'औरत ने जनम दिया मरदों को..' जैसा गीत रचने वाले दत्ता नाईक

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- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, कला और संगीत समीक्षक
गम्भीर क़िस्म का संगीत रचने वाले एन. दत्ता साहब जिनका पूरा नाम दत्ता नाईक है, एक महत्वपूर्ण संगीतकार के रूप में आज भी याद किए जाते हैं.
कम फ़िल्मों के कैटलॉग से सजा हुआ एन. दत्ता का संगीतकार इतना प्रबुद्ध रहा है कि आप उनकी धुनों को उठाकर सामाजिक राजनैतिक विमर्श के ढेरों सरोकारों को देख सकते हैं. एन. दत्ता, जिनका अर्थ ही है गम्भीर शब्दावली में लिखे गए गीतों की मानवीयता के पक्ष में सुरीली अदायगी.
एन. दत्ता के करीबी लोगों में साहिर लुधियानवी, बी.आर. चोपड़ा और राज खोसला जैसे दिग्गज शामिल थे, जिसके चलते स्तरीय संगीत और शायरी के प्रति उनका रुझान कुछ अतिरिक्त संजीदा ढंग का बन सका.
उनकी धुनों को सुनते हुए यह समझा जा सकता है कि ग़ज़लनुमा अभिव्यक्ति में शायरी को अत्यन्त गम्भीर और मार्मिक अर्थों में बदलने की कला में वे माहिर थे. 'साधना' का यह गीत इस बात की नुमाइन्दगी के लिए एक आदर्श गीत का मुकाम रखता है- 'औरत ने जनम दिया मरदों को'

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ख़य्याम और रोशन के समकक्ष
इस तरह के गीतों को सुनकर आप आसानी से एन. दत्ता की उपस्थिति को रोशन, ख़य्याम, मदन मोहन और रवि के समकक्ष रखकर देख सकते हैं, जिन लोगों ने इतनी ही स्तरीय ग़ज़लें फ़िल्म संगीत को मुहैया कराई हैं.
'मरीन ड्राइव', 'धूल का फूल', 'साधना', 'धर्मपुत्र', 'नाचघर', 'जालसाज़', 'मोहिनी', 'मिस्टर जॉन', 'दीदी', 'ग्यारह हज़ार लड़कियां' और 'नया रास्ता' से गुज़रकर बनने वाली राह थोड़ी संश्लिष्ट, थोड़ी गम्भीर और थोड़ी सामाजिक चेतना संपन्न रही है.
उसमें इस बात का भी ध्यान दिया गया है कि जीवन और समाज के रिश्तों को आपसी सामंजस्य से हल कर लिया जाए. उस आदर्शवाद या कि मानवीय चेतना का यह रूप, सिर्फ़ एन. दत्ता ही सुन्दर ढंग से दिखा सकते थे.
एन. दत्ता की सबसे बड़ी ख़ूबी यह रही कि उन्होंने अपनी धुनों में कई मर्तबा कुछ ऐसे पारंपरिक वाद्यों का सुन्दर इस्तेमाल किया, जो गीत के पूरे उठान को एकाएक कई गुना बढ़ा देते हैं. शहनाई, सारंगी, तबला और ढोलक के साथ वॉयलिन उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है.
गीतों को चपल और ख़ूबसूरत बनाने के लिए एकॉर्डियन और मैण्डोलिन के टुकड़ों से सजाने का मामला हो या कि शायराना अल्फ़ाज़ को बहुत हल्के से रागों की अर्थछायाओं से भरने की कोशिश, हर जगह एन. दत्ता की कम्पोज़ीशन गजब ढंग से प्रासंगिक बनकर उभरी है.

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हृदयग्राही संगीत बनी पहचान
एन. दत्ता ने हमेशा ही कुछ सार्थक रचा. परिचित अंदाज़ से हटकर रचा, लय और बीट को तरज़ीह देते हुए भी शब्दों की सुन्दरता को करीने से बरक़रार रखने के जतन में रचा. फिर वह मुजरा गीत था या कि हलके-फुल्के ढंग से सिनेमाई भाषा के साथ न्याय करता हुआ गीत, हर जगह कुछ हृदयग्राही संगीत जैसे दत्ता साहब की पहचान बन गई थी.
एन. दत्ता ने मैलोडी को इतना अधिक साधा कि हर एक फ़िल्म के लिए उनकी धुनों की अभिव्यक्तियां उतनी ही कोमल व सरस बन बैठी. आप उनके करियर से कोई भी फ़िल्म चुनें, तो आसानी से यह पाएंगे कि हर दूसरा रेकॉर्ड, कम से कम, एक, दो कर्णप्रिय गीतों से सजा हुआ है.
उनके यहां लता मंगेशकर, मुकेश, मो. रफ़ी, तलत महमूद और आशा भोंसले सभी के लिए उनकी विशिष्ट आवाज़ों की विशिष्ट तर्ज़ें मौजूद थीं, जिन्हें नए सन्दर्भों में वे परख रहे थे.
लता मंगेशकर के लिए तो जैसे एन. दत्ता का संगीत कुछ अलग ही स्तर पर पहुँचा हुआ है. गुणवत्ता और सांगीतिक उत्कर्ष में सब बेजोड़ गीत लता जी के लिए खास ढंग से रचे गए. एन. दत्ता ने उनके लिए मुजरा गीत, क्लब सॉन्ग और प्रेम की स्नेहिल पुकार की आत्मीय अभिव्यक्तियाँ स्पन्दित की हैं. 'कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे' और 'ऐ दिल ज़ुबां न खोल' को इसी सन्दर्भ में याद किया जाना चाहिए.

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अस्सी के दशक में होने लगे गायब
तर्ज़ों की उदात्ता बड़े संयम से साधने वाले एन. दत्ता बाद में एक भूले-बिसरे संगीतकार के रूप में ही जाने गए, जिनकी अस्सी की दशक की फ़िल्मों ने कोई बहुत उल्लेखनीय मुकाम हासिल नहीं किया. यह वही एन. दत्ता साहब थे, जिनकी झूमती हुई ऑर्केस्ट्रेशन और हल्के कोरस की पृष्ठभूमि लिए हुए गीतों ने साठ के दशक में एक बिलकुल अलग ही लीक रची थी.
रागों और वाद्यों के मजेदार खेल से एक नई ही बात निकाल लेने वाले एन. दत्ता को इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने आधुनिक ध्वनि संयोजन पर आधारित तर्ज़ें बनाकर एक अभिनव ढंग का संगीत रचा था, जो नये मुहावरे, नये ऑर्केस्ट्रेशन और नयी मैलोडी का सुन्दर उदाहरण बन सका था.
'तू हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा' (धूल का फूल) जैसा महान गीत अपनी विचार प्रवणता में दत्ता साहब ही रच सकते थे.
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