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क्या है सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने वर्ष 2003-04 की आर्थिक समीक्षा में विकास दर सात से आठ फ़ीसदी तक रखने का लक्ष्य रखा है. यह भी अनुमान लगाया गया है कि मुद्रा स्फ़ीति की दर पाँच फ़ीसदी रहेगी. आर्थिक समीक्षा में राज्य सरकारों के बजट घाटे को लेकर चिंता व्यक्त की गई है और उसे वर्तमान स्तर यानी सकल घरेलू उत्पाद के 10 फ़ीसदी तक घटाने के लिए क़दम गिनाए गए हैं. अर्थव्यवस्था के ढाँचे को और मज़बूत बनाने के लिए ज़्यादा निवेश को आकर्षित करने की बात कही गई है. 1998 से कृषि क्षेत्र की दशा को लेकर बड़ी चिंताएँ रही हैं. किंतु पिछले साल अच्छी बारिश के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर आठ प्रतिशत तक रही थी. हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश के घटे स्तर पर चिंता भी व्यक्त की गई है और ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत ढाँचे, सिंचाई और कृषि विकास में ज़्यादा निवेश को प्राथमिकता बताया गया है. उद्योग जगत में 10 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य रखा गया है और सरकार का मानना है कि यह अर्थव्यवस्था में विकास के लिए ही नहीं बल्कि रोज़गार बढ़ाने के लिए भी ज़रूरी है. देश में श्रमिकों की संख्या हर वर्ष दो प्रतिशत बढ़ जाती है. बजट घाटा आर्थिक सर्वेक्षण में विदेशी मुद्रा का स्तर लगभग 119 अरब डॉलर बताया गया है. आर्थिक सर्वेक्षण में बजट घाटे को कम करने के लिए सरकार द्वारा जमा किए जाने वाले करों में वृद्धि कैसे हो, इस पर काफ़ी चर्चा की गई है. कर न देने वालों के प्रति सख़्त रवैए का ज़िक्र है और कर छूट देने के ख़िलाफ़ सरकार ने अपना रुख़ स्पष्ट किया है. संयुक्त प्रगतिशील मोर्चे के साझा कार्यक्रम में सरकार द्वारा निवेश, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में ख़र्च में बढ़ोत्तरी और बजट घाटा कम करने को प्राथमिकता दी गई है. अगर सत्ताधारी गठबंधन को यह लक्ष्य हासिल करना है तो ज़्यादा कर जमा करना होगा या फिर राजस्व जमा करने के लिए नए तरीक़े ढूँढ़ने होंगे. |
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