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ब्लॉग: फ़वाद ख़ान को 'ज़िंदगी' देने वाला 'ज़िंदगी' अब ख़त्म
- Author, उपासना भट्ट
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
जब जून 2014 में 'ज़िंदगी' चैनल लॉन्च हुआ तो मैं बहुत ख़ुश थी क्योंकि इस पर पाकिस्तान के लोकप्रिय टीवी ड्रामे दिखाए जाने वाले थे.
उनमें से एक पहला शो था 'ज़िंदगी गुलज़ार है' जिस के ज़रिए भारत के लोगों ने फ़वाद ख़ान को जाना. यह सीरियल मुझे बहुत अच्छा लगा. ज़ारून और कशफ़ की कहानी मेरे साथ रही.
मैं एक पत्रकार हूं और मेरा सपना रहा है कि पाकिस्तान जाकर वहां की ज़िंदगी के बारे में जान सकूं. तो 'ज़िंदगी' चैनल मेरे लिए एक सपने की तरह ही था जो हमें, अपने घर बैठे, पाकिस्तान की दुनिया दिखा रहा था.
इन सीरियल्स के ज़रिए मुझे पाकिस्तानी समाज की काफ़ी बातें अच्छी लगती थी.
फ़वाद खान
उनके बोलने का अंदाज़, ख़ासकर उर्दू जो हमेशा ही सुनने में मिठास भरी लगती है, पाकिस्तानी महिलाओं के कपड़े, उनके हर रोज़ के मसले.
और हाँ, बहुत ज़रूरी बात कि हर ड्रामे का 20 एपिसोड्स के आस पास ख़त्म हो जाना. भारत के सालों-साल चलते सास-बहू के सीरियल्स से बिलकुल अलग.
मेरी मां और मुझे एक नया चैनल मिल गया था और बाक़ी कोई भी सीरियल अब इनके सामने फीका लगता था.
फ़वाद ख़ान को तो इस चैनल का ख़ास तौर पर शुक्रिया अदा करना चाहिए. चैनल की वजह से ही उनके बॉलीवुड करियर का आग़ाज़ हुआ.
मेरी एक सहेली ने फ़ेसबुक पर लिखा कि ज़ारून की वजह से हर रात किचन में मेरा खाना जल जाता है! मेरी पहली प्रतिक्रिया थी- तुम भी! और हम बहुत हंसे.
'ज़िंदगी गुलज़ार है'
'ज़िंदगी गुलज़ार है' की मुख्य अभिनेत्री थी सनम सईद. एक दिन मेरी एक सहकर्मी ने उनसे काम के सिलसिले में फ़ोन पर बात की और बहुत ख़ुश हुई..."मेरा तो दिन ही बन गया", उसने लिखा था अपने फ़ेसबुक पेज पर.
कुछ ऐसे मुद्दे भी थे जो मेरे अंदर सवाल पैदा करते थे. शादी और तलाक़ को लेकर. हर सीरियल में बात-बात पर तलाक़ और फिर दूसरी शादी.
यह बात मुझे काफ़ी परेशान करती थी. मुझे याद है कि मैंने अपनी टीम के कुछ मुस्लिम सहकर्मियों से इसके बारे में सवाल भी किए थे.
उन्होंने बताया कि किसी किसी परिवार में यह होता है लेकिन भारत में आम तौर पर ऐसे नहीं होता. कुछ लोगों ने इस बात पर चर्चा की कि कुछ लड़कियों को काफी छोटी उम्र से तैयार किया जाता है कि उनकी शादी उनके चचेरे या ममेरे भाई से की जाएगी.
पाकिस्तानी प्रोग्राम
इन ड्रामों को देख कर मैंने कई नए उर्दू शब्द सीखे. जैसे तरबियत, एहसास-ए-कमतरी, मुसलसल वग़ैरह. मेरी मां ने बताया कि दादाजी अपने बच्चों को कहते रहते थे कि तुम्हें एहसास-ए-कमतरी है.
कभी-कभी मेरे मन में आशंका ज़रूर होती कि कहीं कोई हिंदूवादी संगठन उस चैनल के ख़िलाफ़ शिकायत ना कर दे.
फिर सितंबर 2016 में उरी में चरमपंथी हमला हुआ और उसके बाद ही ज़ी टीवी नेटवर्क के प्रमुख सुभाष चंद्रा ने ऐलान किया कि ज़िंदगी चैनल में पाकिस्तानी प्रोग्राम नहीं दिखाए जाएंगे.
बस ज़िंदगी के साथ मेरा सिलसिला वहीं टूट सा गया. उसके बाद चैनल पर तुर्की, ब्राज़ील वगैरह के सीरियल हिंदी में डब करके दिखाए जाने लगे लेकिन मेरा उनसे वो राब्ता नहीं बन पाया.
डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म्स
इस महीने इस चैनल के तीन साल पूरे हो गए लेकिन दुख है कि एक जुलाई से ये चैनल बंद हो रहा है.
हालांकि पाकिस्तानी ड्रामा पिछले साल ही बंद हो गए थे लेकिन मेरे अंदर कहीं यह आस थी कि भारत-पाकिस्तान के रिश्ते ठीक होने पर यह ज़रूर दोबारा दिखाए जाएंगे.
अब यह चैनल सिर्फ डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध होगा. आप मुझे ओल्ड फ़ैशंड कह लीजिए, लेकिन डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म्स से मुझे कोई ख़ास प्यार नहीं. यह सिर्फ़ सहूलियत के लिए है.
टीवी पर सारा परिवार साथ बैठकर कुछ देखे - उसकी बात ही अलग है.
आज मेट्रो से घर आते वक़्त मैं संयोग से 'ज़िंदगी गुलज़ार है' का शीर्षक गीत सुन रही थी.
"ज़िन्दगी गुलज़ार है - यह इश्क़ का दरबार है
किसी के ग़म को बांटना - ही प्यार है "
इन सब यादों के लिए शुक्रिया ज़िंदगी!