वो 500 मीटर जहाँ मुज़फ़्फ़रनगर का डीएनए है

- Author, अविनाश दत्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी, मुज़फ़्फ़रनगर से
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर शहर से करीब 20-25 किलोमीटर दूर सरकारी कागज़ों में दो गाँव हैं कुटबा और कुटबी.
इनमें से एक गाँव कब खत्म होता है और दूसरा कब शुरू, कोई बाहरी आदमी समझ नहीं सकता. दोनों ही गाँवों में मुसलमान काफ़ी कम हैं.
इतने आसपास बसे होने के बावजूद सांप्रदायिक दंगों की झुलसन ने दोनों गाँवों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया है. इस फ़र्क को अगर नाम और शक्ल देनी होना हो, तो अब्दुल अज़ीज़ और बोहती बी से बेहतर कुछ नहीं होगा.
बहत्तर वर्ष के अब्दुल अज़ीज़ कुटबा के रहने वाले हैं. आठ सितंबर को दंगे की लपटों ने उनके परिवार को घेर लिया और तभी से वो अपना गाँव छोड़कर नज़दीक के शाहपुर गाँव के एक राहत शिविर में रह रहे हैं.
अब वो घर लौटने को तैयार नहीं दिखते. बस कहते हैं "त्याग दिया जी."
अब्दुल अज़ीज़ गाँव वालों के मारे हैं तो कुछ ही दूर रहने वाली बोहती बी गाँव वालों के सहारे हैं.
अब्दुल अज़ीज़ की आपबीती
अज़ीज़ बताते हैं कि आठ सितंबर की सुबह उनके मोहल्ले पर दंगाइयों ने हमला कर दिया. ये हमला लगभग सुबह 9 बजे शुरू हुआ.

वो कहते हैं कि दंगाइयों ने मस्जिद जला दी और मुसलमानों के घर लूटने शुरू कर दिए. सुबह 10.30 बजे उनका बेटे और परिवार के चार दूसरे लोगों को भीड़ ने क़त्ल कर दिया.
बेटे के बारे में पूछने पर उनकी आवाज़ भर्रा जाती है. गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहते हैं "नाल काट दी, यहाँ काटा."
पूछिए कि उनके परिवार में कौन चला गया तो वो धीरे-धीरे उंगलियों पर गिनने लगते हैं, "एक मेरा बेटा, कय्यूम, सम्साद, उसका लड़का पोता....जी, पांच लोग."
अब्दुल अज़ीज़ कहते हैं कि एक रात पहले उन्हें गाँव के प्रधान ने भरोसा दिलाया था कि कुछ नहीं होगा लेकिन अगली सुबह वो भरोसा बुरी तरह टूट गया.
जब मैं उनकी बात का तार पकड़े-पकड़े उनके गांव कुटबा और उसी से सटे कुटबी गया तो कुटबा में अब्दुल अज़ीज़ का बयान देखने में सच लगा. मस्जिद जली हुई, घर लुटे हुए और खूंटों से जानवर गायब.
किस्सा बोहती बी का

कुछ ही दूर लगे हुए गाँव कुटबी में मिल गईं बोहती बी. उनकी उम्र का अंदाज़ केवल उनकी झुर्रियों से ही लगाया जा सकता है क्योंकि उन्हें तो अपनी उम्र मालूम ही नहीं.
सात अगस्त से उन्हें बुखार था. वो बेहोश थीं. आठ तारीख़ को आँख खुली तो घर में कोई नहीं था.
उनके दो बेटे, तीन पोतियाँ और परिवार के अन्य लोग भाग गए थे. कोई साधन नहीं था इसलिए उन्हें बेहोशी की हालत में घर छोड़ गए.
उनसे पूछिए कि आप बाद में क्यों नहीं गईं, तो कहती हैं "अब मैं कहाँ जाऊं, यह भैंस भी है. लड़कों की ख़बर आई थी कि आकर ले जाएंगे."

जहाँ कुछ ही दिन पहले जाट और मुसलमानों के बीच खूँरेज़ी हो रही थी उसी इलाक़े में अब बूढ़ी बोहती बी को अगल-बगल के जाट परिवारों की औरतें खाना और दवा दे रही हैं और उनके जानवरों को चारा.
कुटबा की मस्जिद से लगभग 500 मीटर की दूरी पर मौजूद कुटबी में ना मस्जिद जली, ना ही किसी मुसलमान का घर लुटा.
कुछ घरों में जानवर बंधे हैं जिन्हें गाँव वाले चारा डाल रहे हैं. कुछ और मुसलमान घरों के बारे में वो बताते हैं कि वो उन्हें खोलकर ले गए हैं और चारा-पानी दे रहे हैं. मुसलमान वापस लौटेंगे तो उन्हें वापस दे देंगे.
इस गाँव में झगड़ा नहीं हुआ, इसका मतलब यह नहीं कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ.
कुटबी की चौपाल पर एक 72 साल के बुज़ुर्ग हरवीर सिंह कहते हैं, "सबने मिल के मुस्लिम वोटों की खातिर ध्रुवीकरण कर दिया जी. जाट लोग पहले अजीत सिंह के नलके पर वोट देवे थे जी. वो मुसलमान खड़ा कर देवे था जी और जाट भरपूर वोट देवे था जी. अब के तो जी हमें तो बीजेपी ठीक लाग्गे हैं जी."
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