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'दंगल' और 'सुल्तान' से बदल रहा है बॉलीवु़ड का हीरो
- Author, चिरंतना भट्ट
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
एक वक़्त था जब हिंदी फ़िल्मों के हीरो को अलग-अलग तरह के खलनायकों का सामना करना पड़ता था.
कभी वो अपने पिता के ख़ून का बदला लेता, कभी अपनी बहन के बलात्कारियों को ख़त्म करता, कभी सिस्टम से लड़ता तो कभी देशद्रोही डॉन का नामोनिशान मिटाता.
हीरो के सामने चाहे कोई भी मुश्किल आए वो कभी मायूस नहीं होता था. वह अपनी लड़ाई जारी रखता था. हिंदी फ़िल्मों के हीरो ज़्यादातर सर्वगुण संपन्न हुआ करते थे.
न कभी उसकी हार होती थी, न कभी वो कुछ ग़लत काम करता था और न ही उसमें कोई व्यक्तिगत कमियां होती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा.
लेकिन अब चीज़ें बदलती हुई दिख रही हैं. पिछले कुछ सालों में मुख्यधारा की कई फ़िल्मों में हीरो अपने अंदर की कमज़ोरियों से लड़ता हुआ दिखाई देता है.
'दंगल' का पहलवान
अब ऐसे हीरोज़ की कहानियां लिखी जा हैं जो पर्फेक्ट नहीं है. 'दंगल' का पहलवान जो अपने लिए, अपने देश के गर्व के लिए नहीं कर पाया वह उसने अपनी बेटी के ज़रिए हासिल किया.
'सुल्तान' का हीरो अपने अहम की वजह से सब कुछ गंवा देता है और फिर इसी तकलीफ़ से छुटकारा पाने की लड़ाई ही उसे हीरो बनाती है.
'कपूर एंड सन्स' में हर किरदार का अपना संघर्ष है. माँ को दो बेटों में भेदभाव रखने का गिल्ट है, समलैंगिक बेटा झूठ के बोझ के साथ जीता है तो दूसरा बेटा अपनी मां की नज़र में पर्फ़ेक्ट बनना चाहता है.
इस बदलाव के बारे में 'ग़ुलाम' और 'राजनीति' जैसी फ़िल्मों के लेखक अंजुम राजबली ने बीबीसी हिंदी के साथ बात की.
नायक का गुस्सा
अंजुम राजबली ने बताया, "अब हिंदी सिनेमा के हीरो का किरदार कॉम्प्लेक्स हो रहा है. पहले की फ़िल्मों में जो ताकत विरोध में खड़ी हुआ करती थी जिसे हम विलेन या खलनायक कहते थे, अब ये फ़ोर्स हीरो के अंदर ही होता है. उसकी खुद की जर्नी होती है, हीरो कुछ साबित करना चाहता है जो खुद के लिए ज़रूरी है. कभी वह अपने गिल्ट से मुक्ति चाहता है तो कभी उसकी नाकामी ही उसे सब बदल देने की प्रेरणा देती है."
वह बताते हैं, "पहले एक्शन फ़िल्मों में बदले की भावना पर बहूत फ़िल्में बनीं. 'दीवार' में नायक का गुस्सा उसका दुश्मन है, लेकिन अंत में मदनपुरी की मौत तो तय थी. 'शोले' में भी ठाकुर के व्यक्तिगत बदले की चाह से कहानी आगे बढ़ती है. लेकिन अब किरदारों के लेखन में जटिलता आई है. आज का हीरो ग़लती भी करता है, नाकाम भी होता है, अंडर अचीवर भी होता है. वह अपनी ग़लती कैसे सुधारता है, अपनी कमियों से कैसे ऊपर उठता है, ख़ुद को जो चाहिए वो नहीं, लेकिन ख़ुद के लिए जो ज़रूरी है, वह कैसे पाता है, उसी मुद्दे से कहानी आगे बढ़ती है."
किरदार के साथ इंसाफ़
दंगल के लेखक नितेश तिवारी का मानना है कि किरदारों के लेखन में बढ़ती जटिलता लेखकों के लिए अच्छा बदलाव है.
उनका कहना है, "पर्फ़ेक्ट ना हो, ऐसे हीरो पहले भी आए हैं, लेकिन अब जो किरदार पर्दे पर दिखाए जाते हैं वह वास्तविकता के बहुत क़रीब होते हैं. 'दंगल' की कहानी में हमने वह सब किया जो शायद एक आम फ़िल्म में नहीं होता. जैसे कि एक पिता का बेटी के साथ कुश्ती में हारना, अंत में कमरे में पिता का लॉक हो जाना - हम ये भी दिखा सकते थे कि वह दरवाज़ा तोड़ कर बाहर आ गया और उसने बेटी का मैच देखा - लेकिन हमने जो स्वाभाविक था वो नहीं किया. ये ममुकिन हुआ क्योंकि अब दर्शक भी हीरो में सभी गुणों की उम्मीद नहीं रखते. दर्शक इम्पर्फ़ेक्ट हीरो को स्वीकार कर रहे हैं."
नितेश बताते हैं, "किरदार को न्याय देना सबसे अहम है. लेखक को और एक पहलू पर काम करने का मौका मिलता है. ज़्यादा चांस ले सकते हैं और निडर हो कर लेखन कर सकते हैं. ऐसी कहानियों को कमर्शियल सफ़लता भी मिल रही है."
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