You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'स्मिता पाटिल कुछ वक़्त और जीतीं तो कई बेहतरीन फ़िल्में दे जातीं'
- Author, श्याम बेनेगल
- पदनाम, फ़िल्म निर्माता एवं निर्देशक
स्मिता पाटिल ने फ़िल्मों में काम करने की शुरुआत ही मेरी फ़िल्मों से की थी. उन्होंने फ़िल्म संस्थान के लिए एक छोटी फ़िल्म बनाई थी. और इसके बाद जिस फ़िल्म में उन्होंने काम किया, वो मेरी थी.
उनमें एक गज़ब की क्वालिटी थी और वो ये कि कैमरा स्मिता पाटिल को बहुत प्यार करता था. हम लोग कई बार कुछ लोगों के लिए फ़ोटोजेनिक शब्द का इस्तेमाल करते हैं और स्मिता कमाल की फ़ोटोजेनिक थीं. इसके अलावा वो इमोशंस को बड़े डेलीकेट अंदाज़ में पेश करती थीं.
मैंने उन्हें 'चरणदास चोर' फ़िल्म में लिया था जो उनकी पहली फ़िल्म थी. तब वो बहुत सहज नहीं थीं. वो कभी घर से बाहर भी नहीं निकली थीं. हम लोग शूटिंग करते थे तो वो ज़्यादा किसी से बात नहीं करती थीं.
वो काफ़ी शर्माया करती थीं. और कमरे में लौटने के बाद अपनी मां को चिट्ठी लिखा करती थीं. अक्सर वो चुप रहती थीं. लेकिन वो उनकी असल शख़्सियत नहीं थी. पहले लोग उन्हें पहचानते नहीं थे, तो वो ऐसी थीं.
लेकिन एक बार लोगों से घुल-मिल गईं तो ऐसा समझ लीजिए कि वही महफ़िलों की जान हुआ करती थीं. वो फ़िल्म यूनिट का हिस्सा बन जाती थीं. एक स्टार या हीरोइन की तरह नहीं बल्कि यूनिट के मेंबर की तरह. उनकी आंखें गज़ब की थीं.
महफ़िलों की जान थीं स्मिता
छोटा सा इमोशन भी उनकी आंखों से जाहिर होता था. लोग कहते हैं कि स्मिता पाटिल और शबाना आज़मी के बीच तल्ख़ी की थी. लेकिन ये सच नहीं है. क्योंकि शबाना मेरी पहली फ़िल्म में थीं और अपनी पहली ही फ़िल्म में वो मुख्य नायिका बनी थीं. ऐसी ख़बरें थी कि दोनों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा थी लेकिन ऐसा कुछ ख़ास नहीं था. सिर्फ़ मीडिया ने इसे खड़ा किया था.
वास्तव में मुझे ऐसा लगता है कि स्मिता पाटिल को ऐसा लगता था कि वो अनुभवी एक्ट्रेस नहीं हैं जबकि शबाना ट्रैंड थीं. स्मिता स्वाभाविक अभिनेत्री थीं. उन्होंने किसी क़िस्म की ट्रेनिंग नहीं ली थी. तो शायद उन्हें हमेशा ये महसूस होता होगा कि वो शबाना जितनी क़ाबिल नहीं हैं. लेकिन ऐसा नहीं था. वो दोनों कमाल की अभिनेत्रियां थीं.
'मंडी' फ़िल्म में दोनों ने साथ काम किया और वो शानदार अनुभव रहा. इसमें स्मिता का रोल ज़बरदस्त था. फ़िल्म में शबाना का क़िरदार स्मिता के क़िरदार के बचाव में रहता है. और असल में भी ऐसा ही था. मैंने ये फ़िल्म एक किताब से प्रेरित होकर बनाई थी. फ़िल्म में जो क़िरदार स्मिता ने अदा किया, वो एक मराठी महिला का है. स्मिता खुद मराठी थीं. ऐसे में उन्होंने इस रोल में जान डाल दी थी.
स्मिता-शबाना की टक्कर?
'मंथन' फ़िल्म में भी शानदार अनुभव रहा था. राजकोट के करीब गांव में शूटिंग की थी. खेड़ा गांव था बिलकुल. और मैंने स्मिता को कहा था कि जब तक वो फ़िल्म में काम करेंगी तो वो कुर्सी पर ना बैठें, ज़मीन पर बैठें जैसे गांव की लड़कियां बैठती हैं. लोग शूटिंग देखने आते थे और पूछते थे कि हीरोइन कौन है. हीरोइन सामने बैठी होती थी और कोई उन्हें पहचानता तक नहीं था. वो ऐसी गज़ब की एक्ट्रेस थीं.
इस फ़िल्म ने उन्हें मशहूर बना दिया. उनकी ज़्यादा उम्र नहीं थी जब वो दुनिया से चली गईं. कई लोग ऐसा कहते हैं कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा था कि वो ज़्यादा नहीं जी पाएंगी. मैं नहीं जानता कि इस बात में कितना सच है लेकिन ऐसा उनके रुख़ में जल्दबाज़ी से दिखता था. जैसे उन्हें कम वक़्त में काफ़ी कुछ करना है.
उनका निधन भी बड़ा दर्दनाक रहा है. बच्चे को जन्म देते वक़्त हुई दिक्कतों के चलते कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया था. वो एक्ट्रेस थीं लेकिन सहज रहती थीं. उनके माता-पिता ने कभी इस बात का अहसास नहीं दिलाया होगा कि वो कुछ ख़ास हैं.
उनके पिता महाराष्ट्र में मंत्री रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद रहन-सहन काफ़ी सहज था. उनकी मां समाजसेविका थीं. लेकिन दोनों ने उन्हें कभी स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं दिया.
स्मिता के लिए 'भूमिका' फ़िल्म सबसे अहम थी क्योंकि उसमें उन्हें अलग-अलग आयु वर्ग के क़िरदार अदा करने थे. काफ़ी जटिल मामला था. दुनिया भर में उनकी तारीफ़ हुई. उन्हें इसके बाद फ्रांस के किसी फ़िल्म डायरेक्टर ने रोल भी ऑफ़र किया था.
मैं अंत समय में भी उनके क़रीब रहा क्योंकि वो जिस अस्पताल में भर्ती थीं, वो मेरे घर के पास था. मुझे लगता है कि वो बहुत जल्दी चली गईं. अगर कुछ और बरस जीतीं तो उनके खाते में कई बेहतरीन फ़िल्में होतीं.
( बीबीसी हिंदी के लिए इंदु पांडे से बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)