'थप्पड़' फ़िल्म ने मर्दों के डर पर उंगली रख दी है

तापसी पन्नू

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    • Author, मनीषा पांडेय
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
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ये थप्पड़ फ़िल्म का रिव्यू नहीं है. बस फिल्म से गुज़रते हुए उठे कुछ सवाल हैं. सवाल जो परेशान करते रहे, सवाल जो उत्तर न मिलने की सूरत में दिल में कोई पुराना ज़ख़्म बनकर बैठ गए. सवाल, जिसे सबने ढका, सबने छिपाया, मानो वो कोई सवाल ही नहीं था.

ये कुछ 22 साल पुरानी बात है. मेरी कज़न की शादी थी. एक रात नाच-गाने की महफ़िल जमी और देर रात तक चलती रही. उसी बीच ये हुआ कि उस बड़े से हॉल के एक कोने में भाई ग़ुस्से में आए और उन्होंने भाभी को एक ज़ोर का थप्पड़ मार दिया.

उस शोर के बीच भी थप्पड़ की आवाज़ ऐसे सुनाई दी जैसे भरी महफ़िल में कोई गोली चला दे. अचानक मुर्दहिया सन्नाटा छा गया. गाना बंद, सब चुप. जैसे अचानक कर्फ्यू की घोषणा हुई हो और सब दृश्य से ग़ायब.

रात बीत गई. अगले दिन सब कुछ पहले जैसा ही हो गया. सब ख़ुश थे, सब सज रहे थे, सब शादी में मगन थे. घर की बड़ी-बुजुर्ग औरतें, घर की जवान औरतें, बहुएं, लड़कियां, घर के मर्द. सबने अपनी ख़ुशी की स्क्रिप्ट में से वो थप्पड़ ऐसे डिलीट किया कि मानो वो कभी था ही नहीं.

हालांकि, उसका निशान रह गया था. सिर्फ़ दिल पर नहीं, गोरी-चिट्टी भाभी के बाएं गाल पर भी. भाई ख़ासे कद्दावर, लहीम-शहीम मर्द थे. उनके थप्पड़ से भाभी का बायां गाल सूज गया था, आंखों के नीचे काला पड़ गया था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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फिर बस इतना ही हुआ कि उस बहन की शादी की तस्वीरों में भाभी की तस्वीर कहीं नहीं थी. उनकी आख़िरी तस्वीर बस थप्पड़ वाली रात के कुछ मिनट पहले की है.

पिछले 22 सालों में कितनी बार हम दीदी की शादी के एलबम से गुज़रे, लेकिन मुझे याद नहीं कि कभी किसी ने ग़लती से भी उस शाम का ज़िक्र किया हो.

मां ने इतना ही कहा कि उस रात भाभी का ऐसे सबके बीच हंसी-ठिठोली करना भाई को पसंद नहीं आया. कहते हुए पीड़ा से उनकी आंखें सिकुड़ गईं लेकिन ये सवाल उन्होंने भी नहीं किया कि मारा कैसे. थप्पड़ मारने का हक़ कैसे मिला.

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पुराना इतिहास

हालांकि इस देश के लाखों परिवारों की तरह हमारे परिवार में भी थप्पड़ का इतिहास पुराना है. ये न कोई नई बात है, न ही बड़ी बात.

हमारी कहानी में ऐसे तमाम थप्पड़ घर की दीवार पर जमी सीलन और फफूंद की तरह टंके हुए है, जिस पर औरतें अपनी ख़ामोशी और मुस्कुराहट का पर्दा डाले रहती हैं.

ज़्यादा वक़्त नहीं लगा ये समझने में कि घर की कोई औरत ऐसी नहीं कि जिसकी कहानी में कभी बात-बेबात उठे मर्द के थप्पड़ का ज़िक्र न हो.

दाल में नमक ज़्यादा हुआ तो थप्पड़ मार दिया, औरत ने पलटकर जवाब दिया तो थप्पड़ मार दिया, कोई बात मर्द के मन-मुताबिक़ न हुई तो थप्पड़ मार दिया.

थप्पड़ कभी भी, किसी भी बात पर उठ सकता था. बात किसी वाजिब वजह की नहीं थी, बात उस विशेषाधिकार की थी.

मर्द को अधिकार था. उसे दिया गया था और उसने पूरे हक़ और आत्मविश्वास से अपने पास सुरक्षित रखा था. थप्पड़ मारने वाले तो सवाल करते नहीं थे, जो खा रही थीं, उन्होंने भी नहीं किया क्योंकि सवाल करतीं तो जाती कहां.

घरेलू हिंसा

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बड़ा सवाल

थप्पड़ तो हर घर में पड़ रहा है, लेकिन एक थप्पड़ पर औरत घर से निकल जाए तो जाएगी कहां?

नॉर्वेजियन नाटककार हेनरिक इब्सन की नोरा ने तो बिना थप्पड़ खाए ही अपने पति हेल्मर का घर छोड़ दिया क्योंकि उसे लगा कि उस घर में उसकी हैसियत एक गुड़िया से ज़्यादा नहीं है.

इब्सन ने ये नाटक 'डॉल्स हाउस' 1879 में लिखा था जो बाद में फेमिनिस्ट डिसकोर्स का कल्ट बन गया. उस ज़माने में लोगों की इस नाटक के बारे में ये राय थी कि पति न तो पीटता है, न उसका कोई और अफ़ेयर है, न वो जालिम है. फिर नोरा को किस बात की इतनी ऐंठ थी?

जैसे इस फ़िल्म के इंटरवल में मेरे बगल में बैठे दो लड़के आपस में बात कर रहे थे कि ये कुछ ज़्यादा ही ड्रामा नहीं कर रहीं. इतना अच्छा हसबैंड है. ओवर लग रहा है यार.

मज़े की बात थी कि वो दो लड़के अकेले फ़िल्म देखने आए थे. अगर पत्नी या गर्लफ्रेंड हो तो उन्हें साथ लेकर नहीं आए थे. क्या पता रेकी करने आए हों, गर्लफ्रेंड को दिखानी चाहिए या नहीं.

इब्सन की कहानी तो नोरा के छोड़ने के साथ ख़त्म हो गई थी. कोई नहीं जानता कि उसके बाद नोरा का क्या हुआ. क्या नोरा के पास पढ़ाई-लिखाई, काम, नौकरी का कोई ज़रिया था? क्या नोरा के पिता ने अपनी संपत्ति में आधा हिस्सा नोरा को दिया था? कोई घर था उसके पास जहां वो जा सकती थी, अपनी आजीविका कमा सकती थी?

मि. हेल्मर तो काफ़ी सफल, धनी, कुलीन व्यक्ति थे. नोरा की पहचान इतनी ही थी कि वो मिसेज हेल्मर थी. ये पहचान छोड़ दे तो क्या बचा रह जाता है उसके पास?

नोरा की आगे की कहानी 2004 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाली ऑस्ट्रियन लेखिका एल्फ्रीडे येलेनिक ने लिखी. 1982 में उन्होंने एक नाटक लिखा, 'व्हॉट हैपेंड आफ्टर नोरा लेफ्ट हर हसबैंड.'

थप्पड़ मूवी का पोस्टर

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येलेनिक बताती है कि नोरा ने सिर्फ़ पति का घर नहीं छोड़ा था. उसने वो इकलौती ज़मीन छोड़ी थी, जहां वो इज्ज़त न सही, लेकिन सुरक्षा से खड़ी रह सकती थी.

जो उसने इज्ज़त चुनी तो सुरक्षा जाती रही. इतने भरे-पूरे संसार में पति का घर छोड़ और कोई जगह नहीं थी जहां उसने काम और सम्मान मिल सके. पिता का घर भी नहीं. पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं. येलेनिक की नोरा का अंत फैक्ट्री वर्कर का काम करने और बाद में एक अमीर मर्द की मिस्ट्रेस बनने में होता है.

कहानी में बहुत सी पेचीदा गलियां हैं, जहां जगह-जगह इस मर्दवादी समाज के नुमाइंदे खड़े उसे टेढ़ी निगाहों से देखते हैं, हर मर्द अकेली औरत जानकर मौक़ा पाते ही हाथ मारना चाहता है, हर किसी की जबान पर एक ही सवाल है, ''तुम औरत हो, वो तो ठीक है, लेकिन तुम किस मर्द की औरत हो?' जो किसी मर्द की औरत नहीं, उसे हर मर्द अपने बाप का माल समझता है.

इब्सन ने नोरा को घर से निकाल तो दिया, लेकिन पूछा नहीं कि अब तुम क्या करोगी, कहां जाओगी, कैसे जियोगी. येलेनिक ने बताया कि उसके पास एजुकेशन नहीं है, किसी भी काम की जगह पर उसके लिए बराबरी और इज्ज़त की जगह नहीं है.

कोर्ट-कचहरी के काग़जों पर मर्दों के नाम दर्ज संसार की अकूत संपदा में उसका कोई हिस्सा नहीं है. वो कहां जाएगी. वो क्या करेगी. ये सवाल वो 1982 के ऑस्ट्रिया में पूछ रही थीं.

ये सवाल मैं 2020 के हिंदुस्तान में पूछ रही हूं. मेरी भाभी उस रात उस थप्पड़ के बाद घर से निकल जातीं तो कहां जातीं? सैकड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक थे उनके पिता, लेकिन एक सूई की नोंक बराबर हिस्सा उसमें भाभी का नहीं था.

सैकड़ों एकड़ ज़मीन के मालिक हैं मेरे भाई भी, लेकिन काग़ज़ों पर वो उनकी औरत के नाम नहीं. पैसा बहुत है तो सुविधाएं सारी हैं. आराम सब. सिल्क साड़ियों से लेकर गहनों तक सुख के साजो-सामान की कोई कमी नहीं है. लेकिन सनद रहे कि ये सब किसी की पत्नी होने की हैसियत से है.

घरेलू हिंसा

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औरत थप्पड़ खा क्यों रही है?

पत्नी का दर्जा छिन जाए तो सड़क पर आते देर नहीं लगेगी. ये भी सनद रहे कि मिज़ाज बिगड़ा तो थप्पड़ कभी भी उठ सकता है. पूरे घर-ख़ानदान के सामने, भरी महफ़िल में. गाल सूजेगा लेकिन थोड़ी बर्फ़ मल लेना. सब ठीक हो जाएगा.

इसलिए असली सवाल ये नहीं है कि औरत थप्पड़ खा रही है. असली सवाल ये है कि औरत थप्पड़ क्यों खा रही है? क्या करें कि औरत थप्पड़ न खाए? क्या करें कि वो डरे नहीं, वो अपने साथ खड़ी हो, किसी और को बचाने से पहले ख़ुद को बचाए, किसी और के सम्मान से पहले अपना सम्मान करे?

इस सवाल का जवाब भी इसी फ़िल्म में है. ट्रेलर या प्रमोशन को देखकर जैसा लगता है, ये फ़िल्म दरअसल, उस लड़की अमृता या एक रात पड़े उस थप्पड़ के बारे में है ही नहीं. ये फ़िल्म उसके पिता के बारे में है. ये फ़िल्म उस घर के बारे में है, जिस घर में वो पैदा हुई, पाली गई, जैसा पिता उसने देखा, जैसा उसने अपने पिता को अपनी मां के संग देखा.

किसी लड़की की ज़िंदगी में पिता सिर्फ़ पिता नहीं होता. वो जिंदगी में आया पहला मर्द होता है. वही सिखाता है कि मर्द ग़ुस्सैल होता है या दयालु. मर्द आदेश देता है या हाथ बंटाता है. मर्द अधिकार जताता है या न्यौछावर होता है. मर्द हाथ उठाता है या हाथ थामता है.

उसके घर में घुसते ही सब डरे हुए चूहे की तरह बिल में दुबक जाते हैं या उसकी गोद में बैठकर लड़ियाते हैं. वो अपने फ़ैसले सुनाता है या तुम्हारे फ़ैसले में साथ खड़ा होता है. वो प्यार है या अहंकार. वो धमकी है या सहारा. वो उम्मीद या है डर.

बेटियां अपना भरोसा भी वहीं से पाती हैं और अपने डर भी.

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अमृता ने भी अपना भरोसा वहीं से पाया है. वो लड़ पाती है क्योंकि वो इब्सन की नोरा नहीं है. उसके साथ खड़ा है उसका पिता, जब आसपास के बाक़ी लोग भी कुछ नज़रें तिरछी करते हैं, टेढ़े सवाल करते हैं, डराते हैं, सहने का पाठ सिखाते हैं. एक पिता ही है, उसकी बगल में कसकर उसका हाथ थामे खड़ा है.

दरअसल, ये फ़िल्म डोमेस्टिक वॉयलेंस के बारे में है ही नहीं. ये एक पिता और बेटी के रिश्ते के बारे में है. ये आपकी बेटी के बारे में है, जो इस वक़्त ये पढ़ रहे हैं. ये उस बेटी के बारे में है, जिसके शायद आप कभी पिता बनें अगर आप ख़ुशकिस्मत हुए तो.

मेरे बगल में बैठे उन दोनों लड़कों की तरह कल सिनेमा हॉल में इस फिल्म को देखने आए ज्यादातर लोग जोड़ों में नहीं थे. या तो लड़कियां थीं ग्रुप में या लड़के. बॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड के साथ नहीं आए थे, पति अपनी पत्नियों के साथ नहीं. मैं जानती हूं आपका डर. फ़िल्म का ट्रेलर ही डराने के लिए काफ़ी था.

"हां, सिर्फ एक थप्पड़ की ही बात है. लेकिन नहीं मार सकता."

अब महज एक थप्पड़ पर लड़कियां रिश्ते तोड़ने लगें तो इस देश में शायद ही कोई रिश्ता साबुत बचे. यही डर है आपका भी, जिस पर फ़िल्म ने चुपके से उंगली रख दी है और आप तिलमिला रहे हैं.

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