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कारें बढ़ने से क्या बढ़ेंगी समस्याएं...? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के ऑटो एक्सपो में गुरुवार को टाटा मोटर्स ने अपनी एक लाख रुपए की कार पेश कर दी. लेकिन मध्यवर्ग तबक़े का कार ख़रीदने का सपना साकार करने का दावा करने वाली इस कार से पर्यावरण से जुड़े कई सवाल भी खड़े हो गए है. भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा दो पहिया वाहनों का बाज़ार है और चौपहिया वाहनों में भारत का स्थान 11वाँ हैं. भारत के बड़े शहरों में पहले से ही व्यस्त सड़कों पर गाड़ियों की भरमार, उनसे निकलता धुआँ और ट्रैफ़िक जाम से परेशान लोग ये कुछ ऐसी आशंकाएँ हैं जो अभी से व्यक्त की जा रही हैं. सोसाइटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफ़ैक्चरर्स के एक ताज़ा सर्वेक्षण के मुताबिक़ घनत्व के लिहाज से दिल्ली में सबसे ज़्यादा कार हैं यानि प्रति एक हज़ार की जनसंख्या पर दिल्ली में 85 निजी कार हैं. उसके बाद लुधियाना और चेन्नई का स्थान आता है. सड़कों पर बोझ भारत में इस समय लगभग सात करोड़ दोपहिया वाहन और 1 करोड़ निजी कारें हैं और ये संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. सवाल ये उठता है कि क्या भारत की सड़कें इनका बोझ सहने को तैयार हैं. यातायात व्यवस्था पर लंबे समय से काम कर रहे आईआईटी दिल्ली के प्रोफ़ेसर दिनेश मोहन कहते हैं कि भारत में सड़कें यूरोप की सड़कों से कम चौड़ीं नहीं हैं लिहाज़ा सड़कें समस्या का कोई कारण नही है. उनका मानना है कि सड़कें बढ़ाने से कारों की संख्या हमेशा बढ़ती है. इससे मिलने वाले धन से सरकार को पैदल चलने वालों के लिए विशेष मार्ग बनाने चाहिए. ऐसे ही बस मार्ग बनाने चाहिए. प्रोफ़ेसर दिनेश का मानना है कि जब कार से जुड़े अन्य खर्चे बढ़ेंगे और उनके लिए सड़कें कम उपलब्ध होंगी तो उनकी संख्या पर अपने आप लगाम लगेगी. प्रदूषण बढ़ने की आशंका लेकिन ये मसला सिर्फ़ बेहतर यातायात व्यवस्था तक ही सीमित नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ज़्यादा हो गई है. भारत अपनी ज़रूरत का 75 प्रतिशत तेल आयात करता है और विश्व का चौथा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है. ऐसे में कारो की संख्या बढ़ने का मतलब है कि ज़्यादा तेल की ज़रूरत यानि तेल आयात में इज़ाफ़ा. विज्ञान एवम् पर्यावरण केंद्र की निदेशिका सुनीता नारायण का कहना है कि गाड़ियों की संख्या बढ़ने से प्रदूषण भी बढ़ेगा और सड़कों पर भीड़ भी लेकिन इसके लिए वो सिर्फ़ छोटी गाड़ी को दोषी नहीं ठहराऊँगी क्योंकि ये सब गाड़ियों का सवाल है. भारत पिछले कुछ वर्षों से नौ प्रतिशत से अधिक दर से विकास कर रहा है. विकास की इस दौड़ में शामिल होने का हक़ सभी को है लेकिन ये ज़िम्मेदारी भी सरकार और लोगों की है कि विकास की दौड़ में आंखे खुली रखी जाएं. कहीं ऐसा ना कि सपना टूटने के बाद जब आंख खुले तो बहुत देर हो जाए. | इससे जुड़ी ख़बरें पश्चिम बंगाल में कार कारखाने का विरोध26 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भारतीय अख़बारों में छाया टाटा01 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस झीलों पर शहरीकरण के दबाव की चिंता29 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस क्या एवरेस्ट की ऊँचाई घट रही है?25 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस 'कार्बन उत्सर्जन:अमीर ज़्यादा दोषी'13 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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