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बॉलीवुड में कहां ग़ायब हो गईं 'मोना' और 'शबनम'
- Author, सुमिरन प्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सिनेमा में एक विलेन हीरोइन को तंग कर कहानी में कई मोड़ लाता है, लेकिन वैंप कहानी में आकर एक पल में सब कुछ बदल देती है. ये है हिन्दी सिनेमा में वैंप की ताक़त.
अगर पुरानी हिदी फ़िल्में देखें तो वैंप अक्सर बोल्ड कपड़े पहनती है. कहानी के किरदारों को अपने जलवों से प्रभावित करती है और ग़लत काम अपनी मर्ज़ी से करती है.
पचास के दशक में बड़े पर्दे पर ग़लत काम करने का बीड़ा उठाया ललिता पवार और नादिरा ने.
साठ और सत्तर के दशक में वैंप के कैंप में नई अभिनेत्रियां आईं. वैंप का कहानी में एक अलग रोल होता है.
चाहे वो हेलेन हों, पदमा खन्ना हों, बिंदु हों, अरुणा ईरानी हों या शशिकला. वैंप कहानी में मोड़ लाती है, कुछ वैंप तो एक गाने में बोल्ड कपड़े पहनकर डांस करती है.
वैंप के मशहूर डायलॉग और गाने
हिन्दी सिनेमा की वैंप अपने एक किरदार या गाने से सालों तक लोगों को याद रही.
चाहे वो बिंदु का किरदार 'मोना डार्लिंग' हो या फ़िल्म 'कटी पतंग' का गाना- 'मेरा नाम शबनम' हो.
पद्मा खन्ना का फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' का गाना 'हुस्न के लाखों रंग' लोगों को बहुत पसंद. हेलेन के बहुत से गाने तो सुपरहिट रहे.
हेलेन ने पहले कुछ फ़िल्मों में कोरस डांसर का काम किया. 'हावड़ा ब्रिज' के गाने 'मेरा नाम चिन चिन चू' से उन्हें कामयाबी मिली और ये गाना बेहद मशहूर हुआ.
शोले, डॉन, तीसरी मंज़िल जैसी कई फ़िल्मों में उन पर फ़िल्माए गाने सुपरहिट रहे.
मजबूरी ने बनाया वैंप ?
अरुणा ईरानी ने नौ साल की उमर से काम कना शुरू कर दिया था.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में उन्होंने बतया, "वैंप इत्तेफ़ाक़ से बनी, ख़्वाब तो हमारे ऊँचे थे. हीरोइन और डॉक्टर बनना चाहती थी. लेकिन हमारा परिवार ग़रीब था और परिवार को मुझे पालना था. हुआ ये कि मेरी 1972 की फ़िल्म 'बॉम्बे टू गोआ' हिट हुई फिर 'कारवाँ' हिट हुई, लेकिन मेरे पास कोई फ़िल्म नहीं आई."
उनका कहना था, "दादा कोंडके के साथ मराठी फ़िल्म की और फिर मेरे पास आई राज कपूर की 'बॉबी'. हालांकि मुझे डर लगा कि मुझे वैंप बनना पड़ रहा है, लेकिन मैंने फ़िल्म की और उसके बाद भगवान की कृपा रही. मेरा सबसे यादगार रोल मुझे 1992 की माधुरी की फ़िल्म 'बेटा' का लगता है जिसमें मैंने एक ऐसी औरत का किरदार निभाया जो पूरी तरह नेगेटिव थी. उसके लिए मुझे अवॉर्ड भी मिला."
बीबीसी से ख़ास बातचीत में 'मोना डार्लिंग' बनी बिंदु ने बताया कि उन्हें रोल ही वैंप के मिले.
बिंदु ने कहा, "जब मैंने शुरुआत की तो खलनायिका का दौर था. मैं बनना हीरोइन चाहती थी, लेकिन किसी ने कहा कि मैं बहुत पतली हूँ. हिन्दी ठीक से नही बोल सकती. बहुत लंबी हूँ. फिर वही मेरी कमियाँ लोगों को पसंद आई.
उन्होंने कहा, "मैंने शुरुआत की फ़िल्म 'दो रास्ते' के साथ और मैं बन गई विलन. फिर आई 'कटी पतंग' जिसमें मैं कैबरे डांसर बनीं. फिर तो ठप्पा लग गया और बहुत प्यार मिला. उसके बाद मुझे वही रोल आते- मैं वैंप बनती और एक डांस नंबर करती."
जब हीरोइन बनी बोल्ड
अस्सी और नब्बे के दशक तक आते-आते वैंप के किरदार में बदलाव आया. अब हीरोइन भी उतनी बोल्ड थी जितनी वैंप. अब वैंप तो कोई रिश्तेदार ही निकलती.
चाहे 'राजा हिन्दुस्तानी' की करिश्मा कपूर की सौतेली मां हो या फ़िल्म 'बेटा' की सौतेली मां. लेकिन अब कोई ऐसी अभिनेत्री नहीं थी जो ख़ासकर वैंप के रोल करती हो.
नब्बे के दशक के अंत तक हीरोइन भी विलन बनने को राज़ी थी. चाहे वो 'गुप्त' में काजोल हो या 'प्यार तूने क्या किया' में उर्मिला मातोंडकर हो.
कुछ इस तरह हिन्दी सिनेमा से वैंप हुई ग़ायब.
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