इंटरनेशनल फ़ुटबॉल में भारत की रूपा की धमक

- Author, शिवा उलगनाथन
- पदनाम, बीबीसी तमिल सेवा
भारत में अगर क्रिकेट खिलाड़ी नहीं हैं तो फिर आपको वो लोकप्रियता, पहचान नहीं मिल सकती है जो सिनेमा के कलाकारों को मिलती है और अगर आप महिला खिलाड़ी हैं तो फिर आपका संघर्ष और बढ़ जाएगा.
लेकिन इन सबका रूपा देवी पर कोई असर नहीं पड़ा. बिना किसी ख़ास सुविधा और संसाधनों के उन्होंने नया मुकाम बना दिया है.
तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्से डिंडुगुल जैसे कस्बाई इलाके से निकलकर रूपा ने इंटरनेशनल फ़ुटबाल में अपनी पहचान बनाई है.
रूपा ने शुरुआत तो फ़ुटबॉल खेलने से की थी लेकिन अब वो इंटरनेशल फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन की मान्यता प्राप्त रेफ़री हैं. फ़ीफ़ा ने रूपा को जनवरी, 2016 में रेफ़री बनाया है.
वे तमिलनाडु की पहली महिला हैं जो इस मुकाम तक पहुंची हैं हालांकि अब तक पांच भारतीय महिलाएं फ़ीफ़ा रेफ़री बन चुकी हैं.
बीबीसी की तमिल सेवा के साथ बातचीत में रूपा ने अब तक के अपने सफ़र के बारे में बताया.
सफ़र की शुरुआत

पड़ोस में फुटबॉल मैदान में जाने से हुई. पहले खेल देखने के लिए. उसमें मजा आने लगा और फ़ुटबॉल में दिलचस्पी भी बढ़ने लगी. गेंद को गोलपोस्ट में टकराते देख कर मैंने सोच लिया कि एक दिन फ़ुटबॉलर बनूंगी.
शुरुआती संघर्ष
शुरू शुरू में इतनी स्टेमिना नहीं थी, कि फ़ुटबाल खेल सकूं. सुविधाएं भी नहीं थीं. ऐशे में डिंडुगुल फुटबॉल एसोसिएशन ने मेरी मदद की.
रेफ़री बनने पर ध्यान
फ़ुटबॉल काफी पैशन वाला खेल है. मैं हमेशा फ़ुटबॉलर बने रहना चाहती थी. लेकिन कुछ कुछ समय बाद मुझे लगा कि खिलाड़ी के तौर पर मेरा फुटबॉल करियर लंबा नहीं पाएगा. खेलने को ज़्यादा मैच ही नहीं थे, ऐसे में मैं ख़ुद को कैसे साबित कर पाती. ऐसे में मैंने रेफ़री बनने का ध्यान दिया.
रेफ़री बनने के बाद का अनुभव

फ़ीफ़ा रेफ़री बनने के बाद शुरुआती दिन तनाव भरे थे. लेकिन बाद में लोगों से तारीफ़ मिलनी शुरू हुई तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. मैं दक्षिण एशियाई महिला फ़ुटबॉल टूर्नामेंट और मलेशियाई महिला फ़ुटबॉल टूर्नामेंट में हिस्सा ले चुकी हैं. मैं ज़्यादा से ज़्यादा इंटरनेशनल मैचों में रेफ़री की भूमिका निभाना चाहती हूं.
इंटरनेशनल मैचों की चुनौती
दूसरे खेलों की तुलना में फ़ुटबॉल रेफ़री बनना ज़्यादा मुश्किल चुनौती है. ये मानसिक और शारीरिक तौर पर ज़्यादा कौशल की मांग करता है. अगर दो मज़बूत टीमों के बीच मुक़ाबला हो तो आपको लगातार भागना पड़ता है. एक अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉलर जितनी ही स्टेमिना चाहिए होती है.
सबसे भावनात्मक पल
पहली जनवरी, 2016 को मैं एक मैच के लिए जबलपुर में थी, मेरे दोस्त और जानने वाले मुझे लगातार फ़ोन कर रहे थे. मेरे मोबाइल फ़ोन की बैटरी काफ़ी कम हो गई थी, तो मैं फ़ोन नहीं उठा रही थी.

जब मैं जबलपुर में अपने हॉस्टल पहुंची तभी मेरे दोस्तों ने ज़ोरदार अंदाज़ में मेरा स्वागत किया. तब मुझे पता चला कि मैं फ़ीफ़ा रेफ़री बन चुकी हूं. नए साल का तोहफ़ा जैसा लगा था.
परिवार वालों का साथ
मेरे परिवार वालों ने हमेशा मेरा साथ दिया. अपने स्कूली दिनों में जब मैं घर पर रह जाती तो मेरे माता-पिता कहते थे कि आज अभ्यास के लिए नहीं जाना. वे मेरे अच्छा करने पर उत्साह बढ़ाते थे. इस वजह से मुझे खेल के मैदान में हमेशा बेहतर करने में मदद मिली.
महिला होने का असर

अगर आप किसी भी क्षेत्र में कुछ सीखना चाहते हैं, हासिल करना चाहते हैं तो ध्यान रखिए कोई आपको रोक नहीं सकता है.
फ़ुटबॉल कैसे बढ़ेगा
क्रिकेट को छोड़ दें, तो दूसरे खेलों को भारत में उतनी तरज़ीह नहीं मिलती. जब तक पर्याप्त इंटरनेशनल मैच नहीं होंगे, प्रायोजक नहीं मिलेंगे तब तक खेल कैसे आगे बढ़ेगा. युवा खिलाड़ियों को भी प्रतिबद्धता के साथ अभ्यास करना चाहिए. सीनियरों का सम्मान भी करना चाहिए.












