और बिरला इंडस्ट्रीज़ के मालिक समेत भारत सरकार के अग्रणी भी शामिल थे. वो हमेशा ख़ान साहब को पेशकश करते थे कि ख़ान साहब आप भारत आ जाएं, देश आपको पलकों पर बैठायेगा. लेकिन ख़ान साहब उनकी पेशकश पर ध्यान नहीं देते और अपने घर पाकिस्तान लाहौर जाते रहे.

लाहौर उस समय पूरे क्षेत्र में संगीत का गढ़ माना जाता था. और मशहूर था कि जिसने लाहौर में झंडा नहीं गाड़ा वो कामयाब नहीं हुआ.

ख़ान साहब को लाहौर बहुत पसंद था, वह पाकिस्तान से भी मुहब्बत करते थे. इसलिए भारत की तरफ से सभी प्रस्ताव ठुकरा कर वहां वापस जाते रहे. लेकिन जब उन्हें मजबूर किया गया, तो वह पानी के जहाज़ के ज़रिये कराची से मुंबई चले गए. जहां भारतीय व्यापार अभिजात वर्ग ने उन्हें सिर आँखों पर बिठाया और सरकारी तौर पर मुंबई मालाबार में बंगले के साथ-साथ भारतीय नागरिकता और विशेषाधिकार दिए.

इंदिरा गांधी का पत्र और 56 साल बाद उनकी आवाज़ का पाकिस्तानी रेडियो पर गूंजना

66 वर्ष की उम्र में, उस्ताद साहब 23 अप्रैल, 1968 को इस नश्वर दुनिया से चले गए. संगीत की दुनिया में उनकी मृत्यु से शोक की लहर दौड़ गई. उस्ताद साहब को भारत में सरकारी और राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया.

भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 अगस्त, 1969 को लिखित तौर पर एक पत्र के ज़रिये, उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान को श्रद्धांजलि देते हुए हर साल उनका दिन मनाने की घोषणा की.

मुर्तजा सोलंकी ने बताया कि 2009 में जब वह रेडियो पाकिस्तान के महानिदेशक थे, तब उन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली ख़ान के गाये हुए राग और रागनियों पर से प्रतिबंध हटा दिया था.

1953 में जब गुलाम अली ख़ान भारत आए, तो रेडियो पाकिस्तान ने उनपर अघोषित प्रतिबंधित लगा दिया था. ज़ेडए बुखारी ने इस संबंध में कोई लिखित आदेश तो जारी नहीं किया था लेकिन लगभग 56 वर्षों तक रेडियो पाकिस्तान को उस्ताद साहब की अमर आवाज़ से वंचित रखा गया.

आधी सदी से अधिक अरसे बाद, मुर्तजा सोलंकी ने भी बिना किसी लिखित आदेश के रेडियो पाकिस्तान को इस प्रतिबंध से आज़ाद कर दिया.

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