प्रचंड की टिप्पणी में भारत का ज़िक्र जिस रूप में हुआ, उससे नेपाल में बवाल
अशोक दाहाल
बीबीसी न्यूज़, नेपाली

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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड अपनी एक टिप्पणी के कारण विवादों में घिर गए हैं.
विपक्ष उनके इस्तीफ़े की मांग कर रहा है. प्रचंड ने हाल ही में बयान दिया कि नेपाल में रहने वाले एक भारतीय मूल के कारोबारी ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए भारत से बात की थी.
उनके इस बयान के बाद से नेपाल का समूचा विपक्ष भड़क गया है.
विपक्ष नेपाली प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर रहा है. विपक्ष का कहना है कि नई दिल्ली की ओर से नियुक्त किए गए प्रधानमंत्री के पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है.
उनके इस बयान को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने संसद को बाधित कर दिया है. सरकार में साझीदार नेपाली कांग्रेस के एक महामंत्री ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई है.
इन नेताओं ने बताया कि गुरुवार को सात सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की बैठक में भी प्रचंड के बयान पर चर्चा हुई.
सीपीएन-माओवादी के महासचिव देव गुरुंग ने कहा कि बैठक में यूएमएल ने उनके इस्तीफ़े की मांग की है.
विश्लेषक प्रचंड के बयान के बाद बदलते राजनीतिक घटनाक्रम को सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर पनप रहे मतभेदों के प्रभाव के रूप में भी देख रहे हैं.
नेपाल की आंतरिक राजनीति में बाहरी हस्तक्षेप से जुड़े इस बयान को लेकर सोशल मीडिया और टेलीविजन बहसों में भी प्रचंड की जमकर आलोचना हो रही है.
दूसरी ओर प्रधानमंत्री प्रचंड ने अपने बयान का बचाव किया है.
गुरुवार को प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार ने एक बयान जारी कर कहा कि राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री के बयान की ग़लत व्याख्या की जा रही है.
प्रधानमंत्री ने क्या कहा था?

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बीते सोमवार को कारोबारी प्रीतम सिंह पर लिखी किताब के विमोचन के मौक़े पर प्रचंड ने अपने प्रधानमंत्री बनाए जाने के लिए सिंह के प्रयासों की चर्चा की थी.
प्रचंड ने कहा था, “उन्होंने एक बार मुझे प्रधानमंत्री बनाने के लिए बहुत मेहनत की. वह कई बार दिल्ली गए और काठमांडू के कई पार्टी नेताओं से चर्चा की.''
विभिन्न मीडिया आउटलेट पर जारी एक वीडियो में प्रचंड को यह कहते हुए सुना जा सकता है.
उनके अनुसार, माओवादी नेता और पूर्व मंत्री पम्फा भुसाल से उनकी निकटता के कारण सिंह के साथ उनकी लगातार बातचीत थी और वे सहयोग कर रहे थे.
प्रचंड ने अपने परिवार को प्रीतम सिंह से मिले सहयोग की चर्चा भी की और कहा कि, "मेरा परिवार उनका सम्मान करता है क्योंकि उन्होंने मेरी सबसे बड़ी बेटी को तब बहुत सहयोग दिया जब उसे कैंसर का पता चला था."
माओवादी नेताओं की क्या है राय?

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नेपाल में सरकार बनाने और हटाने में पड़ोसी देशों के दखल की चर्चा के बीच प्रचंड के बयान से ऐसी आशंकाओं को बल मिला है.
नेपाली कांग्रेस के महासचिव विश्वप्रकाश शर्मा ने प्रचंड के बयान की आलोचना करते हुए कहा, "प्रधानमंत्री को यह अहसास नहीं रहा होगा कि उनके इस बयान के क्या मायने निकल सकते हैं. यह उनकी ग़लती है. नेपाल के प्रधानमंत्री का चुनाव नेपाल की जनता करती है.”
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के विदेशी मामलों के सलाहकार अरुण कुमार सुबेदी मानते हैं कि प्रचंड के बयान से उनके विरोधियों को मसाला मिल गया है. हालांकि सुबेदी ने ये भी कहा है कि इस वजह से प्रचंड की सरकार गिर जाएगी या गठबंधन टूट जाएगा, इसकी संभावना कम ही है.
नेपाली कांग्रेस के सहमहामंत्री महेंद्र यादव ने भी दावा किया कि प्रधानमंत्री के बयान से गठबंधन में कोई दिक्क़त नहीं आएगी. उन्होंने कहा, “यूएमएल को एक बहाना चाहिए लेकिन हम इस गठबंधन को तोड़ने के पक्ष में नहीं हैं. हमारे बीच बहुत अच्छे संबंध हैं.''
सीपीएन-माओवादी महासचिव देव गुरुंग प्रधानमंत्री आवास में हुई चर्चा का ज़िक्र करते हुए कहा, 'कांग्रेस नेताओं का आग्रह था कि प्रधानमंत्री के जवाब के बिना इस्तीफ़े की मांग संसदीय क़ानून और परंपरा के ख़िलाफ़ है.'
यूएमएल क्यों चाहता है प्रचंड का इस्तीफ़ा?

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प्रचंड के इस्तीफ़े की मांग को लेकर संसद को बाधित करने के बाद बाहर निकलते समय सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष केपी ओली ने कहा कि प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा चाहिए, जवाब नहीं.
प्रचंड के बयान को ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान और स्वतंत्रता को कमज़ोर करने वाला अशोभनीय और आपत्तिजनक’ बताते हुए ओली ने कहा, "हम उनका इस्तीफ़ा चाहते हैं, उनका जवाब नहीं."
वहीं यूएमएल के मुख्य सचेतक पद्म गिरि का दावा है कि संसद को सत्ता के लिए बाधित नहीं किया गया है बल्कि देश की आज़ादी के लिए ऐसा किया गया है.
उन्होंने कहा, "यह पहली बार नहीं है कि उन्होंने भारत के लिए 'आरामदायक' सरकार बनाने जैसे बयान दिए हैं. यह एक संवेदनशील मुद्दा है कि मौजूदा प्रधानमंत्री की ओर से बार-बार ऐसे बयान आ रहे हैं."
"मुख्य विपक्षी दल के तौर पर हमने इस मुद्दे को उठाया है. हमारी राय है कि नैतिक रूप से वह सत्ता में रहने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस्तीफ़ा देकर रास्ता साफ़ करना चाहिए.”
अगर यूएमएल की मांग के अनुरूप प्रचंड प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देते हैं तो यूएमएल के लिए नई सरकार बनाने की पहल करने का रास्ता खुल सकता है.
प्रचंड के इस्तीफ़ा देने की सूरत में यूएमएल के मुख्य सचेतक गिरि कहते हैं, "राजनीतिक दलों के लिए यह एक सामान्य और स्वाभाविक प्रक्रिया है कि जिसे बहुमत मिलता है, वह सरकार का नेतृत्व करे. चाहे यूएमएल, कांग्रेस या कोई अन्य पार्टी इसका नेतृत्व करे."
विश्लेषकों का मानना है कि यूएमएल के विरोध का कारण गठबंधन का भीतरी टकराव भी है. सुबेदी कहते हैं, "अगर यूएमएल संगठित है और अन्य अंतर्निहित कारणों से आगे बढ़ता है, तो प्रधानमंत्री के माफ़ी से भी बात नहीं बनेगी. इसका एक लक्ष्य संविधान में संशोधन की शर्त के साथ सरकार को बदलना है."
लेकिन सात प्रांतों में अस्थिरता के ख़तरे को देखते हुए कांग्रेस उस हद तक शायद ही जाए.
बयान के बचाव में ये दी गई सफ़ाई

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प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार गोबिंद आचार्य ने एक बयान जारी कर प्रीतम सिंह के संबंधों पर प्रचंड के बयान का बचाव किया.
बयान में कहा गया है कि माओवादियों के शांति प्रक्रिया में शामिल होने के तुरंत बाद प्रचंड और प्रीतम सिंह मिले और एक दूसरे को जानने लगे.
बयान में आचार्य ने कहा, ''प्रचंड और सिंह के बीच न केवल औपचारिक बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक संबंध भी हैं.''
उन्होंने दावा किया है कि प्रचंड ने कार्यक्रम में सिंह के साथ पारिवारिक संबंधों को याद किया और इसका राजनीतिकरण दुखद है.
उस बयान में यह भी दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री प्रचंड, हमेशा नेपाल की संघीय संसद के प्रति जवाबदेह रहे हैं और संसद में स्पष्टीकरण देने का मौक़ा दिए बिना, उनको निशाना बनाया जा रहा है.
इस बयान में यह कहा गया है कि मुख्य विपक्षी दल के बहिष्कार के चलते संसद में कई प्रस्ताव पास नहीं हो सके हैं.
क्या हैं पिछले विवाद?

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वैसे ये पहला मौक़ा नहीं है जब प्रचंड विवादों का सामना कर रहे हैं.
पिछले ही महीने अपनी भारत यात्रा के दौरान प्रचंड ने भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान के बारे में जो कहा उसकी काफ़ी आलोचना हुई थी.
उन्होंने तब कहा था कि सीमा विवाद को 'बांग्लादेश मॉडल' के माध्यम से हल किया जा सकता है, तब विपक्षी दलों ने सदन पर इस पर सवाल उठाए थे.
अपने बयानों के चलते कई बार विवादों में रहने वाले प्रचंड के ख़िलाफ़ पिछले मार्च में सुप्रीम कोर्ट में उनके सार्वजनिक भाषण को सबूत के तौर पर पेश करते हुए एक मामला दर्ज किया गया था.
2020 में दिए गए उनके बयान के आधार पर प्रचंड की गिरफ्तारी की मांग की गई थी.
2020 में काठमांडू में आयोजित माघी उत्सव में प्रचंड ने कहा था, "आंकड़े कहते हैं कि मैंने 17,000 लोगों की हत्या की है. यह सच नहीं है. सच यह है कि सामंती राजशाही ने 12, 000 लोगों की हत्या की थी, लेकिन आप मुझे 5,000 लोगों की हत्या की ज़िम्मेदारी देंगे तो मैं लूंगा. सशस्त्र संघर्ष की अच्छाई के साथ बुराई की ज़िम्मेदारी भी लूंगा." प्रचंड के ख़िलाफ़ यह मामला फ़िलहाल लंबित है.
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