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शुक्रवार, 29 फ़रवरी, 2008 को 14:44 GMT तक के समाचार
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'बजट - समय से पहले चुनाव का संकेत'

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम (फ़ाइल फ़ोटो)
इस बजट के बाद अब यह लगभग साफ़ हो गया है कि चुनाव इसी वर्ष नवंबर में हो जाएंगे
बजट को देखने के बाद भी अगर किसी को यह लगता है कि लोकसभा चुनाव 2009 में होंगे तो, उसकी यह सोच बिल्कुल ग़लत हो सकती है.

बजट के कलेवर से यह बात लगभग साफ़ है कि आम चुनाव इस वर्ष नवंबर में होने वाले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ हो जाएंगे.

अब किसी तरह की बहस की गुंजाइश नहीं है. यह पूरी तरह से एक राजनीतिक बजट है जिसे चुनाव को ध्यान में रखकर बनाया गया है. सरकार जल्द से जल्द चुनाव करवाना चाहेगी.

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि नवंबर में जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, ख़ासकर भाजपा शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो उसी समय लोकसभा चुनाव भी करवा लिए जाएंगे.

नज़र चुनावों पर

इसके पीछे सोच यह है कि केंद्र सरकार के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का प्रभाव राज्य सरकारों के एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से कम हो जाएगा. सरकार सभी पक्षों को लुभाने की कोशिश में है.

सरकारन ने मध्य वर्ग जो देश में माहौल बनाता हैं. उसे लुभाने के लिए उनके आयकर की सीमा बढ़ा दी है. जिससे सबकी जेब में कुछ न कुछ अतिरिक्त पैसा बचा रहे

देश में सबसे अधिक मतदाता किसान हैं जिन्हें लुभाने के लिए सरकार ने उनके कर्ज़ माफ़ कर दिए हैं. इसके साथ ही सरकार ने मध्य वर्ग को लुभाने के लिए उनके आयकर की सीमा बढ़ा दी है जिससे सबकी जेब में कुछ न कुछ अतिरिक्त पैसा बचा रहे. इससे सबके पास अब ज़्यादा पैसा ख़र्च करने के लिए या बचत करने के लिए होगा.

एनडीए से सीख ली

बजट में किसान हो या मध्यम वर्ग सबके लिए कुछ न कुछ ज़रूर है. बजट में अगर किसी के लिए नहीं है तो सिर्फ़ उद्योग जगत के लिए, जो अपने रफ्तार से चल रहा है. उनकी विकास दर अच्छी है.

इस बजट में उनके लिए कुछ नहीं है. जिसे हम बड़ा आदमी मानते हैं, जो मतदान नहीं करता. यह पूरी तरह से चुनावी बजट है. जो–जो वर्ग प्रभावी मतदान करता है उसे लुभाने के लिए पूरा प्रयास किया गया है.

चुनाव अब जल्दी होंगे. यह भी लग रहा है कि सरकार अब परमाणु क़रार पर भी पहल करेगी जिसके बाद चुनाव का मंच तैयार हो जाएगा.

यूपीए सरकार ने एनडीए सरकार से यह सीख़ ली है कि अर्थव्यवस्था कितनी भी तेज़ क्यों न हो, विकास की रफ्तार चाहे कितनी भी हो, जिस तरह एनडीए सरकार ने इंडिय़ा शाइनिंग की मुहिम चलाकर मुंह की खाई थी, उससे इस सरकार ने यह सबक लिया है कि जब तक लोगों में यह संदेश नहीं जाएगा कि आम लोगों, गरीबों और किसानों के लिए सरकार अच्छा काम कर रही है, तब तक चुनाव नहीं जीता जा सकता.

कितना हाथ गरीबों के साथ..?

चार साल तक तो सरकार ने अपनी आर्थिक नीतियों में अमीरों और उद्योगपतियों की बात की, लेकिन चुनावी वर्ष में वह उहापोह में नहीं पड़ना चहती.

सरकार ने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि वह आम आदमी, ग़रीब और किसान के साथ गंभीरता से खड़ी है. ताज़ा बजट उसी को लुभाने का प्रयास है.

वित्तमंत्री पी. चिदंबरम (फ़ाइल फ़ोटो)
सरकार ने बजट में यह दिखाने की कोशिश की है कि वह अम अदमी के साथ मज़बूती से खड़ी है

मोटे तौर पर देखें तो पिछले 25 वर्ष में देश ऐसा कोई चुनाव नहीं हुआ है, जिसमें पुरानी सरकार वापस आई हो. चुनावों में एंटी इंकंबेंसी का पलड़ा हमेशा भारी रहा है, इसके बावजूद सरकारें चुनाव से पहले लोकप्रिय फ़ैसले लेने की कोशिश करती रही हैं. इस बार भी यही कोशिश की गई है.

यह कतई ज़रूरी नहीं है कि पिछला रिकॉर्ड दोहराया जाए. कोशिश नहीं करने से तो ऐसी कोशिश करना सरकार को कहीं बेहतर स्थिति में ले जाएगा.

सरकार की इस कवायद का कितना असर पड़ेगा इसका अभी आकलन नहीं किया जा सकता. लेकिन सरकार ने कोशिश ज़बरदस्त की है. सरकार की कोशिश है कि वह आम आदमी की सरकार दिखे न कि उद्योगपतियों की.

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