BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 06:31 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
उपेक्षा से बीमार होतीं स्वास्थ्य सेवाएं

अस्पताल के बाहर रोगी
स्वास्थ्य सेवाओं में कटौती से अस्पतालों पर दबाव लगातार बढ़ा है
अपना वार्षिक बजट पेश करते समय हर वित्त मंत्री की तरह पी चिदंबरम भी नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता को दुहराएंगे.

लेकिन सच यह है कि प्रत्येक भारतीय पर स्वास्थ्य के क्षेत्र में ख़र्च होने वाले सालाना 23 अमरीकी डॉलर या 1050 रुपए में से भारत सरकार की हिस्सेदारी महज 184 रुपए है.

देश में फिलहाल कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का एक प्रतिशत से भी कम सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकार ख़र्च करती है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञ अजय खरे कहते हैं,''बजट के मामले में सरकारें जनता को गुमराह कर रही हैं. अक्सर केंद्र की ओर से राज्यों को आवंटित किए गए धन को ही राज्य सरकारें अपने बजट में ख़र्च की जाने वाली राशि के रूप में दिखा रही हैं.''

स्वास्थ्य राजनीतिक मुद्दा नहीं

विकास संवाद के सचिन जैन मानते हैं,''इसका कारण है स्वास्थ्य सेवाओं का कभी राजनीतिक मुद्दा न बन पाना. इसके नाम पर न कभी वोट माँगे गए और न ही कभी दिए गए.''

सेवाएं प्राप्त करने के एवज में भुगतान करने की सरकार की नई नीति ने कमज़ोर वर्गों के लिए नई दिक्कतें पैदा कर दी हैं. ग़रीब तबके के मरीज़ भी सरकारी अस्पतालों में सेवा से वंचित रह जाते हैं. अक्सर उन्हें इलाज के लिए कर्ज़ लेना पड़ता है.

जन स्वास्थ्य अभियान नामक संस्था के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में कर्ज़ का प्रमुख कारण इलाज के लिए लिया गया कर्ज़ है.

ग्रामवासियों के बीमारी के दौरान कर्ज़ में डूब जाने की एक वजह यह भी है कि उन्हें इलाज के लिए ज्यादातर शहरी इलाक़ों में जाना पड़ता है.

भारत का प्राण गाँवों में है- जैसे तमाम नारों के बावजूद देश की स्वास्थ्य सेवाओं का 75 फ़ीसदी मूलभूत ढाँचा शहरी इलाकों में सीमित है, जहाँ अभी भी भारत की सिर्फ़ 30 प्रतिशत आबादी ही रहती है.

90 के दशक में वैश्वीकरण की शुरुआत के बाद एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं में जहाँ भारी कटौती हुई है वहीं इस क्षेत्र में नई चुनौतियाँ सामने आई है.

भारत में इस समय सबसे ज्यादा एचआईवी पॉजीटिव रोगी हैं. कैंसर और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों से ग्रसित होनेवाले मरीज़ों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और कम आमदनी वाला तबका भी इनकी चपेट में है.

जबकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि देश की 83 प्रतिशत जनता को आर्थिक सुधारों का फायदा नहीं पहुँचा है.

समस्याएं

ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन और नगरीय इलाक़ों में झुग्गी बस्तियों की बसाहट एक नई समस्या बनकर उभर रही है. इनके लिए सरकार की कोई स्वास्थ्य नीति नहीं है.

पुरानी चुनौतियाँ- कुपोषण, प्रसव के दौरान गर्भवती महिलाओं की मृत्यु जिसकी संख्या सालाना एक लाख 37 हज़ार है, देश में पैदा होनेवाले हर हज़ार बच्चों में 60 की मौत, पौष्टिक भोजन और पीने के साफ पानी की कमी अभी भी वैसे ही मुँह बाए खड़ी हैं.

सरकार ने आज़ादी के बाद 'सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं' की नीति से हटकर विशेष वर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की प्रक्रिया शुरू की है जिससे नई दिक्कतें सामने आ रही हैं.

यह सुविधाएं अक्सर ग़रीबी रेखा से नीचे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोंगों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं.

सब्सिडी कम करने के लिए शासन ने ग़रीबी रेखा ऐसे पैमाने तय कर दिए हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी मुंबई की धारावी में ग़रीबी रेखा से संबंधित केवल 30 कार्ड हैं.

विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इन नीतियों का नतीज़ा होगा कि देश में ऐसे लोगों का एक बड़ा वर्ग होगा जो अस्वस्थ और रोग ग्रसित होगा. स्वस्थ लोगों का तबका छोटा होगा. इसका असर लंबे समय में भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास पर भी पड़ेगा.

इससे जुड़ी ख़बरें
बजट सत्र पर महँगाई, चुनाव की छाया
22 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
रेल और आम बजट पेश करने की तैयारी
04 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस
बजट: विकास पर नज़र, नए कर नहीं
28 फ़रवरी, 2006 | कारोबार
कैसे तैयार होता है आम बजट
28 फ़रवरी, 2006 | कारोबार
बजट की मुख्य बातों पर एक नज़र
28 फ़रवरी, 2006 | कारोबार
'रचनात्मकता से शून्य बजट'
28 फ़रवरी, 2006 | कारोबार
'चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे...'
25 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>