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उत्तरकाशी: 'टनल में फंसे मजदूरों का हौसला धीरे-धीरे टूट रहा है...'
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उत्तरकाशी से
उत्तरकाशी के सिलक्यारा गांव में निर्माणाधीन सुरंग में फंसे क़रीब 40 मज़दूरों को निकालने के काम फिलहाल ठप सा पड़ गया है जिससे अंदर फंसे मज़दूरों के परिजनों के बीच मायूसी की एक लहर दौड़ गई है.
अंदर फंसे मज़दूरों को निकलने के काम में रुकावट आई है और फिलहाल काम रुका हुआ है.
दिल्ली से लाई गई ऑगर मशीन ने शुक्रवार शाम से काम करना बंद कर दिया है.
इंदौर से एक नई मशीन लाई गई है जिसे अब सुरंग के 200 मीटर अंदर ले जाया जा रहा है ताकि रुके हुए काम को आगे बढ़ाया जा सके.
अब तक टनल के अंदर 70 मीटर में फैले मलबे में 24 मीटर छेद किया जा चुका है. लेकिन अधिकारी अब दूसरे विकल्प खोजने की भी कोशिश कर रहे हैं.
अब पहाड़ के ऊपर से होगी खुदाई
अब तक टनल में हॉरिजॉन्टली यानी सामने से ड्रिल कर मलबा हटाया जा रहा था, लेकिन अब वर्टिकली भी ड्रिलिंग का सहारा भी लिया जा रहा है.
अधिकारियों का कहना है कि पहाड़ के ऊपर से पेड़ों को हटाकर ड्रिलिंग मशीन रखी जा रही है.
उन्होंने बताया कि नई मशीन के शुरू होने के बाद टनल में सामने से मलबे को हटाने के लिए जो ड्रिलिंग की जा रही है, वह भी शुरू हो जाएगी.
मलबे में सामने से छेद करने के तीन प्रयास अब तक फेल हो चुके हैं. अब अधिकारियों का कहना है कि फंसे हुए मजदूरों को निकालने के लिए हॉरिजोंटल के साथ वर्टिकली ड्रिलिंग भी करनी होगी.
उन्होंने बताया कि अगर सब कुछ ठीक रहा, तो मजदूरों तक पहुंचने में चार से पांच दिन लग सकते हैं.
पीएमओ से भेजी गई टीम
प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजे गए विशेषज्ञों और सलाहकारों की टीम ने शनिवार को टनल के ऊपर पहाड़ का जायज़ा लिया.
उन्होंने बाद में पत्रकारों से कहा कि वो पहाड़ के ऊपर से सीधे नीचे टनल में छेद करने के विकल्प पर चर्चा कर रहे हैं. उन्होंने पहाड़ पर चार पॉइंट्स की शिनाख्त कर ली है जहाँ से छेद किया जा सकता है.
इस पर उनकी बैठक जारी है. पहाड़ के ऊपर से सीधे नीचे छेद करने के लिए 103 मीटर छेद करना पड़ेगा और ये एक जोख़िम भरा काम होगा
टनल के अंदर फंसे मज़दूरों के परिजन और उनके साथ काम करने वाले मज़दूर काफ़ी नाराज़ नज़र आ रहे थे.
कल तक उनमे से कई अपनी कंपनी के डर के कारण पत्रकारों से बात करने से कतरा रहे थे लेकिन शनिवार को उनके सब्र का पैमाना छलकता दिखाई दिया.
'हौसला धीरे-धीरे टूट रहा है...'
मृत्युंजय कुमार प्रोजेक्ट में एक लोडर और ऑपरेटर का काम करते हैं.
उन्होंने कहा, "हम लोग भी अंदर फंसे मज़दूरों को समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन अब सात दिन हो गए और अब उनका मनोबल टूट रहा है. वो कह रहे हैं कि सूखा खाना खाकर कितने दिन जिएंगे. वो हम से पूछ रहे हैं कि हम लोग उन्हें निकलने का काम कर रहे हैं या उन्हें झूठा दिलासा दे रहे हैं. वो स्वस्थ हैं लेकिन अब उनका हौसला धीरे-धीरे टूट रहा है."
टनल के अंदर मज़दूरों को एक पाइप के ज़रिये ऑक्सीजन दिया जा रहा है. उसी पाइप से पानी के बॉटल भेजे जा रहे हैं और सूखा पैकेट वाला खाना भेजा जा रहा है. और समय-समय पर जिन मज़दूरों को दवाइयों की ज़रूरत है तो उन्हें वो भी भेजी जा रही हैं. और इसी पाइप से दोनों तरफ से बात भी होती है.
विक्रम सिंह उत्तराखंड के चंपाउर ज़िले से आए हैं. उनका 24 साल का छोटा भाई टनल के अंदर फंसा हुआ है.
उन्होंने शुक्रवार को पाइप के ज़रिये अपने भाई से बात की. उन्होंने कहा, "आवाज़ धीमी आ रही थी. उसने कहा कि वो ठीक है लेकिन वो नर्वस था."
'रहने का कोई ठिकाना नहीं...'
सुरंग के अंदर फंसे मज़दूरों के परिजन बार-बार हम से ये शिकायत कर रहे थे कि प्रशासन या सुरंग बनाने वाली कंपनी ने उनके ठहरने और खाने का कोई इंतेज़ाम नहीं किया है.
परिवार वालों को गांव में होटलों की कमी के कारण रहने में और खाने में दिक़्क़तें आ रही हैं.
चंचल सिंह बिष्ट ने कहा कि वो 600 किलोमीटर का सफर तय करके आए हैं लेकिन अब तक उनके रहने का कोई ठिकाना नहीं है.
उनका कहना था कि रिश्तेदारों को पूछने वाला कोई नहीं है, अधिकारियों ने "हमें पूरी तरह से नज़र अंदाज़ कर दिया है."
शुक्रवार की शाम दिल्ली से तीन दिन पहले मंगाई गई मशीन ने काम करना बंद कर दिया जिसके कारण काम रुका हुआ है.
सुरंग में ड्रिलिंग
इस मशीन को लगभग 70 मीटर में फैले मलबे में ड्रिल करके 900 मिलीलीटर पाइप फिट करना है और इसी पाइप से फंसे मज़दूरों को बाहर निकलना है. अब तक 24 मीटर तक ही ड्रिलिंग हुई है.
रेस्क्यू टीम के एक अधिकारी ने शनिवार शाम एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये स्वीकार किया था कि सुरंग में ड्रिलिंग से ऊपर से धूल और मलबे गिर रहे हैं.
सरकार की हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी एनएचआईडीसीएल (एनएचआईडीसीएल) ने कहा कि अंदर कुछ धमाके जैसी आवाज़ आयी जिसके कारण ड्रिल करने वाले मज़दूर बहार निकल गए.
एनएचआईडीसीएल ने एक बयान जारी कर कहा कि "सुरंग के और धंसने की आशंका के चलते फिलहाल बचाव अभियान रोक दिया गया है."
रविवार को एक निर्माणाधीन सड़क के लिए बन रही सुरंग का एक हिस्सा गिर गया था जिससे क़रीब 40 मज़दूर उसमें फंस गए. तब से सुरंग का मलबा निकालने का काम किया जा रहा है.
दूसरे विकल्पों की तलाश
पहले दो प्रयास विफल रहे और अब तीसरा भी कामयाब होता नज़र नहीं आ रहा है. इसलिए अब अधिकारी दूसरे विकल्प भी तलाश रहे हैं और इसपर चर्चा हो रही है.
सुरंग के अंदर फंसे मज़दूर और बाहर बैठे मज़दूर जिनसे हमने बात की वो सब सुरंग और हाईवे को बनाने वाली कंपनी, नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (एनइसीएल) के लिए काम करते हैं.
सुरंग बनाने वाली कंपनी नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (एनइसीएल) के दो सुपरवाइज़रों ने हमें बताया कि इस टनल पर काम 2018 में शुरू हुआ था.
उनमें से एक ने कहा, "सुरंग में काम होने से थोड़ा पहले एक लैंडस्लाइड (भूस्खलन) में उसी जगह पर नुकसान हुआ था जहाँ रविवार को भूस्खलन के कारण टनल का एक हिस्सा ढह गया. तब इसे बनाने में छह महीने लगे थे. लेकिन शायद इसे मज़बूती से नहीं बनाया गया."
चारधाम परियोजना
हमने इसकी पुष्टि कंपनी के साइट ऑफ़िस के अधिकारियों से करने की कोशिश की लेकिन उनके अनुसार वो मीडिया से बात नहीं करते.
निर्माणाधीन सुरंग महत्वाकांक्षी चारधाम परियोजना का हिस्सा है, जो हिंदुओं के तीर्थस्थल बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री तक कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा पहल का हिस्सा है.
ये एक विवादित प्रोजेक्ट है और पर्यावरण के विशषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना से अचानक बाढ़ और भूस्खलन की आशंका बढ़ गई है जो पहले से ही यहां एक बड़ी समस्या है.
ये हादसा रविवार की सुबह दिवाली के दिन हुआ. शुक्रवार को मज़ूदरों को टनल से बाहर निकालने के ऑपरेशन का छठा दिन था.
पहले चार दिनों की कोशिशें नाकाम रहीं क्योंकि मलबे के ढेर को हटाने में वहां इस्तेमाल की जाने वाली मशीनें मलबा नहीं निकाल सकीं.
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