जानवरों के यौन उत्पीड़न पर क़ानून लाने की माँग, अदालत ने क्या कहा?

    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर यह माँग की गई थी कि जानवरों के यौन उत्पीड़न को रोकने वाले क़ानून को वापस लाया जाए. इसकी सुनवाई करते हुए बुधवार 28 मई को अदालत ने कहा कि क़ानून बनाना और बदलना संसद का काम है.

जानवरों के हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं के कार्यकर्ता कुछ समय से माँग कर रहे हैं कि पुराने क़ानून के प्रावधानों को न हटाया जाए.

आईपीसी की धारा 377 को क‍िसी समय 'अननेचुरल ऑफेंसेज़ एक्ट' 1860 नाम से जाना जाता था. इसके तहत जानवरों के साथ यौन हिंसा के लिए उम्र क़ैद तक की सज़ा का प्रावधान था.

यह वही क़ानून था जिसके तहत दो बालि‍ग़ पुरुषों और दो महिलाओं के बीच के स्वैच्छिक यौन संबंधों के लिए भी सज़ा हो सकती थी यानी यह क़ानून समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखता था.

जुलाई 2024 में जब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू हुआ तब सरकार ने धारा-377 को हटा दिया.

अब जानवरों के प्रति क्रूरता के लिए लागू होने वाला क़ानून तो है मगर उसमें जानवरों के यौन उत्पीड़न के लिए सज़ा देने का अलग से कोई प्रावधान नहीं है.

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क्यों चिंतित हैं कार्यकर्ता?

मुंबई की रहने वाली पूर्णिमा मोटवानी को जब चार महीने की बिल्ली के साथ हो रही यौन हिंसा के बारे में पता चला तब वह नहीं जानती थीं कि भारत सरकार ने ऐसा करने वाले लोगों को सज़ा दिलाने वाला क़ानून ही हटा दिया है.

वह याद करती हैं, "वह बहुत डरी हुई थी. कमज़ोर थी और साफ़ था कि बहुत दर्द महसूस कर रही थी. उसकी चोटें बहुत गहरी थीं. डॉक्टर को उसे दो बार टाँके लगाने पड़े."

पूर्णिमा पुलिस थाने गईं ताकि बिल्ली पर हमला करने वाले की शिकायत करें लेकिन वहाँ उन्हें पता चला कि धारा-377 हटाई जा चुकी थी.

पूर्णिमा जानवरों पर होने वाली क्रूरता की रोकथाम वाले क़ानून के तहत ही शिकायत दर्ज करवा पाईं. इस क़ानून में सिर्फ़ 50 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है.

धारा-377 इससे कहीं मज़बूत थी. इसी वजह से जानवरों के हितों के लिए काम कर रहे 200 संगठनों की फ़ेडरेशन, 'फ़‍ियापो' - फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइजेशन, ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस क़ानून को वापस लाने की माँग की.

'फ़‍ियापो' में क़ानूनी मामलों की देख-रेख करने वालीं वर्णिका सिंह ने बताया, "पुराने क़ानून में यौन हिंसा को साफ़ तरीके से परिभाषित किया गया था. इसे वीभत्स अपराध माना गया था. पुलिस हिरासत मिल जाती थी क्योंकि वह अभियुक्त के आज़ाद घूमने से जानवर पर दोबारा हमले के ख़तरे को समझते थे."

पूर्णिमा के मुताबिक़, उन्हें पशु क्रूरता रोकथाम क़ानून के तहत शिकायत दर्ज कराने में भी वक़्त लगा.

वह बताती हैं, "कई बार फ़ोन किया. थाने के चक्कर लगाए. दरअसल पुलिस को इन मामलों में कार्रवाई करने में रुचि नहीं है. उन्हें यह मज़ाक लगता है.''

जब तक शिकायत दर्ज हुई, हमलावर फ़रार हो चुका था और आज तक गिरफ़्तार नहीं हुआ.

देखभाल और लोगों की मदद से बिल्ली की तबीयत बेहतर होने लगी. पूर्णिमा ने उसका नाम 'ग्रेस' रख दिया. इसके कुछ द‍िनों बाद ही ग्रेस को एक वायरल संक्रमण हो गया और हमले के दो सप्ताह में उसकी मौत हो गई.

कितनी व्यापक है जानवरों के ख़‍िलाफ़ यौन हिंसा?

भारत में जानवरों के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के मामले आसानी से सामने नहीं आते हैं.

जब ये क़ानूनन अपराध था तब भी पुलिस तक जानकारी तभी पहुँचती थी जब किसी ने जानवर पर हमला होते हुए देखा हो. रिकॉर्ड किया हो. यही नहीं, वह इसकी जानकारी किसी ऐक्टिविस्ट को दे.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2019 से 2022 के बीच धारा-377 के तहत करीब एक हज़ार मामले दर्ज किए गए थे. लेकिन इनमें से कितने मामले जानवरों के साथ यौन हिंसा के थे, यह जानकारी मौजूद नहीं है. इस वजह से इस समस्या की व्यापकता का पूरा अनुमान लगा पाना मुश्किल है.

इसीलि‍ए फ़‍ियापो ने अदालत से यह भी गुहार लगाई कि वे एनसीआरबी को जानवरों के साथ होने वाली अलग-अलग तरह की हिंसा की जानकारी जुटाने का निर्देश दे.

दिसंबर 2024 में अभिनेत्री जया भट्टाचार्य को एक महीने के कुत्ते के बच्चे के साथ यौन हिंसा की जानकारी मिली.

जया दो दशक से जानवरों के लिए काम कर रही हैं. वह मुंबई में जानवरों के लिए एक पनाहगाह भी चलाती हैं.

उन्होंने बताया कि हमलावर कुछ खिलाने के बहाने पिल्ले को फुसलाकर अपने घर ले आया और कुछ समय बाद 'मोहल्ले के बच्चों को वह दर्द में बिलखता मिला.'

जया ने अपने सोशल मीडिया पर पिल्ले के बारे में लिखा. स्थानीय थाने में पशु क्रूरता रोकथाम क़ानून के तहत एफ़आईआर दर्ज की. अभियुक्त गिरफ्तार हुआ लेकिन कुछ ही घंटों में ज़मानत पर रिहा हो गया.

जया ने कहा, "ऐसे आदमी हमारे समाज का सबसे बदसूरत चेहरा हैं और जब उन्हें सज़ा नहीं मिलती तो वे औरों को चोट पहुँचाने के लिए आज़ाद महसूस करते हैं."

जानवरों और इंसानों के साथ यौन हिंसा में संबंध

जानकारों का कहना है कि जानवरों के साथ यौन हिंसा करने वाला व्यक्ति इंसानों को भी निशाना बना सकता है. इस पर दुनिया भर में कई शोध हुए हैं, जिनमें यह बात कही गई है.

जानवरों का यौन उत्पीड़न अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा समेत कई देशों में अपराध है. इसके लिए दो से बीस साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

'जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ सायकियाट्री एंड द लॉ' में एक शोध छपा था. इस शोध में अमेरिका में साल 1975 से 2015 के बीच जानवरों के यौन उत्पीड़न के मामलों में 456 गिरफ्तारियों का अध्ययन क‍िया गया. इसमें पाया गया कि एक-तिहाई मामलों में हमलावर ने बच्चों और वयस्कों के साथ भी यौन हिंसा की थी.

भारत में भी कुछ मामलों में ऐसा देखा गया है. अगस्त 2024 में बुलंदशहर के एक गाँव में एक व्यक्ति पर एक बकरी का यौन उत्पीड़न करने और उसकी देख-रेख करने वाली दस साल की लड़की का बलात्कार करने का आरोप लगा था.

लड़की के वकील वरुण कौशिक ने बताया, "पड़ोस के घर की खिड़की से एक लड़के ने उस आदमी को दोनों हमले करते देखा और फोन में रिकॉर्ड कर लिया. लड़के ने दोनों वीडियो लड़की के पिता को दिखाए. वरना ये जघन्य अपराध कभी सामने ही न आता."

बच्चों के साथ यौन हिंसा के अपराध में ज़मानत नहीं मिलती. इसलिए व्यक्ति अब तक जेल में है और मुक़दमा जारी है.

सरकार का रुख़ क्या है?

ब्रिटिश शासन के दौरान साल 1860 में बनी दंड संह‍िता की धारा- 377, पाकिस्तान और बांग्लादेश के क़ानून में अब भी है.

भारत सरकार के इस धारा को हटाने से पहले भी जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता पशु क्रूरता रोकथाम क़ानून को सख्‍़त बनाने और इसमें यौन हिंसा को शामिल करने की माँग करते रहे थे.

'फ़ियापो' ने साल 2010 से 2020 के बीच जानवरों के ख़‍िलाफ़ क्रूरता की मीड‍िया में आई र‍िपोर्ट इकट्ठा की. इसके मुताबि‍क, एक हज़ार मामलों से 83 जानवरों के साथ यौन हिंसा के थे. हालाँक‍ि, इनमें से दो-तिहाई में कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई.

इन माँगों के मद्देनज़र भारत सरकार ने साल 2022 में पशु क्रूरता रोकथाम क़ानून में संशोधन का मसौदा तैयार किया. इसमें यौन हिंसा की परिभाषा जोड़ी गई. इस क्रूरता के लिए कड़ी सज़ा रखी गई. हालाँकि, यह आज तक संसद में पेश नहीं हुआ है.

जानवरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता इस देरी पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं.

पूर्णिमा मोटवानी कहती हैं, "क़ानून अगर कड़ा होगा और सबको उसकी जानकारी दी जाएगी तो शायद ऐसे घिनौने अपराध करने से पहले इंसान सोचे और रुक जाए."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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