ग़लतियों से भरी थी, कुछ-कुछ होता है: करण

फ़िल्म निर्माता निर्देशक करण जौहर.

इमेज स्रोत, RAINDROP MEDIA

    • Author, संजय मिश्रा
    • पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

फ़िल्म निर्माता निर्देशक करण जौहर को अब इस बात का एहसास हुआ है कि उनकी पहली फ़िल्म 'कुछ-कुछ होता है' ग़लतियों से भरी एक बेवकूफाना फ़िल्म थी.

उनका कहना है कि वो आज उसे शायद ही दोहराना चाहें. शाहरुख़ ख़ान, काजोल और रानी मुखर्जी स्टारर यह सुपरहिट फ़िल्म 18 साल पहले रिलीज़ हुई थी. इसने करण को बॉलीवुड में स्थापित कर दिया था.

एक फ़िल्म महोत्सव में भाग लेने पहुंचे करण को एक दर्शक ने बताया कि 'कुछ-कुछ होता है' उन्हें तो पसंद है, लेकिन उनके बच्चे इसे पसंद नहीं करते.

इस पर करण ने मज़ाकिया लहजे में कहा, "बड़ा कठोर दिल है उनका, जिन्हें मेरी फ़िल्म 'कुछ-कुछ होता है' पसंद नहीं आई. यह बात मेरे दिल को छू गई कि मेरी पहली फ़िल्म किसी को पसंद ना आई हो. आज तो रात में फूट-फूटकर रोने वाला हूं मैं."

करण के मुताबिक़ उस दौर में इस फ़िल्म में जो मज़ा, रस, सुर और मासूमियत थी, उसे लोगों ने पसंद किया. लेकिन आज सबकुछ बदल रहा है.

उस समय हम कहते थे प्यार दोस्ती है. इसी थीम पर मैंने आज के ज़माने की फ़िल्म 'स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर' बनाई.

फ़िल्म निर्माता निर्देशक करण जौहर.

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लेकिन समय के साथ मैंने इस थीम के सुर को बदल दिया, ताकि आज के युवाओं की सोच के साथ कहानी को जोड़ पाऊं.

करण कहते हैं, "समय के साथ मेरे दर्शक बदल गए हैं. मेरे पैरामीटर में अब आज का यंगिस्तान है. मुझे उसकी समझ और सोच का ख़्याल रखना होगा.

करण के मुताबिक़ 'कुछ-कुछ होता है' में एक ऑरगैनिक मासूमियत थी. उन दिनों मैं राज कपूर और यश चोपड़ा की फ़िल्मों से प्रेरित था.

आज जब मैं 'कुछ-कुछ होता है' खुद देखता हूं, तो मुझे लगता है कि मैंने फ़िल्म के अंदर काफ़ी ग़लतियां की हैं.

सच पूछो तो 'कुछ-कुछ होता है' बहुत ही असामान्य और बेवकूफाना जैसे चीजों से भरी फ़िल्म थी.

मसलन फ़िल्म में शाहरुख़ का एक डायलॉग है 'प्यार ज़िंदगी में एक ही बार होता है और शादी भी एक ही बार होती है', जबकि फ़िल्म में वो खुद दो बार प्यार भी करता है और शादी भी.

यह सारी वो ग़लतियां थीं जिसमें कोई लॉजिक ही नहीं था. जो मुझे बाद में पता चलीं.

फ़िल्म निर्माता निर्देशक करण जौहर.

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करण कहते हैं, ''मैंने फ़िल्म को इतनी शिद्दत के साथ लिखा था कि उस समय किसी ने ग़लतियों को पकड़ा ही नहीं."

करण ने बताया, " बिल्कुल ऐसी ही कई गलतियां मेरी फ़िल्म कभी-ख़ुशी कभी-गम में भी थी. दोनों ही फ़िल्मों का फॉरमेट लगभग एक जैसा था.''

करण मानते हैं कि दोनों फ़िल्मों की ग़लतियों पर लोगों का ध्यान न जाने की वजह उन कहानियों की मासूमियत और फ़िल्म में काम करने वाले सितारों का स्टार पावर है.

करण के मुताबिक़ आज सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में फ़िल्म स्टार की हर बात लोगों के सामने हैं. कौन क्या कर रहा है, ट्विटर की वजह से जगजाहिर है.

यही वजह है की अब फ़िल्मों में एक कलाकार के स्टारडम का जादू ख़त्म हो गया है.सोशल मीडिया ने सुपरस्टार्स की मिस्ट्री को ख़त्म कर दिया है. इसका नुकसान कहीं न कहीं फ़िल्मों को भी हो रहा है.

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