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भारत लुभा रहा है विदेशी पेशेवरों को | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक दौर था जब भारतीय कंपनियाँ पश्चिमी देशों के पेशेवर तबके को मोटी तनख्वाहों पर नौकरियाँ देने के योग्य नहीं मानी जाती थी. लेकिन आज लगभग हर क्षेत्र में पश्चिमी देशों के पेशेवर काम करते दिख जाएँगे. इसकी शुरूआत पाँच साल पहले केवल बड़े पदों से हुई थी. अब आईटी कंपनी इंफोसिस ने मैनेजमेंट ट्रेनी के स्तर पर भी पश्चिमी देशों के इन पेशेवरों को नौकरियाँ देना शुरू कर दिया है. बंगलौर स्थित इंफोसिस के दो प्रशिक्षण केंद्रों में अमरीका के प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों से चुने गए 126 लड़के लड़कियाँ मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में काम कर रहे हैं. उनकी ट्रेनिंग ख़त्म होने के बाद वो इंफोसिस के लिए औपचारिक रूप से काम करना शुरू कर देंगे. बदलाव जॉन अल्मेड़ा ने ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है. वो कहते हैं कि भारत में तेजी से बदलाव आ रहा है, “अमरीका में लोगों ने देखा है कि भारत कितनी तेजी से तरक्की कर रहा है. इसलिए हम भी इस बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं, मेरे ख्याल में इससे पहले ऐसा नहीं होता था.” आमतौर पर भारतीय विदेशों में जाकर काम करने के लिए बेचैन रहते हैं. लेकिन शायद अब गंगा उल्टी बह रही है. इस समय एक अनुमान के मुताबिक 50 हज़ार से ज़्यादा पश्चिमी देशों के पेशेवर भारतीय कंपनियों के लिए भारत में आकर काम कर रहे हैं. इनमें 350 विदेशी पायलट हैं जो भारतीय एअरलाइनों के लिए काम कर रहे हैं.
दिलचस्प बात ये है कि इनमें से अधिकतर लोगों ने भारतीय कंपनियों में काम करने से पहले इनका नाम भी नहीं सुना था. जॉन अल्मेड़ा और उनके दूसरे अमरीकी सहयोगी स्वीकार करते हैं कि इंफोसिस में आना और भारत में काम करना उनके लिए काफ़ी कठिन था. नॉर्थ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी की उनकी साथी अलेक्सस ह्यूज बताती हैं कि उन्होंने इंफोसिस में आने से पहले कंपनी के बारे में काफ़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश की, “भारत आने को लेकर मैं काफ़ी उत्साहित थी. मैं एक ऐसी कंपनी में काम करना चाहती थी जिसमें काम का माहौल कॉरपोरेट अमरीका से अलग हो.” इंफोसिस इंफोसिस के मानव संसाधन (विभाग) के प्रमुख मोहन दास पई का कहना है,“हम एक भारतीय कंपनी है, लेकिन हमारा 98 फ़ीसदी कारोबार विदेशों से होता है. हमारी कोशिश ये हैं कि जिन देशों में हमारा काम होता है वहां के लोगों को काम में शामिल किया जाए.” साल के अंत तक इंफोसिस में भारत में काम करने वाले अमरीकियों की संख्या 300 से ऊपर हो जाएगी और अगले साल ब्रिटेन के लोगों को भी भारत में नौकरियाँ दी जाएँगी. आईटी क्षेत्र के अलावा भारत के बड़े शहरों में स्थित कॉल सेंटरों में भी अंग्रेज़ी बोलने वाले उन युवकों को रोज़गार दे रहे हैं जो पश्चिमी देशों से कुछ महीनों के लिए भारत की सैर करने आते हैं. इन विदेशी पेशेवर लोगों का कहना है कि तनख्वाह और काम करने का अंदाज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर का होना ही उनका मुख्य आकर्षण है. लेकिन अब सवाल ये है कि क्या इन पश्चिमी देशों से आए इस पेशेवर तबके की वजह से भारतीय पेशेवर तबके को ख़तरा है. बंगलौर में काम करने वाले ए कृष्णामाचारी कहते हैं, ‘‘नहीं, इनके आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जो भारतीय कंपनियों और कामगारों के लिए अच्छी बात है.” इंफोसिस के श्रीचई इस विचार से पूरी तरह सहमत हैं. उनका कहना है कि ये भारत के लिए गर्व की बात है, “मेरे ख्याल से ये रूझान सा बनता जा रहा है. हम आए दिन सुनते रहते हैं कि भारतीय कंपनियाँ विदेश जाकर वहाँ के लोगों को भारत और विदेश दोनों में नौकरियाँ देती हैं.” | इससे जुड़ी ख़बरें प्रतिभा पलायन का रुख़ पलटा29 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस इन्फ़ोसिस के लाभ में भारी वृद्धि 14 अप्रैल, 2006 | कारोबार टाइम टॉप 100 में दो भारतीय 01 मई, 2006 | पहला पन्ना आईटी कंपनियों का चहेता है बंगलौर15 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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