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शेयर बाज़ारों में संकट की स्थिति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जो वित्तीय संकट अमरीका से शुरु हुआ था उसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है. इसके चलते शेयर बाज़ारों में संकट की स्थिति दिख रही है. वॉल स्ट्रीट में डाउ जोन्स 370 अंक गिरकर 2004 के बाद पहली बार 10 हज़ार से नीचे चला गया. ब्रिटेन और सभी बड़े यूरोपीय शेयर बाज़ारों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है. उधर एशियाई शेयर बाज़ार में भी गिरावट का दौर कुछ थमता हुआ सा दिख रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंकों के हस्तक्षेप के आश्वासन के चलते बाज़ार में थोड़ी स्थिरता आई है. भारत में भी शेयर बाज़ार में सोमवार को भारी गिरावट दर्ज़ हुई थी और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक 724 अंकों की गिरावट के साथ 11801 के स्तर पर बंद हुआ था. लेकिन रिज़र्व बैंक की सीआरआर दर घटाने की घोषणा के चलते बाज़ार मंगलवार को कुछ संभला और सूचकांक एक बार फिर 12 हज़ार के पार चला गया. निवेशकों को डर है कि सरकारें जो निर्णय ले रही हैं वे संकट से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. अरबों डॉलर डूबे सोमवार को दुनिया के शेयर बाज़ारों से, अरबों डॉलर का सफ़ाया हो गया. सबसे पहले एशियाई बाज़ार खुले और खुलते ही गिरे. जब यूरोपीय बज़ारों का समय आया तो उनकी शुरुआत भी बिकवाली से हुई. पेरिस के सीएसी फ़ौर्टी ने अब तक की सबसे भारी गिरावट देखी. वह नौ प्रतिशत से भी अधिक नीचे गिरा. फ़्रैंकफ़र्ट के डीएऐक्स सूचकांक में सात प्रतिशत की गिरावट आई. लंदन में भी सात प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई जो पिछले 20 सालों में सबसे अधिक बताई जा रही है. मैड्रिड, ब्रसल्स और मॉस्को तक के शेयर बाज़ारों में बिकवाली का दौर जारी रहा.
फिर न्यूयॉर्क के शेयर बाज़ार के खुलने की घंटी बजी, तो वहाँ भी घबराहट का माहौल था. व्यापारियों ने अटलांटिक महासागर पार के यूरोपीय बाज़ारों से संकेत लिया और एक समय ऐसा आया कि डाओ जोन्स 800 अंक गिर गया लेकिन कारोबार बंद होने के पहले बाज़ार कुछ संभला और कुल गिरावट 370 अंक की दर्ज की गई. इसी तरह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक 724 अंकों की गिरावट के साथ 11801 के स्तर पर बंद हुआ. बाज़ार दो साल के अपने न्यूनतम स्तर पर था. सभी शेयर बाज़ारों में सबसे ज़्यादा धक्का खाया बैंकों के शेयरों ने. लेकिन तेल के शेयर और उपभोग की वस्तुएँ बनाने वाली कम्पनियों के शेयर भी गिरे जो आम तौर पर अस्थिरता के माहौल में भी अपनी साख बनाए रखती हैं. कहा जा रहा है कि दुनिया के शेयर बाज़ारों को उम्मीद थी कि केन्द्रीय बैंक, ब्याज़ दर में कटौती की घोषणा करेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उन्हे यह भी समझ में आ रहा है कि अमरीकी संसद के आर्थिक पैकेज को लागू करने में समय लगेगा. सरकार को बैंको के ख़राब ऋण ख़रीदने के लिए एक ढांचा तैयार करना पड़ेगा और तब तक ऋण बाज़ार में तंगी बनी रहेगी. लंबा दौर जब अमरीकी संसद ने 700 अरब डॉलर के बचाव पैकेज को स्वीकृति दी, तब भी आर्थिक विश्लेषक कह रहे थे कि इससे बाज़ार शान्त नहीं होंगे और सोमवार को जिस तरह एशिया, यूरोप और अमरीका के शेयर बाज़ारों में धड़ाधड़ बिकवाली हुई उससे स्पष्ट हो गया कि आर्थिक अनिश्चितता का यह दौर लम्बा चलेगा. अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा कि इस आर्थिक पैकेज को प्रभावी होने में समय लगेगा. उन्होंने कहा, "इस पैकेज का सबसे बुनियादी लक्ष्य ये है कि ऋण ख़त्म किया जाए जिससे एक बार फिर पैसे का लेन-देन शुरु हो सके. इसमें समय लगेगा. मैंने पिछले सप्ताह ही इस विधेयक पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन ऐसी योजना को लागू करने में समय लगेगा जो प्रभावी हो और करदाताओं का पैसा बरबाद न करे." राष्ट्रपति बुश का कहना था, "हमें इसमें जल्दबाज़ी नही करनी चाहिए. वित्तीय व्यवस्था में विश्वास बहाल करने में वक्त लगेगा." यूरोपीय देशों की सरकारों ने भी निवेशकों को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि उनकी वित्तीय व्यवस्था में स्थिरता है. यूरोपीय संघ के अध्यक्ष और फ़्रांस के राष्ट्रपति निकोला सारकोज़ी ने एक वक्तव्य पढ़कर सुनाया. उन्होंने कहा, "हम सभी यूरोपीय देशों के प्रमुख यह कहते हैं कि हम वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए सभी उपाय करेंगे, चाहे इसके लिए केन्द्रीय बैंकों से पैसा उपलब्ध कराना हो या फिर जमा राशि का संरक्षण करना हो." अपने बयान में उन्होंने कहा, "एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसका पैसा यूरोपीय संघ के देशों के बैंको में जमा हो और उसने कोई नुकसान उठाया हो. और हम आर्थिक व्यवस्था और खातेदारों की रक्षा के लिए सभी उपाय करते रहेंगे." |
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