बीबीसी विशेष: क्रिकेट के बादशाह भारत को कब मिलेगा अपना मेसी- रोनाल्डो?

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- Author, शिवकुमार उलगनाथन और शरथ बेहारा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया की आबादी साढ़े 7.6 अरब से कुछ ज़्यादा है. 2018 फ़ुटबॉल विश्वकप में कुल 736 खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं. और इनमें भारतीय खिलाड़ियों की संख्या शून्य है.
भारत के फ़ुटबॉल विश्व कप में ना पहुंच पाने पर बहस होती रही है. लेकिन ऐसी क्या वजह है कि भारत वर्ल्ड कप लायक खिलाड़ी तैयार ही नहीं कर पाता? विश्व स्तरीय खिलाड़ी कैसे पैदा किए जाते हैं और क्या भारत कभी ऐसा कर सकेगा?
पेशेवर फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत होती है. शारीरिक और मानसिक मेहनत के अलावा रणनीतिक कुशलता भी ज़रूरी है. सर्वश्रेष्ठ कोचिंग, विश्वस्तरीय सुविधाएं और हज़ारों घंटे पसीना बहाने के बाद कोई पेशेवर फ़ुटबॉल खिलाड़ी बन पाता है.
फ़ीफ़ा के पूर्व अध्यक्ष सेप ब्लेटर ने एक समय कहा था कि भारत फ़ुटबॉल जगत का सोता हुआ शेर है. बीते चार सालों में भारतीय पुरुष फ़ुटबॉल टीम की रैकिंग में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है. साल 2014 में भारतीय टीम दुनिया में 170वें नंबर पर थी जो अब 97वें नंबर पर है. इंडियन सुपर लीग (आईएसएल), आई-लीग और यूथ लीग भारत में फ़ुटबॉल के प्रचार में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं.
लेकिन क्या ये काफ़ी हैं? भारत को विश्व कप में अपनी टीम को देखने के लिए कितना और इंतज़ार करना होगा?
बीबीसी ने फ़ुटबॉल जगत के विशेषज्ञों से बात करके इसका जवाब जानने की कोशिश की.
फ़ुटबॉल के लिए शारीरिक ज़रूरतें

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फ़ुटबॉल में खिलाड़ी को बेहद तेज़ गति से छोटे-छोटे मूवमेंट करने होते हैं. इसके लिए हर खिलाड़ी को शारीरिक मज़बूती, स्टेमिना, ताक़तवर टांगे, फुटवर्क, जल्दी से दिशा बदलने की क्षमता, गति, तेज़ी से दौड़ना और रुकना, शारीरिक संतुलन आदि की ज़रूरत होती है. फ़ुटबॉल के मैदान में कामयाबी के लिए ये शारीरिक क्षमताएं ज़रूरी हैं.
दौड़ना फ़ुटबॉल का सबसे अहम हिस्सा है और कुछ खिलाड़ी तो मैच ख़त्म होने तक 14.5 किलोमीटर तक दौड़ लेते हैं और कई बार मैदान पर 35 किलोमीटर प्रतिघंटा तक की रफ़्तार पकड़ लेते हैं. बाकी खेलों के मुक़ाबले फ़ुटबॉल में दौड़ने की ज़रूरत ज़्यादा होती है.
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ काम करने वाले डॉ. विजय सुब्रमण्यम कहते हैं, "फ़ुटबॉल में आपको कुछ विशेष शारीरिक क्षमताओं की ज़रूरत होती है. मज़बूत पीठ, पेट और ग्रोइन महत्वपूर्ण है. गेंद को तेज़ी से मारने के लिए माशपेशियों का मज़बूत होना अहम है."
वो कहते हैं, "खिलाड़ियों के लिए कोई तय ऊंचाई नहीं है. अगर किसी खिलाड़ी का क़द छोटा है तो वो गेंद के साथ ड्रिबल अच्छे से कर सकता है. लंबे खिलाड़ी अच्छा दौड़ सकते हैं और हवाई गोल दाग सकते हैं."
अर्जेंटीना और बार्सीलोना के स्टार खिलाड़ी मेसी छोटे क़द के शानदार ड्रिबलर का अच्छा उदाहरण हैं.
विजय कहते हैं, मेसी की तरह ही दक्षिण अमरीकी देशों के कई खिलाड़ी छोटे हैं और सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी के कम होने से उन्हें गेंद को ड्रिबल करने में मदद मिलती है.
विजय कहते हैं, "शारीरिक फ़िटनेस के मामले में पिछले कुछ सालों में भारतीय खिलाड़ियों में सुधार हुआ है. ऐसा सिर्फ़ फ़ुटबॉल में ही नहीं बल्कि बाक़ी खेलों में भी हुआ है."
"क्रिस्टियानो रोनाल्डो दुनिया के सबसे फिट खिलाड़ियों में शामिल हैं. वो ऐसे कूदते और छलांग लगाते हैं कि रक्षक दल के लिए मुश्किल हो जाती है. मैदान में वो एक मज़बूत खिलाड़ी हैं जिनका सामना करना मुश्किल होता है."
क्या लंबाई और मांशपेशियों की ताक़त अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में निर्णायक भूमिका निभाते हैं? भारतीय फुटबॉल फेडेरेशन के कार्यकारी टेक्निकल डायरेक्टर सेवियो कहते हैं, "रक्षक दल के खिलाड़ी के लिए अच्छी लंबाई मददगार होती है. लेकिन असल में खिलाड़ी की लंबाई या माशपेशियों की ताक़त के बजाए शारीरिक ताक़त और रणनीतिक कुशलता ज़्यादा अहम होती है."

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मनोवैज्ञानिक ताक़त
सावियो कहते हैं, "आमतौर पर लोगों को लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों और पश्चिमी देशों के खिलाड़ियों में मूल फर्क़ शारीरिक शक्ति का है. लेकिन मुझे लगता है कि भारतीय खिलाड़ी तकनीकी दक्षता और रणनीतिक कुशलता में ज़्यादा पिछड़ते हैं."
राष्ट्रीय स्तर के फ़ुटबॉल खिलाड़ी रह चुके वीवा फ़ुटबॉल पत्रिका के एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर आशीष पेंडसे कहते हैं, "फ़ुटबॉल सिर्फ़ मैदान में ही नहीं बल्कि दिमाग़ में भी खेली जाती है. किसी भी खिलाड़ी के लिए मज़बूत जेनेटिक्स बहुत ज़रूरी है. इस क्षेत्र में भारतीय खिलाड़ी यूरोपीय खिलाड़ियों से पिछड़ते नज़र आते हैं. लेकिन रणनीतिक कुशलता में सुधार करके इससे उबरा जा सकता है. नए दौर के पेशेवर फ़ुटबॉल खिलाड़ियों में टीम की रणनीति बनाने की प्राकृतिक क्षमता होनी चाहिए. इसके अलावा जगह बनाना, हमले का जवाब देना और कई अन्य रणनीतिक कुशलताओं की भी ज़रूरत होती है."
कई विशेषज्ञों का मानना है कि फ़ुटबॉल में मानसिक ताक़त के बिना शारीरिक ताक़त किसी काम की नहीं है और क्लब के सामान्य खिलाड़ियों और विश्वस्तरीय पेशेवर खिलाड़ियों में यही फ़र्क होता है.
बच्चों को फ़ुटबॉल कब शुरू करनी चाहिए?

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खेल पत्रकार और फ़ुटबॉल विशेषज्ञ नोवी कपाड़िया कहते हैं, "भारत में कई परिजनों को लगता है कि पेशेवर खिलाड़ी बनने के लिए बच्चों की पांच या छह सात साल की उम्र से कोचिंग शुरू हो जानी चाहिए. लेकिन ये सिर्फ़ एक धारणा ही है जिससे वास्तव में कोई नतीजे नहीं निकल सकते."
कपाड़िया का कहना है कि बच्चों को 12-13 साल की उम्र तक मैदान में खेलने भेजना चाहिए. उस समय उनकी योग्यता आसानी से परखी जा सकती है और खेल को लेकर उनके जुनून को देखते हुए सही फ़ैसला लिया जा सकता है.
लेकिन सेवियो की राय अलग है. वो कहते हैं, "अन्य यूरोपीय और एशियाई देशों के खिलाड़ियों का मुक़ाबला करने के लिए कम उम्र से शुरुआत करनी होगी. इससे बच्चों को निर्णय लेने की क्षमता और रणनीतिक समझ विकसित करने में मदद मिलेगी."
इंफ्रास्ट्रक्चर और कोचिंग
पेंडसे के मुताबिक फ़ुटबॉल की अहम बातें जैसे की गेंद पर नियंत्रण, ड्रिबलिंग, गेंद के साथ दौड़ना और अन्य रणनीतियां एक अच्छा कोच ही सिखा सकता है. दुर्भाग्यवश भारत इस मामले में पिछड़ा हुआ है और उसे बेहतर कोचों की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है.
पेंडसे कहते हैं, "हाल ही में भारत में यूथ कप हुआ था जिसमें कई देशों ने हिस्सा लिया था. अमरीकी टीम के साथ तकनीकी दल के सात लोग थे जो खेल से जुड़ी गणनाएं टीम के लिए कर रहे थे. लेकिन भारतीय टीम के साथ कोई वीडियो या डाटा एनेलिस्ट नहीं था. ये सामान्य और मूल चीज़ें हैं जो अन्य देशों में उपलब्ध हैं लेकिन भारत के पास नहीं हैं."

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पेंडसे कहते हैं, "भारतीय टीम को बेहतर खिलाड़ियों के साथ खेलने के मौके कम ही मिलते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर भारत बेल्जियम जैसे देश के साथ खेलता है तो धीरे-धीरे भारत में फ़ुटबॉल का स्तर भी बढ़ जाएगा. लेकिन भारत बेल्जियम जैसी कम रैंक वाली टीम के साथ क्यों खेलेगा?"
भारत में खिलाड़ियों के लिए बेहतर मैदान और प्रतियोगिताएं खोजना भी चुनौतीपूर्ण होता है.
कपाड़िया कहते हैं, "भारत में फ़ुटबॉल में कोई प्रतियोगिता ही नहीं है. अंडर 17 में पूर्वोत्तर राज्यों से 8 खिलाड़ी होते हैं और बाकी दो-तीन खिलाड़ी अन्य प्रांतों से होते हैं. तो हम कैसे कह सकते हैं कि पूरा भारत फ़ुटबॉल खेल रहा है? 60-70 के दशक में कई फ़ुटबॉल स्टेडियम थे जो धीरे-धीरे क्रिकेट स्टेडियमों में बदल गए हैं."
फ़ुटबॉल की दुनिया में अच्छे कोच बदलाव ला रहे हैं. सावियो कहते हैं, "भारत की घरेलू टीमों को अच्छे कोचों की ज़रूरत है क्योंकि सिर्फ़ अच्छे कोच ही अच्छे खिलाड़ी पैदा कर सकते हैं."
पूर्व भारतीय फ़ुटबॉल खिलाड़ी प्रकाश मानते हैं कि भारत को अच्छे कोचों का एक दल विकसित करने की ज़रूरत है. वो कहते हैं, "एक दशक पहले तक युवा खिलाड़ी अच्छा कोच पाने के लिए संघर्ष करते थे. उसकी तुलना में अब हालात कुछ बेहतर हुए हैं."
10 हज़ार घंटों का अभ्यास
कई खिलाड़ी और कोच दस हज़ार घंटों के अभ्यास की थ्योरी में यक़ीन रखते हैं. माना जाता है कि दस हज़ार घंटों के अभ्यास से बेहतर फ़ुटबॉलर बना जा सकता है. लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये सिद्धांत सभी खिलाड़ियों पर लागू नहीं होता और हर किसी खिलाड़ी के लिए ये अलग-अलग है.
बेकहम और रोनाल्डो जैसे खिलाड़ियों ने अभ्यास में ख़ूब पसीना बहाया है. फ्री किक और गेंद पर प्रहार जैसी दक्षता हासिल करने के लिए वो घंटों अभ्यास करते रहे हैं.
क्या भारत को मिलेगा रोनाल्डो- मेसी?

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भले ही भारतीय टीम देरी से ही सही कुछ कामयाबियां हासिल कर रही है लेकिन ये सवाल अभी भी बरक़रार है कि क्या भारत मेसी या रोनाल्डो जैसा टेलेंट पैदा कर सकता है?
सावियो कहते हैं, "अगर भारत में फ़ुटबॉल संस्कृति विकसित होती है तो एक स्टार खिलाड़ी भी अपने आप ही पैदा हो जाएगा. तब इस सवाल की शायद ज़रूरत ही नहीं होगी."
प्रकाश कहते हैं, "मेसी रोनाल्डो सिर्फ़ एक नाम ही तो है. भारत ने भी बाइचुंग भूटिया, आईएम विजयन, पीटर थंगराज जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं. सुनील छेत्री को भी याद रखिए. मेसी और रोनाल्डो अपने क्लब की स्टार पॉवर और अपने देशों में फ़ुटबॉल के प्रति दीवानगी की वजह से इतने चर्चित नाम हैं."
पेंडसे कहते हैं, "नेमार, मेसी, माराडोना जैसे खिलाड़ी निश्चित तौर पर खेल को नई ऊंचाइयों तक लेकर गए हैं. वो युवाओं में जुनून पैदा करते हैं. लेकिन सुनील छेत्री, बाइचुंग भूटिया और आईएम विजयन जैसे खिलाड़ी भी अपनी तरह के हीरो हैं."
क्या भारत में ट्रेंड बदल रहा है?

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सावियो कहते हैं, "आईएसएल ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि भारत में सिर्फ़ क्रिकेट ही नहीं बल्कि फुटबॉल भी खेला जा रहा है. भारतीय क्लबों को अपनी यूथ टीमें विकसित करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है."
पेंडसे कहते हैं कि धीरे-धीरे ही सही भारत में फुटबॉल को लेकर हालात बेहतर हो रहे हैं.
वो कहते हैं, "1990 के दशक में हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था. लेकिन अब सीनियर लेवल पर पहुंचने के लिए यूथ टीम में खेलना ज़रूरी हो गया है. आज भारत में तीस प्रमुख अकादमी हैं और इतनी ही सीनियर टीमें भी हैं जिनसे 1500-2000 फुटबॉलर पैदा हो रहे हैं."
सावियो कहते हैं, "भारत में खेल संस्कृति तो है लेकिन अभी फुटबॉल संस्कृति नहीं है. अगर एक बार फ़ुटबॉल संस्कृति विकसित हो गई तो पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं होगी."
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