मुजफ़्फ़रनगर उपचुनाव : 9 साल बाद चुनाव मैदान में उतरने को मजबूर दंगा पीड़ित की मां

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- Author, शहबाज़ अनवर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, मुज़फ़्फ़रनगर से
"हमारे बच्चों की लाशों पर राजनीतिक रोटियां सेंक भाजपा ने प्रदेश में सरकार बनाई. मुद्दों को भुनाया गया, मुज़फ़्फ़रनगर दंगे भड़के तो उन्हें भी सांप्रदायिकता के नाम पर भुना लिया, लेकिन अब हम चाहते हैं कि भाईचारा क़ायम हो."
"मैंने अपनी पत्नी सुरेश देवी को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खतौली विधानसभा के उपचुनाव में उतारने का फ़ैसला लिया है. मेरा फ़ैसला पक्का है, चुनाव हर क़ीमत पर लड़ा जाएगा."
ये कहना है 9 साल पहले मुज़फ़्फरनगर दंगों में मारे गए गौरव के पिता रविद्र सिंह का. कथित छेड़छाड़ के आरोप में शाहनवाज़ की हत्या और फिर रविंद्र सिंह के युवा पुत्र गौरव और उनके साले के बेटे सचिन की हत्या 27 अगस्त वर्ष 2013 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के गांव कवाल में कर दी गई थी.
इन हत्याओं के बाद मामला सुलग उठा जिसने बाद में सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया था.
7- 8 सितंबर, 2013 को हिंसा भड़क उठी जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए थे. हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था.

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भाजपा से क्यों नाराज़ हैं गौरव के माता-पिता?
खतौली से भाजपा विधायक विक्रम सैनी की बीते चार नवंबर को सदस्यता रद्द कर दी गई.
इससे पहले 11 अक्तूबर को मुज़फ़्फ़रनगर में अपर ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने उन्हें दो साल की सज़ा सुनाई थी और दस-दस हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया था.
अब इसी सीट पर पांच दिसंबर को उपचुनाव हैं. इस सीट से नामांकन दाख़िल करने की आखिरी तारीख़ 17 नवंबर थी. गौरव की मां सुरेश देवी ने इसी दिन अपना पर्चा दाख़िल किया है.
गौरव के माता-पिता भाजपा से काफी नाराज़ हैं.
गौरव के पिता रविंद्र सिंह ने बीबीसी से कहा, "हमारे बेटे की जब हत्या हुई तो भाजपा वाले ख़ुद ही कहते थे कि गौरव के नाम पर सड़क बनवाएंगे. मुक़दमे लड़ेंगे जबकि हमें मुक़दमों में कोई राहत नहीं मिली."
रविंद्र कहते हैं, "हमारे बच्चों की लाशों पर राजनीतिक रोटियां सेंक सरकार बना ली."
वो कहते हैं, "देखिये हर चुनाव में हमारा ही मुद्दा बना लिया जाता है, हमारे ज़ख्म हरे करते हैं, दंगों का मामला उठा लिया जाता है और भुना लिया जाता है, इसलिए हमने अपना दर्द जनता को बताया, हमारे लिए भाजपा ने कुछ नहीं किया."

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निर्दलीय उम्मीदवार हैं सुरेश देवी
17 नवंबर को इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर सुरेश देवी ने पर्चा दाख़िल कर दिया है. निर्वाचन अधिकारी जीत सिंह राय ने भी इस बात की तस्दीक की.
अपने पति रविंद्र सिंह के अलावा सुरेश देवी के साथ उनके अपने गांव के ही भतीजे और कुछ अन्य रिश्तेदार भी उनके साथ वहां पहुंचे थे.
लोगों में इस बीच उत्साह देखने को मिला कि उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़ी होने वाली मृतक गौरव की मां सुरेश देवी कौन हैं.
जब वह वहां से निकल जा रहीं थी तो लोग उत्सुकतावश उन्हें देख रहे थे.
निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पत्नी को उतारने के फ़ैसले के सवाल पर गौरव के पिता कहते हैं-
"देखिये मेरे हिसाब से दूसरी पार्टियां भी भाजपा की ही तरह हैं, इसलिए निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर ही अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतार रहा हूं. जनता का प्यार मिला तो जीतेंगे और सभी एक साथ भाईचारे के साथ रहेंगे. हमनें गुरुवार को पर्चा दाखिल कर दिया है."
अन्य सवाल के जवाब में वह कहते हैं, "अब मैं इस बारे में ज्यादा क्या बताऊं लेकिन गौरव की हत्या का मामला अभी मुज़फ्फरनगर ज़िला अदालत में विचाराधीन है.आरोपी पक्ष की ओर से कुछ लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा हो चुकी है."

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पार्टी पूरी तरह रविंद्र सिंह के साथ खड़ी रही- भाजपा जिलाध्यक्ष
गौरव के पिता के आरोपों पर मुज़फ़्फ़रनगर भाजपा ज़िलाध्यक्ष विजय शुक्ला ने बीबीसी से कहा-
“रविंद्र के पिता रेलवे बोर्ड के सदस्य रहे हैं. पार्टी पूरी तरह उनके साथ खड़ी रही हैं. प्रत्येक बरसी पर सारे भाजपा नेता उनके आवास पर जाते हैं. उनकी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के सारे जनपद ने लड़ी है."
सुरेश देवी के पर्चा ख़रीदने के सवाल पर कहते हैं , "ये तो अपनी मर्ज़ी है, कोई कुछ भी कर सकता है. वैसे मुझे इस बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. फिर भी भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें कोई आश्वासन दिया है तो उन्हें पूरा किया जाएगा."
अंत में भाजपा ज़िलाध्यक्ष ने एक सवाल में ये भी कहा कि रविंद्र सिंह को मनाने की कोशिश की जाएगी.
लेकिन ये सच है कि इस बार भी भाजपा विधायक की सदस्यता के जाने को हिंदू बनाम मुस्लिम बना रही है.
विजय शुक्ला कहते हैं, “हमारे विधायक विक्रम सैनी ने हिंदुत्व की लड़ाई लड़ी, उसमें ही उन्हें सज़ा हुई, उसके बाद उनकी सदस्यता रद्द हुई है."

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बेटे को याद कर हर रोज रोती हैं सुरेश देवी
एक माँ के सामने उसका जवान बेटा गुज़र जाए तो उस पीड़ा की शिद्दत को महसूस किया जा सकता है, सुरेश देवी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. वह भले ही उपचुनाव लड़ने का फ़ैसला कर चुकी हैं, लेकिन उनके भीतर आज भी घरेलू महिला की ही झलक दिखती है.
पर्चा दाख़िल करने के बाद जब वह मीडिया से मुख़ातिब हुई तो बोल भी नहीं पा रहीं थीं. सिर पर दुपट्टा ढका था और निगाहें नीची थीं. रविन्द्र सिंह ने बीबीसी से कहा, "मेरी पत्नी पढ़ी-लिखी नहीं है, लेकिन हम उन्हें हस्ताक्षर करना तो सिखा ही देंगे.रही बात चुनाव प्रचार में लोगों से बातचीत की तो वो आदत भी धीरे-धीरे पड़ जाएगी."
सुरेश देवी का शायद ही कोई दिन ऐसा गुज़रता हो जिस दिन वो अपने बेटे को याद कर ना रोती हों. सुरेश देवी के चुनाव लड़ने के फ़ैसले पर बीबीसी ने उनसे बात करने की कोशिश की.
लेकिन उनके पति रविंद्र सिंह ने कहा, "देखिये सुरेश देवी को चुनाव में खड़ा करने का फ़ैसला मेरा है, वह इस बारे में बात नहीं कर सकती हैं. बस वह भी यही चाहती हैं कि लोगों में आपसी भाईचारा बना रहे. हालांकि, वह अपने बेटे को याद कर हर रोज रोती हैं."

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कौन-कौन मुक़ाबले में है इस बार उपचुनाव में?
विधानसभा चुनाव 2022 में खतौली सीट भाजपा के पास गई थी. यहां पहले से एक बार विधायक रहे विक्रम सैनी ने दोबारा जीत हासिल की थी.
स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार मंगल सिंह ने बीबीसी से कहा, 'पिछले चुनाव में विक्रम सैनी ने गठबंधन प्रत्याशी राजपाल सिंह सैनी को करीब 16 हज़ार वोटों से हराया था. उन्हें तक़रीबन एक लाख से अधिक वोट पड़े थे जबकि तीसरे स्थान पर बसपा से करतार सिंह भडाना रहे थे.'
उन्होंने बताया, "क़रीब दो लाख 72 हज़ार से अधिक मतदाताओं वाली इस विधानसभा में गौरव की मां सुरेश देवी के प्रति लोगों में सहानुभूति है. गौरव और सचिन के नाम पर भाजपा नेताओं ने दो सड़कें बनवाने का वादा किया था, लेकिन अभी तक मृतकों के परिवार को भाजपा से इस बात को लेकर नाराज़गी है कि उन्होंने यह वादा पूरा नहीं किया. इस बार मैदान में भाजपा की ओर से विक्रम सैनी की पत्नी राजकुमारी सैनी हैं जबकि सपा-रालोद गठबंधन की ओर से मदन भैया चुनाव मैदान में हैं."
"मैं मुसलमान हूं पर मुझे हिंदूओं ने भी वोट दिया"
कवाल के ग्राम प्रधानपति मोहम्मद इस्लाम ने बीबीसी से कहा-
"मलिकपुरा गांव कवाल गांव का एक मजरा है जो जानसठ ब्लॉक में आता है. वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक इस गांव की आबादी क़रीब 11 हज़ार के करीब है, जिसमें आधे से अधिक आबादी मुस्लिमों की है जबकि शेष आबादी में जाट, सैनी और अन्य बिरादरियों के लोग रहते हैं."
उन्होंने बताया, "साल 2013 में इसी कवाल गांव में शाहनवाज़, सचिन और गौरव मारे गए थे. ऐसी घटनाएं अक्सर सुनाई देती रहती हैं, लेकिन कुछ लोगों ने मामले को तूल दे इसे सांप्रदायिक बना दिया. हालांकि, अब सभी लोग एक-दूसरे के साथ प्यार-मोहब्बत के साथ रहते हैं."
कवाल गांव में ही प्रधान का चुनाव लड़ चुकीं आरती सैनी के ससुर महेंद्र सैनी ने बीबीसी से कहा-
"हमारे गांव में आज पूरी तरह अमन और शांति है. सभी लोग एक दूसरे के साथ भाईचारे के साथ रह रहे हैं. दंगों के आठ-छह महीने तक ही कुछ तनाव रहा था."
वो कहते हैं, "सुरेश देवी यदि गौरव की मौत के तुरंत बाद ही चुनाव में खड़ी होती तो बेहतर होता, लेकिन अब उन्होंने ये फ़ैसला लिया है तो कुछ सोचकर ही लिया होगा."
गौरव का परिवार
रविंद्र सिंह मुज़फ़्फ़रनगर के जानसठ ब्लॉक में आने वाले गांव कवाल के रहने वाले हैं.
उनका आवास मलिकपुरा में आता है जो कवाल का एक मजरा है.
रविंद्र सिंह ज़्यादातर मुज़फ़्फ़रनगर में रहते हैं. गांव में उनकी कुछ ज़मीन है जिसे बटाई पर दिया हुआ है.
रविंद्र सिंह पेशे से किसान हैं. उनकी दो बेटियां हैं जिनका विवाह हो चुका है.
इन्ही में एक बेटी मुज़फ़्फ़रनगर के एक स्कूल में हैं जिसके साथ रविंद्र सिंह और उनकी पत्नी सुरेश देवी रहती हैं.
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