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'बजट - समय से पहले चुनाव का संकेत' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बजट को देखने के बाद भी अगर किसी को यह लगता है कि लोकसभा चुनाव 2009 में होंगे तो, उसकी यह सोच बिल्कुल ग़लत हो सकती है. बजट के कलेवर से यह बात लगभग साफ़ है कि आम चुनाव इस वर्ष नवंबर में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ हो जाएंगे. अब किसी तरह की बहस की गुंजाइश नहीं है. यह पूरी तरह से एक राजनीतिक बजट है जिसे चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया गया है. सरकार जल्द से जल्द चुनाव करवाना चाहेगी. राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि नवंबर में जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, ख़ासकर भाजपा शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो उसी समय लोकसभा चुनाव भी करवा लिए जाएंगे. नज़र चुनावों पर इसके पीछे सोच यह है कि केंद्र सरकार के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का प्रभाव राज्य सरकारों के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से कम हो जाएगा. सरकार सभी पक्षों को लुभाने की कोशिश में है. देश में सबसे अधिक मतदाता किसान हैं जिन्हें लुभाने के लिए सरकार ने उनके कर्ज़ माफ़ कर दिए हैं. इसके साथ ही सरकार ने मध्य वर्ग को लुभाने के लिए उनके आयकर की सीमा बढ़ा दी है जिससे सबकी जेब में कुछ न कुछ अतिरिक्त पैसा बचा रहे. इससे सबके पास अब ज़्यादा पैसा ख़र्च करने के लिए या बचत करने के लिए होगा. एनडीए से सीख ली बजट में किसान हो या मध्यम वर्ग सबके लिए कुछ न कुछ ज़रूर है. बजट में अगर किसी के लिए नहीं है तो सिर्फ़ उद्योग जगत के लिए, जो अपने रफ्तार से चल रहा है. उनकी विकास दर अच्छी है. इस बजट में उनके लिए कुछ नहीं है. जिसे हम बड़ा आदमी मानते हैं, जो मतदान नहीं करता. यह पूरी तरह से चुनावी बजट है. जो–जो वर्ग प्रभावी मतदान करता है उसे लुभाने के लिए पूरा प्रयास किया गया है. चुनाव अब जल्दी होंगे. यह भी लग रहा है कि सरकार अब परमाणु क़रार पर भी पहल करेगी जिसके बाद चुनाव का मंच तैयार हो जाएगा. यूपीए सरकार ने एनडीए सरकार से यह सीख़ ली है कि अर्थव्यवस्था कितनी भी तेज़ क्यों न हो, विकास की रफ्तार चाहे कितनी भी हो, जिस तरह एनडीए सरकार ने इंडिय़ा शाइनिंग की मुहिम चलाकर मुंह की खाई थी, उससे इस सरकार ने यह सबक लिया है कि जब तक लोगों में यह संदेश नहीं जाएगा कि आम लोगों, गरीबों और किसानों के लिए सरकार अच्छा काम कर रही है, तब तक चुनाव नहीं जीता जा सकता. कितना हाथ गरीबों के साथ..? चार साल तक तो सरकार ने अपनी आर्थिक नीतियों में अमीरों और उद्योगपतियों की बात की, लेकिन चुनावी वर्ष में वह उहापोह में नहीं पड़ना चहती. सरकार ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि वह आम आदमी, ग़रीब और किसान के साथ गंभीरता से खड़ी है. ताज़ा बजट उसी को लुभाने का प्रयास है.
मोटे तौर पर देखें तो पिछले 25 वर्ष में देश ऐसा कोई चुनाव नहीं हुआ है, जिसमें पुरानी सरकार वापस आई हो. चुनावों में एंटी इंकंबेंसी का पलड़ा हमेशा भारी रहा है, इसके बावजूद सरकारें चुनाव से पहले लोकप्रिय फ़ैसले लेने की कोशिश करती रही हैं. इस बार भी यही कोशिश की गई है. यह कतई ज़रूरी नहीं है कि पिछला रिकॉर्ड दोहराया जाए. कोशिश नहीं करने से तो ऐसी कोशिश करना सरकार को कहीं बेहतर स्थिति में ले जाएगा. सरकार की इस कवायद का कितना असर पड़ेगा इसका अभी आकलन नहीं किया जा सकता. लेकिन सरकार ने कोशिश ज़बरदस्त की है. सरकार की कोशिश है कि वह आम आदमी की सरकार दिखे न कि उद्योगपतियों की. | इससे जुड़ी ख़बरें किसानों के कर्ज़ माफ़, आयकर में राहत29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार कई हिस्सों में बँटा होता है बजट29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार बजट की ख़ास बातें एक नज़र में 29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार भाजपा, वाम ने की बजट की आलोचना29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार कैसे तैयार होता है आम बजट29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार दुधारू गाय बनता सर्विस टैक्स 29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार रक्षा बजट एक लाख करोड़ के पार29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार बजट से नहीं संभले शेयर बाज़ार29 फ़रवरी, 2008 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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