गोलियों-गालियों, अपराध पर बनी वेब सीरीज़ में दर्शकों की दिलचस्पी क्यों?

वेब सिरीज़
    • Author, सूर्यांशी पांडे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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इंटरनेट पर स्ट्रीम होने वाली वेब सीरीज़ पर नियमानुसार सेंसर बोर्ड अपनी कैंची नहीं चला सकता. इससे निर्माता, निर्देशकों और पटकथा लेखकों ने अपनी कल्पना की कूची को और गहराई से उकेरते हुए मिर्ज़ापुर, सेक्रेड गेम्स, पाताल लोक जैसी क्राइम से प्रेरित वेब सीरीज़ बनाई.

आख़िर क्या वजह है कि दर्शकों को इस तरह की वेब सीरीज़ इतना क्यों लुभा रही हैं?

भारत की ऑनलाइन डेटा सर्वे कंपनियों में से एक, क्रोम डीएम स्टडी के मुताबिक 65% घरों में टीवी के साथ वेब सीरीज़ देखी जाती है, जिसमें क़रीब 80% लोगों को कॉमेडी वेब सीरीज़ पसंद है तो क्राइम, थ्रिलर वाली वेब सीरीज़ की लोकप्रियता हाल में बहुत ज़्यादा बढ़ी है.

ये सर्वे 2017 का है जो शहरी इलाक़ों में रह रहे 16-44 साल की उम्र के लोगों पर आधारित है.

2019 में अमेरिकी रिसर्च कंपनी एस.ई.एम रश स्टडी के सर्वे के मुताबिक़, ऑनलाइन प्लैटफॉर्म पर सबसे ज़्यादा सर्च की गई वेब सीरीज़- सेक्रेड गेम्स, मिर्ज़ापुर, क्रिमिनल जस्टिस, लस्ट स्टोरीज़ और मेड इन हेवन थी.

लेकिन जहाँ क्राइम की ख़बरों को लोग देखना या पढ़ना उतना पसंद नहीं करते जितना इससे जुड़ी वेब सीरीज़ में वो रूचि दिखाते हैं.

आख़िर क्या है इसकी वजह? जवाब किसी सस्पेंस से कम नहीं है! इसे हम मनोविज्ञान के ज़रिए तलाशेंगे. इस खोज-बीन में आप इंसान के व्यक्तित्व या कहें कि ख़ुद के बारे में बहुत कुछ जान सकेंगे.

तो चलिए करते हैं इसकी पड़ताल...

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इमेज स्रोत, PAtallok poster

थ्रिलर क्यों लिखते हैं लेखक?

2020 में लोकप्रिय हुई वेब सीरीज़ 'पाताल लोक' के लेखक, सुदीप शर्मा शाहिद कपूर की 'उड़ता पंजाब,' और अनुष्का शर्मा की 'एन.एच 10' जैसी फ़िल्मों की पटकथा भी लिख चुके हैं.

सुदीप शर्मा कहते हैं कि पाताल लोक बीते वर्ष काफ़ी चर्चा में रही. उनसे हमने जब यह पूछा कि उनकी थ्रिलर स्क्रिप्ट लिखने में रुचि क्यों है तो उन्होंने बताया कि बचपन से ही उनकी रूचि सस्पेंस, क्राइम जैसे विषयों में रही है. वे हॉलीवुड डायरेक्टर मार्टिन स्कोर्सेसे की फ़िल्मों (कसीनो, टैक्सी ड्राइवर, आइरिशमैन) और बॉलीवुड के डायरेक्टर रामगोपाल वर्मा कि फ़िल्मों (सत्या, कंपनी) से प्रभावित रहे हैं.

इस तरह की फ़िल्मों की पटकथा लिखने के बारे में उन्होंने कहा कि "ये लेखक की सोच को चुनौती देते हैं- थ्रिलर प्लॉट लिखना और उसमें रोमांच की स्याही उकेरना चुनौतीपूर्ण लगता है."

दर्शकों के बीच अपराध, राजनीति पर बनी वेब सीरीज़ की प्रसिद्धि पर वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि लोग अपने नकारात्मक हिस्से को छिपाकर रखते हैं. यह भाव किसी काल्पनिक सीरीज़ के ज़रिए सामने आता है. शायद लोग इसलिए ऐसी फ़िल्में या सीरीज़ देखना पसंद करते हैं. चूँकि ऐसी सीरीज़ में कोई और अपराधों का शिकार होता दिखता है, तो उन्हें यह ज़रिया अपने लिए सुरक्षित भी लगता है."

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अब जानते हैं आपके मन की बात...

सुदीप शर्मा के इस तर्क में कहीं ना कहीं मनोविज्ञान का अंश दिख रहा है. चलिए मनोवैज्ञानिक तरीके से इसे समझने कि कोशिश करते हैं.

मनोविज्ञान और दर्शनशास्त्र के कई सिद्धांत हैं जो इंसान के व्यवहार का शोध के ज़रिए कारण बताते हैं.

जैसे किसी पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा हो लेकिन आप उस पर निकाल नहीं सकते. और आपका पूरा दिन इससे ख़राब हो जाता है. फिर आपने एक क्राइम वेब सीरीज़ देखी और इससे आपने अच्छा महसूस किया.

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इमेज स्रोत, Tandav poster

मशहूर दार्शनिक अरस्तु (एरिस्टोटल) के केथार्सिस सिद्धांत (विरेचन के सिद्धांत) के अनुसार भावों का शुद्धिकरण किसी भी त्रासदी का उद्देश्य होता है. उनका मानना था कि स्वास्थ्य के लिए जिस प्रकार शारीरिक मल का निष्कासन और शोधन ज़रूरी है, उसी प्रकार मानसिक मल का निष्कासन और शोधन ज़रूरी है. इंसान को कला और साहित्य के ज़रिए अपने विभिन्न भाव जैसे कि ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध, क्रूरता इत्यादि, जैसे विकारों को दूर करना चाहिए.

यानी जब हम अपनी नकारात्मक ऊर्जा को व्यक्त नहीं कर पाते तो इसे, आर्ट, युद्ध पर बने वीडियो गेम खेलकर या ऐसी वेब सीरीज़/फ़िल्म देखकर जिससे हमारे उन भावों को व्यक्त करने का कोई साधन मिले, बाहर निकालने की कोशिश करते हैं.

इसमें कई चीज़ें हो सकती हैं, ज़रूरी नहीं कि फ़िल्म या चित्र बनाकर ही आप भावमुक्त हो सकते हैं, हर इंसान का अपना-अपना तरीक़ा हो सकता है.

मनोविश्लेषक कार्ल युंग के एक सिद्धांत के मुताबिक हमारे अवचेतन मन में कई बातें, चित्र ऐसे गड़े हैं जो पर्यावरण, अपने सामाजिक परिवेश या पूर्वजों से अर्जित किए होते हैं.

यह भाव, चित्र अमूमन हर व्यक्ति में होते हैं. जैसे परछाई या किसी किरदार का इस्तेमाल डरावनी फ़िल्म में होता है जिसका सीधा संबंध हमारे अवचेतन मन में मौजूद कुछ भावनाओं से होता है. इसलिए हम डरावनी फ़िल्मों में ऐसी छवियों या व्यक्तित्व को देखकर रोमांच या डर की अनुभूति करते हैं. हमारे सचेत मन को इसका पता नहीं होता कि यह व्यक्तित्व भी हमारे भीतर छिपा है.

क़ानून तोड़ने की भूख मिटाती है अपराध-युक्त वेब सीरीज़?

दिल्ली के माइंडफुल टीएमएस में क्लिनिकल साइकलॉजिस्ट (मनोवैज्ञानिक) शिवाली देवगन बताती हैं कि इन सिद्धांतों का प्रयोगसिद्ध रूप से परीक्षण नहीं हो सकता, लेकिन कई लोगों पर रिसर्च कर अपराध और ख़ून से सनी वेब सीरीज़ के लोकप्रिय होने के कारण का ज़रूर पता चलता है.

उनके मुताबिक, आमतौर पर लोग ऐसी वेब सिरीज़ इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि-

  • वह अपराध की मनोस्थिति को समझ कर अपनी निजी ज़िंदगी में सुरक्षित रहने का तरीक़ा ढूंढना चाहते हैं. उनको सीरियल किलर के भीतर का द्वंद समझने में मज़ा आता है.
  • कुछ लोगों को क़ानून तोड़ने और बाग़ी होने का मन करता है. वास्तव में वे इस व्यक्तित्व को सामने नहीं ला पाते, तो वेब सीरीज़ में ऐसे कंटेंट को देखना पसंद करते हैं.
  • कुछ लोग अपनी बुरी दबी ख़्वाहिशों को वेब सीरीज़ के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करते हैं.
  • कुछ केवल अपनी दिनचर्या से ऊबकर, यूं ही मनोरंजन के लिए देखते हैं.
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इमेज स्रोत, Conjuring poster

सच्ची घटना को देख की आँख बंद, डरावनी फ़िल्म पूरी देख डाली...

1994 में अमेरिका के तीन समाजिक मनोविश्लेषकों (जोनाथन हाइट, पॉल रोज़िन और सी. मक्ले) ने एक विश्वविद्यालय के बच्चों के साथ शोध किया.

उन्होंने पहले बच्चों को सच्ची घटनाओं पर आधारित डॉक्यूमेंट्री दिखाई जिसमें जानवरों पर अत्याचार हो रहे थे. इसमें गाय को कसाईख़ाने में मारना, बंदर के सिर पर हथौड़े से हमला करने जैसे दृश्य थे.

क़रीब 90% बच्चे उस डॉक्यूमेंट्री को पूरा देख ही नहीं पाए, कई बच्चों ने कुछ ही मिनट में आंखें बंद कर ली थीं.

इसके बाद उन बच्चों को हॉलीवुड की एक डरावनी फ़िल्म दिखाई गई. शोधकर्ताओं के उम्मीदों के विपरीत, उन बच्चों ने पूरी फ़िल्म देखी जबकि उसमें कई भयानक दृश्य थे.

इस रिसर्च से वो इस निष्कर्ष पर आए कि चूँकि हॉलीवुड की फ़िल्म काल्पनिक थी इसलिए बच्चों के मनोभाव पर उनका असर उतना भयावह नहीं था जितना कि उनको सच्ची घटना देखकर लगा.

वो कहीं न कहीं इस बात से संतुष्ट थे कि यह सारे दृश्य काल्पनिक हैं.

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इमेज स्रोत, made in heaven Poster

पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं को ज़्यादा पसंद है रियल क्राइम शो?

अमेरिका में सिविक साइंस नाम की कंपनी के शोध के मुताबिक सच्ची घटना पर आधारित क्राइम शो के औसतन दर्शक 18-34 साल की महिलाएं हैं.

अमेरिका की अमैंडा विकैरी जो पेशे से क्राइम मनोचिकित्सक हैं, उन्होंने एक शोध कर पता लगाया कि साल 2019 में सच्ची घटनाओं पर आधारित क्राइम शो के लिए क़रीब 16% महिलाओं की और रूचि बढ़ी है.

इसका कारण वह बताती हैं कि महिलाएं पुरुषों कि अपेक्षा अपनी सुरक्षा को लेकर ज़्यादा संजीदा रहती हैं और इसलिए वह सच्ची घटनाओं पर आधारित क्राइम शो पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा देखती हैं.

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इमेज स्रोत, Gullak Poster

क्या निगेटिव वेब सीरीज़ सेहत के लिए सही हैं?

मनोविश्लेषकों का कहना है कि हमारे शरीर में हैप्पी हार्मोन होते हैं (सेरोटोनिन, ऑक्सीटोक्सीन, डोपामाइन, एंडोर्फिन).

जब भी कोई चीज़ हमें रोमांच से भर देती है या सस्पेंस जैसा अनुभव देती है तो यह हैप्पी हार्मोन शरीर में अच्छी ऊर्जा भर देते हैं. लेकिन किसी भी निगेटिव सीरीज़ को ज़्यादा देखने से जो तनाव शुरू में कम होता दिखता है, वह बढ़ भी सकता है.

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हमें निरंतर अपने व्यवहार को देखते रहना चाहिए, अगर आप वास्तविकता से नाता तोड़ रहे हैं तो ऐसी सीरीज़ कुछ हफ़्तों के लिए देखना बंद कर दीजिए.

जहाँ अपराध पर आधारित वेब सिरीज़ का बोलबाला है, वहीं 'मेड इन हेवन,' टीवीएफ़ कि 'ये मेरी फ़ैमली,' 'गुल्लक' जैसी वेब सीरीज़ भी लोकप्रियता की रेस में पीछे नहीं हैं.

हाल ही में सोनी लाइव पर रिलीज़ हुई 'गुल्लक 2' को फ़िल्म आलोचकों से लेकर दर्शकों तक का ख़ूब प्यार मिल रहा है. इस में ख़ून नहीं- ख़ून के रिश्तों की खट्टी-मीठी उलझनों की कहानी है, अपराध नहीं- मान-सम्मान में घुली हंसी-ठहाकों कि कहानी है.

'गुल्लक 2' के लेखक दुर्गेश सिंह का कहना है कि, "भारत जैसे देश में जहाँ क़रीब 20 साल तक टीवी पर सीआईडी जैसा शो चला, वहाँ क्राइम शो तो लोगों को पसंद आएगा. लेकिन काल्पनिक क्राइम कि कहानियों के बूते वेब सीरीज़ की दुनिया चल नहीं पाएगी. अगर क्राइम वेब सीरीज़ भारत में बनती हैं तो वह 'पाताल लोक' जैसी हो जो बेहद संजीदगी और रिर्सच करके बनाई गई वेब सिरीज़ है."

आख़िर में वह कहते हैं कि लोगों को हंसाना, रुलाने से ज़्यादा मुश्किल है. ऐसा कर पाने में सफल रहने वालों को दर्शकों का भरपूर प्यार मिलता है जो यह बताता है कि आख़िरकार लोग संतोष और ख़ुशी की खोज में ही रहते हैं.

BBC ISWOTY

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