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तेल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक के उत्पादन नहीं बढ़ाने के फ़ैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में ज़बरदस्त उछाल आया है. बुधवार को कच्चे तेल की कीमतें 104 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुँच गईं. न्यूयॉर्क में कच्चा तेल पाँच डॉलर की बढ़त के साथ 104.52 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया. कच्चे तेल में उबाल से महंगाई की मार झेल रहे विकासशील देशों में समस्या और गहरा सकती है. इससे पूर्व, ओपेक देशों के प्रतिनिधि बुधवार को वियेना में मिले और उन्होंने कहा कि मौजूदा उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है. ओपेक के अध्यक्ष चाकिब ख़ेलिल ने कहा कि कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि आपूर्ति की समस्या के कारण नहीं बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा सट्टेबाज़ी के कारण है. उन्होंने कहा, "तेल की कीमतें सप्लाई की कमी के कारण नहीं बढ़ रही हैं. मुझे आशंका है निकट भविष्य में तेल की मांग में कमी आ सकती है." अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने भी कहा है कि कच्चे तेल के ऊँचे दाम अमरीकी अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहे हैं और यह मंदी की समस्या को और बढ़ा सकता है. जॉर्ज की अपील राष्ट्रपति बुश ने मंगलवार को ओपेक से तेल उत्पादन बढ़ाने की अपील की थी. उन्होंने कहा, "वह तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से होने वाले नुक़सान को समझते हैं." दुनिया में तेल के सबसे बड़े उपभोक्ता अमरीका को उम्मीद थी कि ओपेक अपने उत्पादन में 3-5 लाख बैरल प्रति दिन की वृद्धि करेगा और इससे तेल की कीमतें कम होंगी. लेकिन कतर के तेल मंत्री ने कहा कि ओपेक भू-राजनीतिक स्थितियों और सट्टेबाज़ों से प्रभावित नहीं होता. उन्होंने कहा कि तेल की मौजूदा कीमतें मांग-आपूर्ति में अंतर की वजह से नहीं बल्कि ज़रूरत से ज़्यादा सट्टेबाज़ी के कारण बढ़ी हैं. |
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