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विदेश में पैर जमाती भारतीय कंपनियाँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टाटा, यूबी समूह, जिंदल स्टील और रैनबैक्सी ये सभी ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने पिछले कुछ समय में विदेशों की कंपनियों का अधिग्रहण किया है और अपना व्यापार बढ़ाया है. टाटा समूह ने अब तक का अपना सबसे बड़ा अधिग्रहण किया ब्रिटिश डच कंपनी कोरस स्टील को खरीद कर जिसके साथ ही टाटा दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन गई है. इससे पहले डॉक्टर रेड्डी की फॉर्मास्युटिकल कंपनी ने जर्मनी के बीटाफॉर्म को 570 मिलियन पाउंड में खरीदा था जबकि एक अन्य कंपनी सुजलॉन ने बेल्जियम की फर्म इव होल्डिंग का अधिग्रहण क़रीब 526 मिलियन डॉलर में किया था. कोरस के अलावा पिछले एक साल में टाटा समूह ने कई अन्य क्षेत्रों में निवेश किया है और समूह में अब 90 से अधिक कंपनियां हैं. भविष्य तो क्या अब भविष्य भारतीय कंपनियों का या ये कहें कि विकासशील देशों की उभरती हुई कंपनियों का है. संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) की मानें तो हाँ. अंकटाड की हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भविष्य में तेज़ी से भारतीय कंपनियां यूरोप और अमरीका में अधिग्रहण करने वाली हैं. साथ ही रुस और चीन जैसे देश भी आने वाले दिनों में यूरोप में अपनी पैठ बनाने वाले हैं. लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि भारतीय कंपनियों ने जमकर खरीदारी करनी शुरु की है. आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक की मानें तो ये कंपनियां डर के कारण साहस कर रही हैं रिस्क लेने का. पुराणिक समझाते हैं, “ वैश्वीकरण के दौर में अगर कंपनियां खुद को नहीं बढ़ाएंगी तो यूरोपीय कंपनियां उनका अधिग्रहण कर सकती हैं तो ऐसे में कंपनियां डरी हैं तो साहस कर रही हैं विदेशों में खुद को बढ़ाने का. ” सही निर्णय लेकिन क्या यूरोप में कंपनियां खरीदना भारतीय कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है. अंकटाड की भारतीय प्रतिनिधि वीणा झा कहती है कि ये बेहतरीन बिजनेस सेंस है.
वे कहती हैं, "ये बहुत ही सकारात्मक पहल है. पहले सिर्फ सेवा के क्षेत्र में भारत का नाम था क्योंकि यहां सस्ता श्रम उपलब्ध है.लेकिन अब स्टील और अन्य क्षेत्र उद्योग के हैं जहां उन्हें यूरोप का बाज़ार, उनकी मार्केटिंग और वहां की कुशल कार्यक्षमता मिलेगी तो उनका व्यापार बढ़ेगा." स्टील के क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों में कई महत्वपूर्ण अधिग्रहण हुए हैं. भारत के जाने माने स्टील व्यापारी नवीन ज़िंदल की कंपनी ने इंडोनेशिया की स्टील कंपनी मैसपियॉन स्टील को खरीदा था. अब इस हफ्ते ख़बर है कि ज़िदल स्टील थाईलैंड की कंपनी थाईनॉक्स को ख़रीदने के कगार पर है. लेकिन क्या इतना आसान है कंपनियां खरीद कर उसे फायदे में ले जाना वो भी स्टील के क्षेत्र में. स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के पूर्व प्रबंध निदेशक अरविंद पांडे कहते हैं कि स्थिति अच्छी है अगले कुछ वर्षों के लिए. जोखिम उल्लेखनीय है कि इस समय चीन स्टील का सबसे बड़ा आयात करने वाला देश है लेकिन 2008 के बाद जब देश में निर्माण कार्य रुक जाएगा तो फिर क्या होगा. पांडे कहते हैं, "पहली नज़र में ऐसा लगता नहीं है क्योंकि आने वाले दिनों में स्टील की मांग में कमी आने वाली है. चीन नहीं तो भारत बड़ा बाज़ार बन सकता है. अमरीका अच्छा बाज़ार हो सकता है और कई देश हैं जहां स्टील की मांग बढ़ सकती है." अरविंद पांडे भले ही आशान्वित दिखते हैं लेकिन कई और विश्लेषक ऐसा नहीं मानते. जानी-मानी निवेशकर्ता संस्था मेरिल लिंच की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि टाटा स्टील को यह सौदा महँगा पड़ सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें टाटा कर सकता है कोरस का अधिग्रहण09 अक्तूबर, 2006 | कारोबार मित्तल स्टील आरोपों के घेरे में03 अक्तूबर, 2006 | कारोबार क़ानूनी क़दम उठा सकती है रूसी कंपनी26 जून, 2006 | कारोबार उड़ीसा में स्टील फ़ैक्ट्रियों पर बवाल26 फ़रवरी, 2006 | कारोबार कठिन है डगर औद्योगिक विकास की05 नवंबर, 2005 | कारोबार झारखंड के लिए मित्तल की बड़ी परियोजना08 अक्तूबर, 2005 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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