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भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की प्रमुख व्यापार संस्था भारतीय व्यापार संघ ने अच्छे मानसून और फ़सल के बाद 2003 के आर्थिक प्रगति के अपने अनुमान को और बढ़ा दिया है. भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई ने कहा कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था में 7.2 प्रतिशत की दर से विकास होगा. जबकि इसके पहले सीआईआई ने विकास की दर 6.5 से 6.8 प्रतिशत के बीच बताई थी. सीआईआई का कहना है कि अच्छे मॉनसून के कारण अच्छी फ़सल हुई और इसका अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पड़ा है. पिछले साल सूखे के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर अनुमान से एक प्रतिशत कम रही थी. सीआईआई के अलावा भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी विकास दर के 6.5 से 7 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया है. सीआईआई ने सरकार से आर्थिक सुधार जारी रखने और ढांचागत क्षेत्र में निवेश कार्यक्रम को जारी रखने का अनुरोध किया है ताकि विकास दर को बनाया रखा जा सके. पिछले दो वर्षों से भारत की विकास दर पाँच प्रतिशत चल रही थी. 1991 के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के बाद से भारत एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर कर सामने आ रहा है. मॉनसून का असर मॉनसून ने अर्थव्यवस्था की हरियाली एक बार फिर लौटने की उम्मीद जगी है. अर्थशास्त्रियों का भी मानना है कि बेहतर मॉनसून के कारण पूरी अर्थव्यवस्था तरक़्क़ी के रास्ते पर चल सकती है. मॉनसून भारतीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा मानी जाती है क्योंकि पूरी आबादी में दो तिहाई लोगों को कृषि से ही रोज़गार मिलता है. हाल के वर्षों में कृषि और उपभोक्ता माँग के बीच समीकरण में असाधारण बदलाव आए हैं. पहले ख़राब फसल का कृषि क्षेत्र पर ही प्रभाव पड़ा करता था, लेकिन अब इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है क्योंकि ग्रामीण उपभोक्ता बाज़ार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. ऐसे भी अध्ययन हुए हैं जिनके अनुसार रोज़मर्रा की उपभोक्ता सामग्री की 60 प्रतिशत माँग ग्रामीण क्षेत्रों से आती है. |
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