वेनेज़ुएला के पास कितना गोल्ड, कॉपर और तेल है

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साल 2005 में दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देश वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनी 'पेट्रोलियोस डी वेनेज़ुएला' (पीडीवीएसए) के साथ भारत की सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी ने एक समझौता किया था.
भारत के साथ समझौता करते हुए वेनेज़ुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ ने कहा था कि उनका देश अमेरिकी बाज़ार पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है.
वेनेज़ुएला के इतिहास में निकोलस मादुरो वह शख़्स हैं, जिन्होंने लातिन अमेरिकी देशों में 21वीं शताब्दी के सबसे करिश्माई नेता ह्यूगो चावेज़ की जगह ली.
वेनेज़ुएला में तेल भंडार के अलावा भी बहुत कुछ है, जो इस दक्षिण अमेरिकी देश को ख़ास बनाता है.
इस क्षेत्र में जिन देशों में सबसे ज़्यादा शहरीकरण हुआ है, उनमें वेनेज़ुएला भी शामिल है.
वेनेज़ुएला का तेल भंडार

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91 हज़ार वर्ग किलोमीटर से बड़े क्षेत्र में फैले वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास है.
इस देश की आबादी तीन करोड़ से ज़्यादा है. इस देश में मुख्य तौर पर स्पेनिश भाषा बोली जाती है, इसके अलावा देश में कुछ क्षेत्रीय भाषाएँ भी प्रचलित हैं.
मादुरो लंबे समय से ट्रंप प्रशासन पर उन्हें सत्ता से हटाने की कोशिश करने का आरोप लगाते रहे हैं. उनका कहना था कि अमेरिका वेनेज़ुएला के तेल के ख़ज़ाने पर नियंत्रण करना चाहता है.
तो सवाल यह भी उठता है कि आख़िर वेनेज़ुएला के पास कितना बड़ा तेल भंडार है, जिसे लेकर ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं.
वेनेज़ुएला में 300 अरब बैरल से ज़्यादा के तेल भंडार का अनुमान है, जो दुनिया के किसी भी देश में सबसे बड़ा है.
यह मुख्य रूप से बहुत भारी कच्चा तेल है, जिसे निकालना महंगा और मुश्किल है, फिर भी वेनेज़ुएला दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा निर्यातक बना हुआ है.
अमेरिकी एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (ईआईए) के अनुसार, साल 2023 में वेनेजुएला ने दुनिया के कुल कच्चे तेल का सिर्फ़ 0.8% उत्पादन किया.
मौजूदा समय में वेनेज़ुएला हर रोज़ क़रीब नौ लाख बैरल कच्चा तेल एक्सपोर्ट करता है और चीन इसका सबसे बड़ा ख़रीदार है.
खनिज

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तेल के अलावा वेनेज़ुएला खनिजों के मामले में भी एक संपन्न देश है.
काराकास में भारतीय दूतावास ने वेनेज़ुएला में माइनिंग सेक्टर से जुड़े एक सर्वे को शेयर किया है, जो साल 2016 का है.
इसके मुताबिक़ वेनेज़ुएला में कोयला के साथ ही इस्पात, अल्यूमीनियम, निकेल, मैंगनीज़, क़ॉपर, ज़िंक जैसे खनिजों का भंडार है.
इस सर्वे के मुताबिक़ वेनेज़ुएला में 12 हज़ार मिलियन टन लौह अयस्क का भंडार है.
वेनेज़ुएला का कालाओ गाँव परंपरागत तौर पर सोने की माइनिंग के लिहाज से सबसे प्रमुख केंद्र है. इस देश में 40 लाख टन सोने के खनिज का भंडार का अनुमान है.
जबकि यहाँ 60 मिलियन टन अल्यूमीनियम अयस्क (बॉक्साइट) होने का भी अनुमान है.
नॉन मेटलिक खनिजों की बात करें, तो वेनेज़ुएला में 10 अरब मीट्रिक टन कोयले का भंडार मौजूद होने का अनुमान है.
वेनेज़ुएला की मुख्य फ़सल कॉफ़ी है. यहाँ मक्के और धान की भी खेती होती है.
यहाँ खेती के प्रमुख इलाक़े उत्तर में मौजूद पहाड़ियाँ और उसके नीचे की तरफ़ का हिस्सा है.
21वीं सदी के शुरुआती दशकों में वेनेज़ुएला में ख़राब आर्थिक प्रबंधन भी देखने को मिला.
देश में भीषण महंगाई, ज़रूरी सामानों की कमी, बेरोज़गारी और अपराध जैसी समस्याएँ व्याप्त हैं. इसकी वजह से क़रीब 70 लाख वेनेजुएलावासी पड़ोसी देशों में पलायन कर चुके हैं.
विवाद और वेनेज़ुएला का संकट

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ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका में आने वाले वेनेज़ुएला के लाखों प्रवासियों के लिए मादुरो को ज़िम्मेदार ठहराया है.
इस क्षेत्र में पनामा और कोलंबिया के बीच पहाड़ों और वर्षावनों के बीच से गुज़रता 100 किलोमीटर लंबा रास्ता 'डारिएन गैप' कहलाता है.
ज़मीन पर मध्य और दक्षिण अमेरिका को जोड़ने वाला यह एकमात्र रास्ता है. इसे दुनिया के सबसे ख़तरनाक माइग्रेशन रूट में गिना जाता है.
हाल के वर्षों में बड़ी तादाद में वेनेज़ुएला के शरणार्थियों ने यह जोख़िम उठाया. वेनेज़ुएला के शरणार्थी संकट की गिनती विश्व के बड़े शरणार्थी संकटों में होने लगी.
वेनेज़ुएला के नेता और अमेरिका के बीच यह दुश्मनी काफ़ी पुरानी है. मादुरो के गुरु ह्यूगो चावेज़ ने कई बार अमेरिका पर ख़ुद की हत्या के प्रयास का आरोप लगाया था.
पूर्व राष्ट्रपति चावेज़ वेनेज़ुएला के सबसे चर्चित नेताओं में रहे हैं. साल 2013 में निधन से पहले अपने 14 साल के कार्यकाल के दौरान वो ख़ुद को 'ग़रीबों का मसीहा' बताते थे.
उन्होंने वेनेज़ुएला को तेल से होने वाली कमाई से अरबों डॉलर सामाजिक कार्यक्रमों में लगाए.
उनके उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो की सरकार को तेल की गिरती क़ीमतों की वजह से आर्थिक संकट के दौर से गुज़रना पड़ा.
उन्हें अपने कार्यकाल में राजनीतिक संकट का भी सामना करना पड़ा.
यह ऐसी स्थिति थी जिसने वेनेज़ुएला को तक़रीबन पतन की तरफ धकेल दिया. इन हालात में वेनेज़ुएला की सड़कों पर हर रोज़ सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ करते थे.
देश के लाखों नागरिकों ने वेनेज़ुएला छोड़कर कोलंबिया और ब्राज़ील में शरण ली. वेनेज़ुएला में ग़रीबी से जूझ रहे कुछ इलाक़ों में 70 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार बताए गए.
यह देश पड़ोसी देश गुयाना के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद में उलझा हुआ है, जो एक विवादित तेल-समृद्ध क्षेत्र है.
अमेरिका से ऐसे बढ़ती गई दुश्मनी

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अमेरिका और वेनेज़ुएला की मौजूदा शासन व्यवस्था के बीच स्पष्ट दुश्मनी चावेज़ के दौर में ही शुरू हो गई थी और ट्रंप के शासनकाल में यह और मुखर होकर सामने आ गई,
सरकार के नियंत्रण वाले चुनाव आयोग ने निकोलस मादुरो को जुलाई 2024 के राष्ट्रपति चुनाव का विजेता घोषित किया और वो लगातार तीसरी बार इस पद पर आसीन हुए.
विपक्ष ने दावा किया कि उसके उम्मीदवार एडमंडो गोंजालेज़ ही असली विजेता थे.
अमेरिका, यूरोपीय संघ और कई अन्य सरकारों ने वेनेज़ुएला चुनाव के मतदान का विस्तृत डेटा जारी किए बिना मादुरो को विजेता के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है.
जबकि चीन, रूस और ईरान जैसे देशों ने उनकी ताजपोशी को स्वीकार किया.
इससे पहले साल 2018 में हुए पिछले चुनाव को भी अमेरिका समेत कई सरकारों ने व्यापक रूप से पक्षपातपूर्ण बताया था और वेनेज़ुएला पर भारी प्रतिबंध लगा दिए थे.
इतिहास के आईने में

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साल 1498-99 में स्पेन के क्रिस्टोफर कोलंबस और अलोंसो डी ओजेडा ने वेनेज़ुएला का दौरा किया, जहाँ कैरिब, अरावाक और चिबचा लोग निवास करते थे.
साल 1521 में स्पेन ने वेनेज़ुएला को उपनिवेश बनाने शुरू किया.
साल 1810 में नेपोलियन ने स्पेन पर हमला किया, तो मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए वेनेजुएलावासियों ने आज़ादी की घोषणा कर दी.
साल 1908-35 में तानाशाहजुआन विसेंट गोमेज़ के शासनकाल में, वेनेजुएला दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बन गया.
साल 1945 में दशकों के सैन्य शासन के बाद पहली बार देश में आम लोगों ने अपनी सरकार बनाई.
साल 1973- वेनेजुएला को तेल की बढ़ती क़ीमतों से फ़ायदा हुआ और अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले उसकी मुद्रा अपने चरम पर पहुँच गई.
देश में तेल और इस्पात उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया.
साल 1989 में आर्थिक मंदी के बीच कार्लोस एंड्रेस पेरेज़ देश के राष्ट्रपति चुने गए और उन्होंने आईएमएफ़ से कर्ज़ लेकर कई तरह के ख़र्च किए.
इसके बाद दंगे, मार्शल लॉ और आम हड़ताल हुई, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए.
साल 1992 में कर्नल ह्यूगो चावेज़ और उनके समर्थकों ने दो बार तख़्तापलट का प्रयास किया.
तख़्तापलट के दमन में लगभग 120 लोग मारे गए, कर्नल चावेज़ को जेल में डाल दिया गया और दो साल बाद उन्हें माफ़ी दी गई.

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1998 में पुरानी पार्टियों से मोहभंग के बीच चावेज़ राष्ट्रपति चुने गए और उन्होंने 'बोलिवेरियन क्रांति' की शुरुआत की.
उन्होंने तेल की कमाई से समाजवादी और लोकलुभावन आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ लागू कीं, और अमेरिका विरोधी विदेश नीति का नेतृत्व किया.
साल 2005 में चावेज़ ने भारत का चार दिवसीय दौरा किया था. दोनों देशों के बीच बातचीत में ऊर्जा क्षेत्र प्रमुख एजेंडे में था.
साल 2006 में वेनेज़ुएला ने रूस के साथ तीन अरब डॉलर का हथियार सौदा किया, जिससे इस मामले में अमेरिका पर उसकी निर्भरता ख़त्म हो गई.
2012 में चावेज़ चौथी बार राष्ट्रपति बने और अगले साल कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई.
2013 में चावेज़ के चुने हुए उत्तराधिकारी निकोलस मादुरो एक चरमराती अर्थव्यवस्था के बीच वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति बने थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
















