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ग़ज़ा का वायरल वीडियो: 'कड़कड़ाती ठंड में मुझे लगभग नंगा रखा गया', एक पीड़ित की आपबीती
- Author, इथर शैलबी, शिरीन युसुफ़
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अरबी सेवा
22 साल के एक फ़लस्तीनी नागरिक ने गुरुवार को बीबीसी को बताया कि कैसे उन्हें उत्तरी ग़ज़ा में इसराइली डिफेंस फोर्सेज़ (आईडीएफ़) ने हिरासत में लिया और उसके बाद उनके साथ क्या-क्या हुआ. सेना ने उन्हें दर्जनों और लोगों के साथ हिरासत में लिया था.
इस घटना से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं.
बीबीसी ने इस वीडियो की पुष्टि की है. इस वीडियो में दर्जनों लोग ज़मीन पर घुटनों के बल बैठे दिखते हैं. इनके जिस्म पर सिर्फ़ अंडरवियर है. उनके करीब इसराइली सैनिक पहरा दे रहे हैं.
ये माना जा रहा है कि इन लोगों को ग़ज़ा पट्टी के उत्तर में बेत लाहिया मे गिरफ्तार किया गया था.
सुरक्षा के लिहाज़ से अपना नाम और पहचान ज़ाहिर न करने की गुज़ारिश के साथ एक युवा ने फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "उन्होंने (आईडीएफ़) ने हमें सड़क पर बैठने को मजबूर किया. हम लगभग तीन घंटों तक वहीं बैठे रहे. इसके बाद ट्रक आए, उन्होंने हमारे हाथ बांधे और हमारे आंखों पर पट्टियां बांधीं. इसके बाद वो हमें अनजान जगह पर लेकर गए."
वीडियो में सड़क के किनारे बड़ी संख्या में पुरुष एक कतार में बैठे दिखते हैं. ऐसे लगता है कि उनसे जूते उतारने को कहा गया हो. उनके जूते सड़क पर इधर-उधर बिखरे हुए दिखते हैं.
वीडियो में देखा जा सकता है कि इसराइली सैनिक और बख्तरबंद गाड़ियां पास खड़ी हैं, जो इन लोगों पर नज़र रखे हैं.
पूछे गए सवाल
घटना से जुड़े अन्य वीडियो में देखा जा सकता है कि इन लोगों को सेना के ट्रकों में बैठा कर कहीं ले जाया जा रहा है.
इसराइली मीडिया में इन लोगों को हमास के वो लड़ाके कहा जा रहा है जिन्होंने इसराइली सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है.
इस युवा ने बताया कि गंतव्य पर पहुंचने के बाद बेतरतीब तरीके से एक के बाद एक उनसे पूछताछ की गई. उनसे पूछा गया कि फ़लस्तीनी विद्रोही गुट हमास के साथ उनका क्या संबंध है.
एक अन्य तस्वीर- जिसकी बीबीसी ने अभी तक पुष्टि नहीं की है- में देखा जा सकता है कि कुछ लोगों की आंखों पर पट्टियां बांधी गई हैं, उन्हें घुटनों के बल नीचे बैठाया गया है. देखने पर लगता है कि ये लोग एक बड़े से रेतीले गड्ढे के पास बैठे हैं.
'पिता को साथ ले गए'
22 साल के इस युवा की आपबीती इस तस्वीर से मेल खाती दिखती है. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में जिस जगह के बारे में बताया वो इससे मेल खाती है. उन्होंने बताया कि उन्हें, उनके पिता, भाई और पांच चचेरे भाइयों को जहां ले जाया गया वो जगह "रेतीली" थी.
उन्होंने बताया कि उन्हें वहां लगभग नंगा छोड़ दिया गया, हालांकि रात को उन्हें ओढ़ने के लिए एक कंबल दिया गया.
उन्होंने बताया कि सवाल-जवाब करने के बाद उन्हें एक अनजान जगह ले जाया गया. बाद में उन्हें छोड़ दिया गया और घर जाने को कहा गया.
उन्होंने कहा, "मेरे पिता और बड़े चचेरे भाई के अलावा उन्होंने हम सभी को छोड़ दिया. मेरे पिता संयुक्त राष्ट्र राहत एजेंसी यूएनआरडब्ल्यूए के साथ काम करते हैं. मुझे नहीं पता कि वो उन्हें अपने साथ क्यों लेकर गए."
"हम अंधेरे में नंगे पांव पत्थर और कांच के टुकड़ों से भरी सड़क पर चलते रहे."
'400 में 250 लोगों को छोड़ दिया'
फ़लस्तीनी नागरिक मोहम्मद लुब्बाद बेल्जियम में रहते हैं.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म इंस्टाग्राम पर अपने भाई इब्राहिम के बारे में पोस्ट किया जिन्हें परिवार के 10 अन्य सदस्यों के साथ गिरफ्तार किया गया था.
उन्होंने एक तस्वीर में कई लोगों के बीच बैठे अपने भाई इब्राहिम के चेहरे पर गोल बनाते हुए लिखा, "ये मेरे भाई हैं." तस्वीर में उनके भाई नाम भर के कपड़े पहने दिखते हैं.
बाद में मोहम्मद इस बारे में बीबीसी से बात करने को राज़ी हो गए.
उन्होंने बताया, "वो लोग जब मेरे भाई इब्राहिम को ले गए, उसके पहले मैंने दो घंटों तक व्हाट्सऐप वीडियो कॉल पर पर उनसे बात की थी. मेरे भाई एक कंप्यूटर इंजीनियर हैं."
उन्होंने बीबीसी को बताया कि इब्राहिम की दो बेटियां हैं.
"मेरे भाई ने मुझे बताया कि हमारे घर और पूरे के पूरे बेत लाहिया गांव को इसराइली सेना ने घेर लिया है."
"दो घंटों के बाद मैंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखा. मैंने इसमें तुरंत अपने भाई को पहचान लिया और अपने कुछ और पड़ोसियों को भी पहचाना."
मोहम्मद लुब्बाद कहते हैं कि उनके दो चचेरे भाइयों को छोड़कर उनके सभी रिश्तेदारों को छोड़ दिया गया. इनमें से एक 35 साल के अहमद लुब्बाद हैं जो पेशे से टीचर हैं और चार बच्चों के पिता हैं. उनके एक और कज़न आयमान लुब्बाद हैं जो मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और तीन बच्चों के पिता हैं.
मोहम्मद कहते हैं कि उनका परिवार "आम नागरिक हैं जिनका सेना से कोई नाता नहीं है."
हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति के रिश्तेदार ने बीबीसी को बताया कि इसराइल ने कुल 400 लोगों को पकड़ा था जिसमें से 250 को छोड़ दिया गया है.
इसराइल ने क्या कहा?
इस वीडियो के बारे में पूछे जाने पर इसराइली सरकार के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था वो सभी सेना में जाने की उम्र के थे और ये लोग "उन इलाक़ों में देखे गए थे जिन्हें आम नागरिकों को कुछ सप्ताह पहले ही खाली कर देना चाहिए था."
उत्तरी ग़ज़ा में ज़मीनी हमले करने से पहले इसराइल ने यहां के लोगों से कहा था कि वो वादी ग़ज़ा से दक्षिण की तरफ चले जाएं.
आईडीएफ़ ने इन तस्वीरों पर सीधे-सीधे तो टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सेना के प्रवक्ता डेनियल हगारी ने गुरुवार को कहा, "इसराइली डिफेन्स फोर्सेज़ के सैनिकों और शिन बेत के अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकियों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की थी."
"इनमें से कई लोगों ने खुद भी 24 घंटों के भीतर हमारी सेना के सामने आत्मसमर्पण किया है. पूछताछ के बाद इनसे मिली ख़ुफ़िया जानकारी का इस्तेमाल युद्ध जारी रखने में किया जाएगा."
शुक्रवार को इसराइल सरकार के प्रवक्ता इलॉन लेवी ने बीबीसी से कहा है कि लोगों को उत्तरी ग़ज़ा में जबालिया और शेजाया से पकड़ा गया था. उन्होंने कहा कि ये दोनों जगहें "हमास का गढ़ माने जाते हैं और उनका केंद्र हैं."
उन्होंने कहा कि इन लोगों से पूछताछ की जाएगी ताकि "ये पता लगाया जा सके कि कौन हमास का आतंकवादी है और कौन नहीं."
'बर्बरतापूर्ण तस्वीरें'
एक सोशल मीडिया पोस्ट में यूके में फ़लस्तीनी राजदूत ने कहा, "ये संयुक्त राष्ट्र के शिविर से ले जाए गए आम लोगों को हिरासत में लेने और उनके कपड़े उतरवाने की इसराइली सेना की बर्बरता की तस्वीरें हैं."
राजदूत हुसाम ज़ोमलॉट ने कहा, "ये तस्वीरें इतिहास में इंसानियत की सबसे अंधेरी यादों को सामने लाती हैं."
हिरासत में लिए गए लोगों में फ़लस्तीनी पत्रकार दिया अल-कहलूत भी हैं. वो एक अरबी अख़बार अल-अरबी अल-जदीद के ग़ज़ा में ब्यूरो चीफ़ हैं. अख़बार ने गुरुवार को इसकी पुष्टि की.
दिया अल-कहलूत के चचेरे भाई, मोहम्मद अल-कहलूत ग़ज़ा में बीबीसी के लिए बतौर फ्रीलांस पत्रकार काम करते हैं. उन्होंने कहा कि उनके परिवार के कुल 24 लोगों को हिरासत में रखा गया है.
27 साल के मोहम्मद कहते हैं, "मैंने वायरल वीडियो और तस्वीरों में उनमें से 12 लोगों को पहचाना." वो कहते हैं कि उनके एक कज़न ने दूसरों की पहचान की पुष्टि की.
उन्होंने बताया कि शुक्रवार को इनमें से केवल सात लोगों को छोड़ा गया.
मोहम्मद कहते हैं, "जिन्हें छोड़ा गया उन्हें ग़ज़ा और इसराइल की सीमा के पास छोड़ दिया गया. मुझे जितना पता है, उन्हें इसराइली सेना ने ज़िकिम के पास सीमा पर छोड़ा था."
मोहम्मद अल-कहलूत ने कहा कि उनके रिश्तेदारों को घर पहुंचने के लिए छह किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा.
उनका कहना है कि उन्हें अपने दो भाइयों 36 साल के मोहसिन और 29 साल के अला की चिंता है जो अब भी हिरासत में हैं.
अरबी भाषा की न्यूज़ वेबसाइट (जिसकी अंग्रेज़ी भाषा में न्यू अरब नाम की वेबसाइट है) ने दिया अल-कहलूत को हिरासत में लिए जाने को "अपमानजनक" बताते हुए इसकी कड़ी निंदी है.
अख़बार का कहना है "हम अंतरराष्ट्रीय समुदाय, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वॉचडॉग्स और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली एजेंसियों से अपील करते हैं कि वो इलाक़े में पत्रकारों पर हमले के लिए इसराइल की आलोचना करें."
बीबीसी ने आईडीएफ़ से दिया अल-कहलूत की कथित गिरफ्तारी को लेकर सवाल पूछे हैं.
कूटनीतिक मामलों के बीबीसी संवाददाता पॉल एडम्स की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ.
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