सोशल मीडिया के ज़रिए कमाई को लेकर कितने गंभीर हैं लोग

    • Author, पायल भुयन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

फोन हाथ में लेते ही लोग अमूमन ख़बरें पढ़ने के साथ ही सोशल मीडिया पर वीडियो देखना शुरू कर देते हैं. इसके बाद कब कुछ मिनट घंटों में तब्दील हो जाते हैं, पता ही नहीं लगता.

इन वीडियोज़ को कंटेट क्रिएटर्स बनाते हैं जिनकी इन दिनों सोशल मीडिया पर धूम मची हुई है.

ये कंटेंट क्रिएटर्स इन्फ़्लूएंसर्स के तौर पर अपना बिज़नेस भी चला रहे हैं. लेकिन फिर भी इसे एक 'असली नौकरी' के तौर पर नहीं देखा जाता है.

ये समझने के लिए आइए पहले जानते हैं कि एक सोशल मीडिया इन्फ़्लूएंसर के अनुभव -

''मेरा दिन घर के काम से शुरू होता है. बेटी को स्कूल भेजने के बाद मैं खुद को थोड़ा समय देती हूं. इसके बाद 11 बजे से मैं अपना प्रोफ़ेशनल काम शुरू करती हूं. सबसे पहले एक टीम मीटिंग होती है जिसमें हम आगे की रणनीति पर ब्रेन स्ट्रॉमिंग यानी गहन चर्चा करते हैं. इस मीटिंग में फ़ाइनैन्स से लेकर वीडियो टीम सब शामिल होती है. सुबह का समय हमारे लिए अपने काम और आगे की प्लानिंग के लिए होता है.''

''मैं एक हफ़्ते में अमूमन 35 से 40 घंटे काम करती हूं. आप जो वीडियो स्क्रीन पर देखते हैं, वो होता तो एक-दो मिनट का है. लेकिन उसे बनाने में कई लोगों की मेहनत और घंटो लगते हैं. शुक्र है कि अब तो मेरे पास एक टीम है जो काम करती है, लेकिन शुरुआत में तो मैं सब अकेले करती थी.''

ये कहना है फ़राह शेख़ का.

लेकिन नौकरी करने वाले किसी दूसरे शख़्स की तरह हफ़्ते में 35-40 घंटे काम करने के बाद भी कंटेंट क्रिएशन को लोग असली काम या किसी नौकरी की तरह नहीं देखते हैं.

ऐसा क्यो हैं?

फ़राह शेख़ एक प्रोफ़ेशनल कंटेंट क्रिएटर है.

वो पिछले छह सालों से इस प्रोफ़ेशन के साथ जुड़ी हुई हैं.

लेकिन आज भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो करियर के इस विकल्प से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

सब पूछते हैं नौकरी क्या कर रहे हो?

कंटेंट क्रिएशन में आने से पहले फ़राह कॉर्पोरेट जगत में नौकरी करती थीं. उस समय वह कई ब्रैंड्स की डिजिटल माक्रेटिंग देखती थीं.

वह उस पल को याद करती हैं, जब उन्होंने कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में जाने से जुड़े अपने फ़ैसले से अपने परिवार को अवगत कराया था.

वह कहती हैं, ''मैं उन दिनों प्रेग्नेंट थी. मैंने अपने माता-पिता से कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में जाने की इच्छा ज़ाहिर की. उन्हें लगा कि चलो ठीक है, ये करेगी और फिर इसे उसमें मजा नहीं आया तो बोर होकर कुछ और करने लगेगी. ''

वो कहती हैं कि 'घरवाले ही नहीं बल्कि आस पास के लोग भी इसे हॉबी की तरह देखते थे. लोग भी पूछते थे, ''अच्छा आप ये कर तो रहे हो लेकिन असल में क्या कर रहे हो?''

फ़राह बताती हैं, ''मैंने जब शुरुआत की थी तो लोगों ने ये नहीं सोचा था कि ये किसी का असली काम भी हो सकता है. लोग ये सोचते थे, अच्छा – इससे भी कमाई होती है. जब टिक-टॉक था तब लोग सोचते थे अरे यार! क्या डांस कर-कर के पैसे कमा रहे हो.''

लेकिन जानकारों का मानना है कि अब लोगों की मानसिकता बदल रही है और वे इसे एक प्रोफेशन के तौर पर देखने लगे हैं.

फ़राह की ही बात की जाए उनके पास इस समय कई ब्रैंड्स हैं जिनके लिए वे विज्ञापन बनाती हैं.

उनके मुताबिक़ अब धीरे धीरे लोगों की सोच में बदलाव आ रहा है.

वह कहती हैं, 'पहले वो सोचते थे कि एक मिनट का वीडियो ही तो है, इसमें कौन सी बड़ी बात है. लेकिन अब लोग ये समझने लगे हैं कि इस काम में कितनी मेहनत लगती है.’’

एक लंबे समय तक अधिकांश लोग ये मानते थे कि इस काम को करने वालों में युवा महिलाओं की संख्या ज़्यादा है.

कुछ लोग इसे एक सम्मानित काम के रूप में भी नहीं देखते थे. लेकिन अब लोगों की राय के साथ-साथ इस पेशे में लगे लोगों के काम करने का ढंग बदल रहा है.

इन्फ़्लूएंसिंग का मार्केट बढ़ने की उम्मीद

इंफ़्लूएंसर्स डॉट इन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इन्फ़्लूएंसिंग का मार्केट अगले पांच सालों में 25 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है.

साल 2025 तक इसके 2,200 करोड़ का मार्केट होने की उम्मीद है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि 62.2 प्रतिशत ब्रैंड्स इन्फ़्लूएंसर मार्केटिंग की ताक़त में यक़ीन करते हैं.

इन ब्रैंड्स को इस बात का इल्म है कि इन्फ़्लूएंसर्स नए ग्राहक लाने का एक अहम ज़रिया हैं.

बड़ी कंपनियों के लिए ये मार्केट उनकी डिजिटल मार्केटिंग रणनीति का अहम हिस्सा है, वहीं छोटी संस्थाएं भी इंफ़्लूएंसर्स की अहमियत समझती हैं लेकिन वो फ़िलहाल मार्केटिंग के इस पहलू पर उतना निवेश नहीं कर रही हैं.

फ़राह कहती हैं, ''सिर्फ़ लोगों के नज़रिए में ही बदलाव नहीं आया है, बल्कि ब्रैंड्स भी काफ़ी प्रोफ़ेशनल हो गए हैं. ब्रैंड्स भी मार्केटिंग की इस स्ट्रेटजी पर अच्छी राय देने लगे हैं. वैसे भी मार्केटिंग के पुराने माध्यमों की तुलना में इन्फ़्लूएंसर मार्केटिंग काफ़ी सस्ती हैं और ब्रैंड्स की बिक्री भी अच्छी हो रही है.''

क्या यह एक करियर विकल्प है?

डिजिटल स्ट्रेटजिस्ट और लाइफ़ कोच देबारति रिया चक्रबर्ती मानती हैं कि इस बिज़नेस का लैडस्केप पूरी तरह बदल गया है.

वह कहती हैं, "सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आने के बाद कंटेंट क्रिएटर्स के पास कंटेंट बनाने की आज़ादी है. लोग भी इन इंफ़्लूएंसर्स के साथ काफ़ी जुड़ाव महसूस करते हैं."

इसके साथ ही वह मानती हैं कि 'अब इन्फ़्लूएंसर एजेंसियां भी बेहतर हो रही हैं. पहले ये सिर्फ़ ब्रैंड्स को क्रिएटर्स के साथ जोड़ने का काम करती थीं. लेकिन अब ये पूरी सर्विस दे रही हैं. और ब्रैंड्स एवं इन्फ़्लूएंसर्स के बीच अहम कड़ी बन गयी हैं.’

'द मोबाइल इंडिया’ के संपादक, फ़ाउंडर और डिजिटल मार्केटिंग एक्सपर्ट संदीप बुडकी मानते हैं कि फिलहाल इन्फ़्लूएंसर्स इस क्षेत्र को एक करियर के तौर पर देखने की जगह पेशेवर ढंग से देख रहे हैं

वह कहते हैं, ''इन दोनों तरीक़ों में फ़र्क बस इतना है कि अगर प्रोफ़ेशनल तरीक़े से देखा जाता है तो इंसान उसकी अच्छी चीज़ें, बुरी चीज़ें और उसे कैसे किया जाए आदि पर ध्यान देता है. वो सोचता है कि कोई ऐसी चीज़ करूं जिससे मेरा नाम भी न ख़राब हो और मैं लंबे समय तक कर सकूं. मुझे ये भाव इस करियर में थोड़ा सा मिसिंग नज़र आ रहा है.’’

इफ़्लूएंसर मार्केटिंग के फ़ायदे

ब्रैंड्स विभिन्न तरीकों से इन्फ़्लूएंसर मार्केटिंक का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

मसलन, फ़ैशन और ब्यूटी ब्रैंड्स फ़ैशन ब्लॉगर्स और इंफ़्लूएंसर्स के साथ साझेदारी कर रहे हैं.

वहीं, ट्रैवल ब्रैंड्स अपनी सेल्स बढ़ाने के लिए ट्रैवल ब्लॉगर्स के साथ साझेदारी कर रहे हैं तो खाने वाले ब्रैंड फ़ूड ब्लॉगर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

ब्रैंड्स के लिए इन्फ़्लूएंसर्स मार्केटिंग का एक फ़ायदा ये है कि वो एक ख़ास तरह के दर्शकों को टार्गेट कर सकते हैं.

ब्रैंड्स इन्फ़्लूएंसर्स उन क्रिएटर्स को चुन सकते हैं जो उन टारगेट ऑडियंस के लिए कंटेंट बनाते हैं.

देबारति रिया चक्रबर्ती कहती हैं, "कंटेंट क्रिएटर्स से विज्ञापन कराने की मार्केट में काफ़ी क्षमताएं हैं. ब्रैंड्स भी टीवी या अख़बार में विज्ञापन की बजाए इन्फ़्लूएंसर्स मार्केटिंग में भरोसा दिखा रही हैं. जब भी कोई कंपनी अपना विज्ञापन करवाने के लिए इन्फ़्लूएंसर्स एजेंसी से संपर्क करती है तो कंपनी पूछती है कि उस इन्फ़्लूएंसर की कितनी फॉलोइंग है.

फॉलोअर्स ऑर्गैनिक है या नहीं. उसने किन-किन ब्रैंड्स के साथ काम किया है. इस फ़ील्ड में 5 साल या उससे भी छोटी उम्र के बच्चों से लेकर 80 साल तक के लोग काम कर रहे हैं.’’

संदीप बुदकी कहते हैं, "मार्केटिंग जगत में हर दस साल में नया ट्रेंड आता है. पहले विज्ञापन टीवी या अख़बार में न आए तो विज्ञापन नहीं लगते थे. फिर विज्ञापन रेडियो में आने लगे और अब ख़ास टार्गेट ऑडियंस के लिए कंपनियां इन्फ़्लूएंसर्स का सहारा ले रही है.’’

"हर ब्रैंड की अपनी - अपनी कैटगरी है. कुछ इंफ्लूएंसर्स ऐसे हैं जिनके पांच या छह हज़ार फॉलोअर्स होते हैं तो उनसे भी काम चल जाता है और कुछ इंफ्लूएंसर्स ऐसे हैं जिनके मिलियन्स में फॉलोअर्स होते हैं. तो सब ब्रैंड और इंफ़्लूएंसर्स के टाई अप पर निर्भर करता है कि उसका टार्गेट ऑडियंस क्या है. ये पूरा खेल टार्गेट ऑडियंस का है.''

लेकिन संदीप ये भी कहते हैं, ''पुरानी पीढ़ी का सामान ख़रीदने का पैटर्न आज भी 'वर्ड ऑफ़ माउथ' और 'वैल्यू फॉर मनी' है और इसके पीछे का विश्लेषण ये लोग खुद करते हैं. वहीं, युवा ऑडियंस की सोच ये रहती है कि इस बंदे की फॉलोंइंग काफ़ी अच्छी है, इसने काफ़ी कुछ देखा होगा इसलिए मुझे बता रहा है.''

क्या सही किए जाने की ज़रूरत ?

इस उद्योग में क्या सुधार लाया जा सकता है, उस पर देबारती रिया चक्रबती कहती हैं कि अभी एक बड़े तबके को लगता है कि इन्फ़्लूएंसर्स का काम गंभीर काम नहीं है.

ये मीडियम बहुत कैजुअल है. इसलिए कई बार लोग ग़लत समझ लेते है.

कई चीज़े हैं इस इंडस्ट्री की, जिन्हें ठीक किए जाने की ज़रूरत है. जैसे कि यहां पर पेमेंट का कोई एक जैसा तरीक़ा नहीं है. इस गैप को एजेंसियां ठीक करने की कोशिश कर रही है.

फ़राह भी मानती हैं कि इस उद्योग में थोड़ी ‘अनसर्टेनिटी’ हैं, ''कई महीने होते हैं जब आप खूब काम कर रहे होते हैं. कई महीनों में उतना नहीं मिल पाता. लेकिन ऐसा बहुत सारे सेक्टर में होता है.''

लेकिन जिस प्रकार से इन्फ़्लूएंसिंग उद्योग में पिछले कुछ सालों में बूम आया है उसे देख फ़रहा कहती हैं, 'मैं भविष्य में अपना काम ज़रूर करना चाहूंगी, और मेरे लिए ये बात तो तय है कि जो भी करूंगी वो ऑनलाइन ही रहेगा.’

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