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बॉलीवुड में स्क्रीन वॉर अब भी चलेगी?
- Author, सुप्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी के लिए
सौ वर्ष पूरी कर चुकी हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में अब फ़िल्मों की सफलता उसके फ़िल्मी कारोबार से ही आंकी जाती है.
साल के 52 हफ़्तों में लगभग 250 हिंदी फ़िल्में रिलीज़ होती हैं. इसी कारण दो फ़िल्मों का साथ आना कोई बड़ी बात नहीं है.
और जब दो बड़ी फ़िल्में साथ आती हैं, तो अधिक स्क्रीन हासिल करने की होड़ में डिस्ट्रीब्यूटर और प्रबंधकों के बीच लॉबिंग शुरू हो जाती है.
इस साल दिवाली के मौके पर दो बड़ी फ़िल्में - करण जौहर की 'ऐ दिल है मुश्किल' और अजय देवगन की 'शिवाय' एक साथ रिलीज़ होंगी पर अभी से ही इनकी सफलता-असफलता को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म है.
भारत में फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूशन कई क्षेत्रों में बंटा है. मुंबई क्षेत्र से 35-40 फ़ीसदी आमदनी आती है तो दिल्ली क्षेत्र से 18-20 फ़ीसदी वहीं राजस्थान क्षेत्र से 16 फ़ीसदी, पंजाब क्षेत्र से 10 फ़ीसदी, पश्चिम सर्कल से 12-14 फ़ीसदी और दक्षिण क्षेत्र से 10-12 फ़ीसदी तक हिंदी फिल्मों की कमाई होती है.
भारत में करीबन 750 मल्टीप्लेक्स थिएटर हैं, जिसमें हर तरह की फ़िल्में लगती हैं. करीब 3000 सिंगल स्क्रीन थियेटरों के कब्जे के लिए कई डील्स डिस्ट्रीब्यूटरों की तरफ से होती हैं जिन्हें स्क्रीन वॉर का नाम दिया जाता है.
बीबीसी से ख़ास बातचीत में वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे कहते हैं, "ज़्यादा-से-ज़्यादा स्क्रीन पर कब्जे की होड़ की शुरुआत यशराज की 2012 में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'जब तक है जान' और 'सन ऑफ़ सरदार' से हुई."
2012 में यशराज की 'एक था टाइगर' फ़िल्म के रिलीज़ के दौरान सिंगल स्क्रीन मलिकों से 'जब तक है जान' का सौदा भी कर दिया गया था.
इसके कारण अजय देवगन की फ़िल्म 'सन ऑफ़ सरदार' को काफ़ी कम सिंगल थिएटर मिले, उस दौरान अजय देवगन ने इसका विरोध भी किया था.
स्क्रीन वॉर का दूसरा वाकया शाहरुख़ खान की 2013 की फ़िल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' और बालाजी फ़िल्म की 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा' के बीच हुआ.
इन दोनों फ़िल्मों के रिलीज़ में एक हफ़्ते का अंतर था पर 'चेन्नई एक्सप्रेस' ने दूसरा हफ़्ता भी बुक कर लिया. जिसके कारण 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दोबारा' को कम स्क्रीन मिले.
2014 में इसी तरह की डील के कारण विशाल भारद्वाज की 'हैदर' को अधिक स्क्रीन मिले और ऋतिक रोशन की फ़िल्म 'बैंग बैंग' को इसका नुकसान उठाना पड़ा.
फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर अनिल थडानी भी मानते हैं, "एक लड़ाई तो रहती ही है, क्योंकि जब दो बड़ी फ़िल्में साथ आती हैं तो स्क्रीन कम मिलते हैं."
जयप्रकाश चौकसे के मुताबिक़ इस प्रकार के समझौतों को बड़ा झटका तब लगा जब संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'बाजीराव मस्तानी' और शाहरुख़ खान की फ़िल्म 'दिलवाले' के लिए इरोस ने सिंगल स्क्रीन थिएटर मालिकों से 'बजरंगी भाईजान', 'वेलकम बैक' और 'बाजीराव मस्तानी' के लिए एक साथ डील की शर्त रखी.
इससे नाराज़ होकर मुंबई क्षेत्र के कुछ सिंगल स्क्रीन मालिकों ने कोर्ट का सहारा लिया और कोर्ट ने थिएटर मालिकों का साथ देते हुए इस समझौते पर रोक लगा दी.
ऐसे ही समझौते के तहत हाल ही में रिलीज़ हुई ऋतिक रोशन की फ़िल्म 'मोहनजो दारो' को 'रुस्तम' से अधिक स्क्रीन मिली, जिससे सिंगल स्क्रीन थिएटर मालिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
100 करोड़ से अधिक की कमाई करने वाली 'रुस्तम' फ़िल्म के निर्माता नीरज पांडे कहते हैं, "फ़िल्म चलती है, ये मायने नहीं रखता कि कितने स्क्रीन में रिलीज़ हुई....? अगर आपको कम स्क्रीन मिलती भी है और फ़िल्म अच्छी है तो लोगों के कहने पर और लोग फ़िल्म देखने आएंगे."
इस घटना से सबक लेते हुए अधिकतर सिंगल स्क्रीन मालिकों ने तय किया है कि दो बड़ी फ़िल्मों के बीच अब वो शो बांट देंगे.
सलमान खान भी दो बड़ी फ़िल्मों के साथ रिलीज़ होने के ख़िलाफ़ है.
उनके मुताबिक़ ऐसा अक्सर निर्माताओं के अहंकार के कारण होता है और दोनों फ़िल्मों को इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ता है.
मुंबई के जी 7 मल्टीप्लेक्स और मराठा मंदिर थिएटर के कार्यकारी निर्देशक मनोज देसाई कहते हैं, "हम नैतिकता के आधार पर फिल्मों को शो देते हैं और अगर किसी प्रकार का दबाव डिस्ट्रीब्यूटर या फ़िल्म प्रोडक्शन से आता है तो हम वो फ़िल्म ही छोड़ देते है."
'ऐ दिल है मुश्किल' और 'शिवाय' के रिलीज़ के दौरान स्क्रीन वॉर होगा या नहीं, ये तो वक़्त ही बताएगा.
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