वसंत देसाई: जिनकी 'अंखियां भूल गईं सोना'

ऑडियो कैप्शन, वसंत देसाई: भक्ति-संगीत परंपरा से उपजा संगीतज्ञ
    • Author, यतींद्र मिश्र
    • पदनाम, संगीत समीक्षक

यह अकारण नहीं है कि मराठी मूल के वसंत देसाई को संगीत का संस्कार अपने नाना अबा भास्कर पारुलेकर से मिला, जो प्रसिद्ध कीर्तनकार थे.

वसंत देसाई के सन्दर्भ में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि उनके इलाक़े (महाराष्ट्र में स्थित कोंकण क्षेत्र का कुडाल-तालुका गांव) में संगीत और कलाओं की समृद्ध परम्परा रही है, जहाँ धार्मिक, पौराणिक दशावतारी नाटकों में प्रायः प्रचलित कलाओं और संगीत का प्रदर्शन होता था और मंदिरों में भक्तिपरक भजन-कीर्तन की प्राचीन परम्परा पूरे वर्ष-भर तमाम उत्सवों, पर्वों और अनुष्ठानों के द्वारा निभती रही थी.

इन भक्ति-संस्कारों से पगे सांगीतिक पाठ के साथ वसंत देसाई के संगीतकार की यात्रा दरअसल सही अर्थों में वहाँ से शुरू होती है, जिसमें व्ही. शान्ताराम के प्रोडक्शन हाऊस 'राजकमल कला मन्दिर' की कई फ़िल्मों के उत्कृष्ट संगीत के सर्जक के रूप में उन्होंने बतौर संगीतकार काम किया है.

वसंत देसाई

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ऐसे में उन दोनों के सहमेल की पहली फ़िल्म शकुन्तला (1943) की सफलता के बाद आई प्रमुख हिन्दी फ़िल्में हैं- परबत पे अपना डेरा (1944), डॉ. कोटनीस की अमर कहानी, जीवन-यात्रा (1946), अन्धों की दुनिया, मतवाला शायर रामजोशी (1947), दहेज़ (1950), झनक-झनक पायल बाजे (1955), तूफ़ान और दीया (1956), दो आँखें बारह हाथ (1957), मौसी (1958) और लड़की सह्याद्री की (1966).

शांताराम का साथ

शांताराम की मराठी फ़िल्मों के संगीतकार के रूप में वसंत देसाई के कृतित्व की उत्कृष्ट बानगियाँ- लोकशाहीर रामजोशी (1947), अमर भूपाली (1951) और इये मराठीचिये नगरी (1965) हैं. इसमें अमर भूपाली का निर्माण बांग्ला भाषा में भी हुआ था, जिसका संगीत वसंत देसाई ने ही रचा.

राजकमल कला मन्दिर की फ़िल्मों से अलग, कुछ दूसरे प्रोडक्शन हाऊस की सफल संगीतमय फ़िल्मों के साथ भी इस संगीतकार का नाम जुड़ा हुआ है, जिसमें प्रमुख रूप से याद रखने वाली फ़िल्में हैं- मास्टर विनायक की 'सुभद्रा' (1946), सोहराब मोदी की 'झांसी की रानी' (1953), ए. आर. कारदार की 'दो फूल' (1958), अजीत चक्रवर्ती की 'अर्द्धांगिनी' (1959), विजय भट्ट की 'गूँज उठी शहनाई' (1959), बाबूभाई मिस्त्री की 'सम्पूर्ण रामायण' (1961), विजय भट्ट की 'राम-राज्य' (1967), ऋषिकेश मुखर्जी की 'आशीर्वाद' (1968) एवं 'गुड्डी' (1971) और अरुणा-विकास की 'शक़' (1976).

वसंत देसाई

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बेहतरीन संगीत से सजी इन फ़िल्मों की सूची को देखकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वसंत देसाई ने अपने जीवन में सर्वाधिक नवोन्मेषी और मेलोडी-प्रधान संगीत रचने का काम व्ही. शान्ताराम की फ़िल्मों के लिए ही किया है.

इन फ़िल्मों से अलग मात्र तीन फ़िल्में 'गूँज उठी शहनाई', 'आशीर्वाद' एवं 'गुड्डी' ऐसी हैं, जिनकी सांगीतिक ऊंचाई को 'राजकमल कला-मन्दिर' की फ़िल्मों के सापेक्ष रखकर देखा जा सकता है.

विशुद्ध हिन्दुस्तानी संगीत

वसन्त देसाई के यहाँ शास्त्रीय संगीत का ठेठ व्याकरण भी पूरी गंभीरता के साथ उपस्थित मिलता है. वे संभवतः अकेले ऐसे संगीत निर्देशक होंगे, जिन्होनें विशुद्ध हिन्दुस्तानी संगीत की महिमा का ही गायन अपनी संगीतबद्ध फ़िल्मों में किया है.

वसंत देसाई

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उनके यहाँ आप आसानी से राग-रागिनियों के साथ पूरा न्याय होता हुआ देख सकते हैं, जिसमें प्रयोग के लिए भी परिवर्तन की गुंजाइश न के बराबर है. पूर्णता के आकांक्षी संगीतकार के रूप में उनका सांगीतिक विचार इतना परिष्कृत रहा है कि उनके यहाँ फिर संगीत भी संस्कृति के एक प्रमुख घटक की तरह मौजूद मिलता है.

शास्त्रीयता को बड़े जतन से साधे रहने के चलते उनकी परम्परा एक संगीतकार की बनती है, जिसने कभी भी संगीत की पवित्रता को नष्ट नहीं होने दिया.

एक तरह से यह स्थिति उनके लिए शास्त्रीय रागों के संरक्षक की मानिन्द है, मगर उसी समय वे अपनी निजी पहचान की सीमा भी कहीं न कहीं तय कर रहे होते हैं.

वसंत देसाई

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इस लिहाज़ से उनकी गणना संगीत-निर्देशक के रूप में सुधीर फड़के और एस. एन. त्रिपाठी की जमात में हो सकती है. यह तीनों ही संगीतकार मिलकर शास्त्रीय संगीत को फ़िल्म संगीत में प्रतिष्ठा दिलाने में ऐसे समर्पित दिखाई पड़ते हैं, जिनकी वजह से ही कई बार रागों की शुद्धता भी गीतों के लालित्यपूर्ण संयोजन द्वारा व्यक्त हो सकी है.

इस बात की परख के लिए हम एक किसी राग को चुनकर इन तीनों ही संगीतकारों की बनाई हुई धुनों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित कर सकते हैं.

सामाजिक आदर्शवाद का संगीत

उदाहरण के तौर पर राग भूपाली को यदि हम इस विमर्श के लिए चुनें, तो वसंत देसाई के यहाँ वह 'घनश्याम सुंदरा (अमर भूपाली, मराठी) में जितनी शुद्धता से प्रकट होगी, उतनी ही पावनता के साथ वह सुधीर फड़के के यहाँ 'ज्योति कलश छलके' (भाभी की चूड़ियाँ) एवं एस.एन. त्रिपाठी के संगीत-निर्देशन में 'जीवन की बीना का तार बोले' (रानी रूपमती) में भी दिखाई पड़ेगी.

वसंत देसाई

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वसंत देसाई का संगीत शास्त्रीयता के सम्मान के साथ-साथ, कहीं न कहीं सामाजिक आदर्शवाद का उदाहरण भी लगता है, जहाँ नैतिक रूप से धार्मिक होना एक सर्टिफिकेट को पाने जैसा है. उनकी ऐसी छवि बनाने और उसे सार्थकता का जामा पहनाने में सबसे अग्रणी भूमिका व्ही. शांताराम की रही है.

यह देखना दिलचस्प होगा कि शांताराम की ज़्यादातर फ़िल्में भारतीयता की सार्थक रूप से सांस्कृतिक छवि उकेरने वाली फ़िल्में हैं. ऐसे में फ़िल्म के कथानक और मिज़ाज के अनुरूप संगीत रचने का अनुकूल अवसर जब भी संगीतकार के खाते में आया, उन्होंने पूरी गंभीरता से हर बार कुछ नया ही सृजित किया है, जिसकी भाव-सम्पदा भी हर फ़िल्म में अलग-अलग रही है.

बोले रे पपीहरा...

यह वसन्त देसाई ही कर सकते थे कि तमाम सारी पौराणिक, धार्मिक एवं ऐतिहासिक चीज़ों से सामान्य मनोभावों की पृष्ठभूमि रचने में शास्त्रीय रागदारी के पारम्परिक स्वरूप को लेकर उसका व्यावहारिक पक्ष नबरते हुए कुछ उपयोगी क़िस्म की धुनें रच डालते.

वसंत देसाई

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सुखद रूप से जैसा उन्होंने ' उमड़-घुमड़ कर आई रे घटा' (दो आँखें बारह हाथ), 'आई पारी रंग भरी किसने पुकारा' (दो फूल), 'तेरा ख़त ले के सनम, पाँव कहीं रखते हैं हम' (अर्द्धांगिनी), 'अंखियां भूल गई हैं सोना, दिल पे हुआ है जादू टोना' (गूँज उठी शहनाईं), 'डर लागे गरजे बदरिया' (राम राज्य), 'जीवन से लम्बे हैं बन्धु ये जीवन के रस्ते' (आशीर्वाद) एवं 'बोले रे पपीहरा, पपीहरा' (गुड्डी) के माध्यम से किया हुआ है.

इसी समय यह देखना भी समीचीन होगा कि अपने आरंभिक संघर्ष के दौर में वसंत देसाई ने कोल्हापुर में 'देवल-क्लब' में आना जाना बना रखा था, जिसके चलते संगीत के बड़े-बड़े दिग्गजों से बराबर मेल-मुलाक़ात का बहाना उन्हें मिल जाया करता था.

उन दिनों उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान, उस्ताद अब्दुल क़रीम ख़ान, उस्ताद मंझी ख़ान और वझे बुआ से उनकी मुलाक़ात भी 'देवल-क्लब' में ही हुई थी.

वसंत देसाई

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इसी के चलते उन्होंने अपना शास्त्रीय संगीत का ज्ञान भी विस्तृत होता पाया, जो बचपन और किशोरावस्था के दौरान पैतृक गांव में मंदिरों के कीर्तन-गायन एवं दशावतारी नाटकों के पौराणिक आख्यानों के माध्यम से देखते-सुनते हुए उन्हें मिल सका था.

स्वयं गोविंदराव टेम्बे ने भी वसंत देसाई को इसी क्लब में जाने के दौरान देखा था, जब वे अपना काम समाप्त करके हर रात उसी रास्ते घर जाया करते थे.

शास्त्रीय संगीत के प्रति उनके अगाध समर्पण के साथ यह देखना भी प्रीतिकर है कि वे एक ऐसे सैद्धांतिक सोच वाले फ़नकार भी रहे हैं, जिनकी कई प्रतिबद्धताओं ने उनसे उत्कृष्ट संगीत सृजन कराने में मदद करने के बाद भी उनको ठीक ढंग से मुख्यधारा के तमाम दूसरे महत्वपूर्ण बैनरों से जुड़ने नहीं दिया.

हर जगह किसी न किसी बात के लिए वसंत देसाई का स्वाभिमान आड़े आ जाता था और यह दिग्गज संगीतकार अपनी कला से समझौता करके उन रास्तों पर चलने के लिए तैयार न था, जो उनकी रचनात्मक यात्रा में स्वागत के मुलायम गलीचे बिछाने को हर क्षण तैयार थी.

(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)

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