सुबह ट्विटर पर गालियां सुनकर उठती हूं: स्वरा भास्कर

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- Author, सु्प्रिया सोगले
- पदनाम, मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
'तनु वेड्स मनु', 'रांझना' और 'नील बट्टे सन्नाटा' में संवेदनशील अभिनय से अपनी छाप छोड़ने वाली स्वरा भास्कर आए दिनों सोशल मीडिया पर अपने सामाजिक और राजनीतिक विचार सामने रखती हैं पर इसका ख़ामियाज़ा भी उन्हें भुगतना पड़ा है.
बीबीसी से बातचीत में स्वरा भास्कर ने माना कि 2014 में जब से उन्होंने लोकसभा चुनाव में मोदी-बीजेपी जीत के विरोध में ट्विटर पर टिप्पणी की तब से उन्हें ट्विटर ट्रोल का शिकार होना पड़ा है और आज तक ये सिलसिला चल रहा है.
उनके मुताबिक़ ये नौबत आ गई है कि लोग भजन सुनकर उठते हैं पर स्वरा ट्विटर पर गालियां सुनकर सुबह की शुरुआत करती हैं.

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वहीं जब कोई महिला अपने सशक्त विचार सोशल मीडिया पर ज़ाहिर करती है तो उसे "बलात्कार की धमकी" का सामना करना पड़ता है.
इस पर स्वरा अपनी टिप्पणी देते हुए कहती हैं, "ये सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं है बल्कि पुरी दुनिया में है. ये पुरुष प्रधान मानसिकता दर्शाती है कि जब कोई महिला अपने विचार रखती है तो उससे असहमति दर्शाने के लिए उसे वेश्या करार दे दो या अपशब्द का उपयोग कर दो जो अपने आप में बेवकूफ़ी है."

स्वरा ने साफ़ किया कि वो किसी देश विरोधी विचारधारा की समर्थक नहीं है पर जहाँ जुटे चप्पल तेज़ाब और गलियों का प्रयोग के बात आती है तो वो देश के संविधान के ख़िलाफ़ है अवैध और आपराधिक है. और ऐसे लोगों के पास अपनी विचारधारा साबित करने के लिए तर्क नहीं होते हैं.
दिल्ली के रामजस कॉलेज में छात्र संगठनों के बीच हुए विरोध के मामले में स्वरा ने अपने विचार खुलकर सामने रखे हैं. वहीं सह-कलाकार पंकज त्रिपाठी का मानना है कि छात्र संगठन अपने मुद्दों से भटक गए हैं.
'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर', 'मसान' और 'नील बट्टे सन्नाटा' जैसी फ़िल्मों में अहम भूमिका निभा चुके पंकज त्रिपाठी भी नब्बे के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के सदस्य थे.

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उस दौर के विद्यार्थी परिषद् के बारे में पंकज कहते हैं, "उस दौरान असहमति पर हम विचार-विमर्श किया करते थे पर कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया. उस दौर में छात्रों की तकलीफ़ अहम मुद्दा हुआ करती थी और देश के मुद्दे बाद में आया करते थे."
1993 में पटना में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के दौरान पंकज त्रिपाठी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सदस्य थे और मधुबनी में दो छात्रों की गोली मार कर हत्या के विरोध में लालू यादव की सरकार के ख़िलाफ़ सभी छात्र राजनीतिक दलों जिसमें आइसा, एबीवीपी, एनसीएसॉआई भी शामिल थे, ने धरना दिया था.
धरने में शामिल छात्रों को जेल भी जाना पड़ा था.
अब किसी राजनीतिक पार्टी से कोई ताल्लुक ना रखने वाले पंकज त्रिपाठी का मानना है, "एबीवीपी पहले हिंसक नहीं थी. ये समझना ज़रूरी है कि असहमति का विचार देशविरोधी विचार नहीं होता. हिंसा से कोई हल नहीं निकलता है बल्कि डर का माहौल पनपता है. और अगर डर कॉलेज के कैम्पस तक पहुँचेगा तो हमें अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता होगी जो देश के भविष्य हैं."
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