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कांग्रेस पार्टी महात्मा गांधी के नाम पर यात्रा से क्या चुनावों में प्रदर्शन सुधार सकती है?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
बेलगावी में कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में पार्टी ने अपने लिए एक ऐसा काम तय किया है, जिसे उस जुनून के साथ लागू करने की ज़रूरत है, जैसा हाल के दशकों में पार्टी नहीं कर पाई है.
कर्नाटक के बेलगावी में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सत्र की शताब्दी मनाने के लिए सीडब्ल्यूसी की विशेष बैठक आयोजित की गई थी.
यहां साल 1924 में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता की थी.
इसी सत्र में महात्मा गांधी ने सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता के मक़सद को हासिल करने के लिए 'स्वराज' और 'सर्वोदय' के प्रचार-प्रसार के लिए पार्टी को बदलाव का सूत्रधार बनाया था. इसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और कामकाज को भी बदल दिया.
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स्पष्ट रूप से यह शताब्दी समारोह ऐसे समय में आया है, जब हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में हार के बाद कई पार्टी नेताओं ने संगठन के हालात के बारे में निजी तौर पर बात करना शुरू कर दिया है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकसभा में उल्लेखनीय प्रदर्शन के बाद विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का ऐसा प्रदर्शन रहा है.
वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार आनंद सहाय ने बीबीसी हिंदी से कहा, "कांग्रेस पार्टी कुछ हद तक भारतीय क्रिकेट टीम की तरह है. उनके पास दो, तीन बहुत ही शानदार बल्लेबाज़ और कुछ तेज गेंदबाज़ हैं.''
उनकी टिप्पणी कांग्रेस के अपने संगठन को मज़बूत करने में नाकामी को लेकर है.
जबकि साल 2004-14 के बीच डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ऐसी नीतियों को लागू कर रही थी, जिससे भारत 10 साल तक लगातार आठ से नौ प्रतिशत की दर से विकास कर रहा था.
आनंद सहाय कहते हैं, ''जब कांग्रेस ने यह सुनहरा मौक़ा खो दिया, तो आज आगे बढ़ना और भी मुश्किल हो जाएगा.''
प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषक डॉ. संजय कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''कांग्रेस को कोई एक समस्या परेशान नहीं कर रही है. यह एक ऐसे मरीज़ की तरह है, जिसे कई स्वास्थ्य समस्याएं हैं. जो एक बीमारी के लिए एक दवा ले रही रही है और इससे दूसरी बीमारी पर बुरा असर हो जाता है.''
बेलगावी में कांग्रेस कार्यसमिति ने क्या निर्णय लिया?
कांग्रेस पार्टी में नीतियां तय करने वाली सबसे बड़ी इकाई ने महात्मा गांधी की विचारधारा के बारे में जागरूकता पैदा करने, डॉ. बीआर आंबेडकर के कथित अपमान के ख़िलाफ़ और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए 'जय बापू, जय भीम और जय संविधान यात्रा' शुरू करने का फैसला किया है.
इस बैठक में पार्टी को ज़मीनी स्तर से ऊपर तक संगठित करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया.
बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने कहा कि लोगों में इस बारे में जागरूकता पैदा करना जरूरी है कि कैसे बीजेपी सरकार के दबाव में चुनाव आयोग के काम न करने से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो रहे हैं.
बताया जाता है कि उन्होंने विशेष रूप से हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों का ज़िक्र किया, जिसमें पार्टी के कई उम्मीदवार मामूली अंतर से हार गए थे. इसके अलावा महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के बाद 73 लाख नए मतदाता जुड़ गए.
क्या ये कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए है
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बेलगावी में लिए गए फ़ैसले कांग्रेस पार्टी में एक बार फिर से जान फूंकने में कामयाब होंगे, वो भी तब जब उसकी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के पास आक्रामक कार्यकर्ताओं की सेना है?
राजनीतिक टिप्पणीकार इस बात पर सहमत हैं कि लोगों के बीच जाना बिल्कुल भी बुरा विचार नहीं है.
डॉ. संजय कुमार ने कहा, ''पदयात्रा किसी भी तरह से नुकसानदेह नहीं है. इसका फायदा यह है कि जो नेता लोगों के बीच जा रहे हैं, वे ज़मीनी स्तर पर संगठन को खड़ा करने में सक्षम होंगे.''
दरअसल, संजय कुमार का ये मानते आए हैं कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से वोट नहीं मिलेंगे या इसका कम फायदा होगा.
संजय कुमार कहते हैं, "लेकिन राहुल गांधी को यह फायदा हुआ कि वे पार्टी के भीतर खुद को स्थापित करने में सफल रहे. उस समय गांधी परिवार पार्टी के भीतर अपनी साख खो रहा था. दूसरी पार्टी से एक-दो नेता ले आने से कांग्रेस को सीमित मदद मिलेगी, लेकिन पार्टी के लिए ज़मीनी कार्यकर्ता तैयार करने से बड़ा आत्मविश्वास मिलता है. मुझे लगता है कि यह एक सकारात्मक फ़ैसला है.''
हालांकि, आनंद सहाय का नज़रिया इससे थोड़ा अलग है.
उनका कहना है, ''पदयात्रा जनता से संपर्क का एक महत्वपूर्ण साधन ज़रूर है, लेकिन केवल पदयात्रा से काम नहीं चलेगा. यह अपने आप में कुछ समय के लिए सीमित होता है. यह कुछ हफ्तों या महीनों तक चलती है. लेकिन एक राजनीतिक दल को कुछ ज़्यादा स्थायी चीजों की ज़रूरत होती है और यह केवल संगठन निर्माण से ही संभव है.''
उन्होंने यह भी चेताया कि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो कुछ महीनों में पार्टी की किस्मत बदल देगा. बल्कि इसमें अगले चुनाव तक का समय लगेगा.
"अगर यह महात्मा गांधी के नक्शेकदम पर चलने के लिए है, तो ये अपील आज़ादी के दूसरे आंदोलन चलाने की सच्ची अपील होनी चाहिए, जिसमें समाज को सांप्रदायिकता, सामाजिक भेदभाव और बेरोज़गारी जैसे रोगों से दूर कराने की बात हो.''
लेकिन, क्या ये पदयात्रा अकेली कांग्रेस को समस्याओं से छुटकारा दिला देगी?
कांग्रेस के सामने क्या चुनौतियां हैं?
डॉ. संजय कुमार के अनुसार, कांग्रेस के सामने इस समय कई समस्याएं हैं.
वो कहते हैं, "उनके सामने नेतृत्व का संकट है. यदि यह गांधी परिवार - राहुल, सोनिया और प्रियंका के साथ जाती है, तो बीजेपी परिवारवाद के लिए हमला करती है. यदि गांधी परिवार पीछे हट जाता है, तो पार्टी के लिए एकजुट रहना बहुत मुश्किल होगा. मल्लिअर्जुन खड़गे फ़िलहाल पार्टी अध्यक्ष हैं, लेकिन जनता की धारणा है कि पार्टी की कमान गांधी परिवार के हाथ में है.''
डॉ. संजय कुमार के अनुसार कांग्रेस के लिए दूसरी और सबसे बड़ी चुनौती, "धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए कांग्रेस का वैचारिक रुख है."
"अगर कांग्रेस इस सिद्धांत की ओर झुकती है, तो बीजेपी उस पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाती है. अगर वो दक्षिणपंथ की ओर झुकती है, तो मुस्लिम वोट क्षेत्रीय दलों की तरफ़ चले जाएंगे. इससे भी बीजेपी को फ़ायदा होगा."
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ (एनआईएएस) के जेआरडी टाटा चेयर के विज़िटिंग प्रोफेसर नरेंद्र पाणि ने बीबीसी हिंदी से कहा, "आज कुल मिलाकर दो तरह के मतदाता हैं. एक जो राष्ट्रीय मुद्दों के साथ जाता है और दूसरा जो स्थानीय- क्षेत्रीय मुद्दों के साथ जाता है."
"कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह स्थानीय मुद्दों से कैसे निपटे और फिर राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन कैसे हासिल करे. मुझे नहीं पता कि उसके पास ऐसा करने के लिए बौद्धिक साधन हैं या नहीं, लेकिन अगर पार्टी इससे निपटने के लिए गंभीरता से महात्मा गांधी की ओर देख रही है, तो ऐसा करना संभव है क्योंकि महात्मा ने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों से जोड़ा था."
प्रोफेसर पाणि ने यह भी कहा कि पिछले कुछ साल में कांग्रेस दिल्ली केंद्रित हो गई है और इसकी राजनीति चुनाव केंद्रित हो गई है, जिसका मतलब है कि अगर वह चुनाव जीत जाती है, तो उसे लगता है कि वह सफल हो गई है, जबकि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में ऐसा नहीं था.
उनका कहना है, "अगर कांग्रेस पारंपरिक मायने में महात्मा गांधी को पुनर्जीवित करना चाहती है, तो यह एक रास्ता है, जो पार्टी को नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द होने वाली राजनीति से बाहर निकाल सकता है. यह पुरानी क्षेत्रीय राजनीति का मुकाबला करने में भी मददगार होगा. यही कांग्रेस करने का प्रयास कर रही है."
कांग्रेस चुनावी रणनीति में बीजेपी से मात क्यों खा जाती है?
डॉक्टर संजय कुमार कहते हैं, "कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सफल रही क्योंकि उसने एक वैचारिक नीति अपनाई जो सेक्युलरिज़म से संबंधित नहीं है. यह संविधान, दलितों और ओबीसी के अधिकारों से जुड़ा हुआ है. इससे पार्टी को कुछ सफलता मिली, लेकिन यह पूरे देश में काम नहीं करता."
''यह उन राज्यों में सफल हो सकता है, जहां मंडल (आयोग) के बाद बदलाव हुए हैं, जैसे बिहार या उत्तर प्रदेश. लेकिन छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं होगा.''
बीजेपी ने हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों राज्यों में प्रचार के दौरान ''कड़ी मेहनत'' की, जबकि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में अपने प्रदर्शन की वजह से अति आत्मविश्वास में रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.