मणिपुर में डर, ग़ुस्सा और दो समुदायों के बीच अविश्वास की बढ़ती खाई- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मणिपुर से लौट कर
भारतीय सेना से रिटायर हो चुके साइखोम रॉकेट अपनी जेब से बन्दूक़ की एक गोली निकालते हुए कहते हैं कि ये वही गोली है, जिसने उनके बेटे की जान ली.
10 जुलाई की सुबह उन्हें ख़बर मिली कि इम्फ़ाल से कुछ दूर कादंगबंद इलाक़े में गोलीबारी हुई है, जिसमें उनके 28 साल के बेटे साइखोम शुबोल घायल हुए हैं.
वो कहते हैं, "फ़ोन पर बात हुई तो उन्होंने कहा कि पाँव में गोली लगी है. मैंने सोचा की पाँव में लगी है तो इलाज करने से ठीक हो जायेगा. वहां जाने के बाद पता चला कि मेरा बच्चा मर चुका है."
साइखोम शुबोल पिछले कुछ दिनों से मैतेई समुदाय की एक विलेज डिफेन्स कमिटी में वालंटियर के तौर पर काम कर रहे थे.
ये कमिटियां उन इलाक़ों में सक्रिय हैं, जहाँ मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों के बीच हिंसा होने की आशंका ज़्यादा है.
10 जुलाई की सुबह शुबोल इम्फ़ाल घाटी के नज़दीक के पहाड़ी इलाक़ों में हथियारबंद गुटों के बीच चल रही हिंसा की चपेट में आ गए.
साइखोम रॉकेट चाहते हैं कि इस बात की तहक़ीक़ात की जाए कि उनके बेटे की जान लेने वाली गोली किसने चलाई थी.
साथ ही वो ये नहीं समझ पा रहे कि दो महीने से ज़्यादा समय से चल रही हिंसा थम क्यों नहीं रही?
वह कहते हैं, "राजनीति करने वालों को ये बोलना चाहूंगा कि ग़लत काम मत कीजिये. इंसान की जान को खिलौना नहीं समझना चाहिए. अभी सेंटर में भी बीजेपी सरकार है और मणिपुर में भी बीजेपी सरकार है. दोनों सरकारें क्या कुछ नहीं कर सकतीं? क्यों नहीं कर सकतीं?"
मृतक शुबोल के घर पर ग़मज़दा लोगों की एक बड़ी भीड़ जुट गई है. शुबोल की माँ उन कपड़ों में अपने बेटे को ढूंढ रहीं हैं जिन्हें पहनकर वो फुटबॉल खेलता था.

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सड़कों पर फूटता ग़ुस्सा
इस मौत की ख़बर आने के कुछ घंटों बाद ही स्थानीय लोगों के अंदर का दर्द और ग़ुस्सा इम्फ़ाल की सड़कों पर फूट पड़ा.
शुबोल के घर से क़रीब डेढ़ किलोमीटर दूर बड़ी संख्या में महिलाओं ने इम्फ़ाल की मशहूर इमा मार्केट के नज़दीक सभी रास्तों को बंद कर दिया.
पुलिस की बड़ी मौजूदगी ये सुनिश्चित कर रही थी कि ये महिलाएं मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह के घर तक न जा सकें.
मणिपुर में दो महीने से ज़्यादा समय से चल रही जातीय हिंसा का एक और अध्याय इम्फाल की सड़कों पर लिखा जा रहा था.
विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेती निरुपमा लैशराम ने कहा, "एक नौजवान हमारे लिए मर गया. कल न जाने कितने और मरेंगे. कृपया हमारी रक्षा करें. यह हमारा अनुरोध है. हम मरना नहीं चाहते. हमारा परिवार है, हमारे बच्चे हैं. कृपया हमें बचाएं."
ये महिलाएं इस बात से भी आहत थीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक मणिपुर हिंसा पर कुछ नहीं कहा है.
इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहीं रणिता लैशराम ने कहा, "मैं मोदी जी से कहना चाहती हूँ कि क्या हम भारतीय नहीं हैं? अगर वो थोड़ा सा भी हमारे लिए वो सोचते हैं, हमको भारतीय समझते हैं तो आइये देखिये क्या हो रहा है मणिपुर में. यहाँ कारोबार सब बंद है. पढ़ाई बंद है. सब कुछ नष्ट हो रहा है.''
''चुपचाप बैठकर तो समाधान नहीं निकलेगा. मणिपुर में जो हो रहा है, सिर्फ़ सेंट्रल गवर्नमेंट और स्टेट गवर्नमेंट मिलकर उसका हल निकाल सकते हैं. इसके बारे में जल्द से जल्द उपाय सोचिये. दो महीने से ज़्यादा हो चुके हैं."

तीन मई को हिंसा शुरू होने के बाद से अब तक मणिपुर में 142 लोगों की मौत हो चुकी है और क़रीब 60,000 लोग बेघर हो गए हैं. राज्य सरकार के मुताबिक़ इस हिंसा में 5000 आगज़नी की घटनाएं हुई हैं.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक रिपोर्ट में मणिपुर सरकार ने कहा कि इस हिंसा से जुड़े कुल 5,995 मामले दर्ज किए गए हैं और 6,745 लोगों को हिरासत में लिया गया है.
मणिपुर में मौजूदा समय में क़ानून व्यवस्था की स्थिति पर कोई ऑन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं है, लेकिन राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं.

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चुराचांदपुर या लमका?
हिंसा की शुरुआत जिस चुराचांदपुर से हुई थी, हमने वहाँ का रुख़ किया.
चुराचांदपुर इम्फ़ाल से सिर्फ़ 70 किलोमीटर की दूरी पर है. लेकिन यहाँ पहुंचना अब आसान नहीं है.
इम्फ़ाल और चुराचांदपुर के बीच पड़ने वाले बिष्णुपुर ज़िले के इलाक़े को बफ़र ज़ोन बना दिया गया है. भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों के कई चेक-पोस्ट से गुजरते हुए हम चुराचांदपुर पहुंचे.
हिंसा में मारे गए लोगों की याद में यहाँ एक स्मारक बनाया गया है, जिसे "वॉल ऑफ़ रिमेम्बरेंस" का नाम दिया गया है.
हर दिन सैकड़ों रोते-बिलखते लोग इस स्मारक पर हिंसा में मारे गए लोगों की तस्वीरों के सामने अपने दुःख से जूझते नज़र आते हैं.
स्मारक पर लगी मृतकों की तस्वीरों में एक दो महीने के बच्चे की तस्वीर भी शामिल है. काले कपड़े पहने दर्जनों महिलाएं स्मारक के सामने सड़क पर हर दिन विरोध प्रदर्शन करती हैं.

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ऐसे ही एक प्रदर्शन का हिस्सा बनीं क्रिस्टी सुआंतक कहती हैं, "हमारे पास सरकार नहीं है. हमारे लिए खड़ा होने वाला कोई नहीं है. हमारे लिए बोलने वाला कोई नहीं है. तो हम यही कर सकते हैं कि यहाँ आकर अपने भाई बहनों का शोक मनाएं और इंसाफ़ की मांग करें. हमें बचा लीजिये... दुनिया के लिए यही हमारा सन्देश है."

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कुकी समुदाय की ज़्यादा आबादी वाले चुराचांदपुर इलाक़े में एक अलग प्रशासन की मांग भी ज़ोर पकड़ रही है.
इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम की संयोजक मैरी जोन्स कहती हैं, "हम पूरी तरह से अलग प्रशासन चाहते हैं. वो एक राज्य भी हो सकता है और केंद्र-शासित प्रदेश भी. मुझे उम्मीद है कि केंद्र सरकार समझ-बूझ से काम करेगी और मणिपुर के आदिवासी लोगों के लिए समाधान ढूंढेगी."

हिंसा के लिए मणिपुर सरकार और मैतेई समुदाय ज़िम्मेदार?
इस इलाक़े के लोग हिंसा के लिए मैतेई समुदाय और मणिपुर सरकार को मानते हैं. मैरी जोन्स कहती हैं,"हम ख़ुद को मणिपुर सरकार का हिस्सा नहीं मानते. जैसा सुलूक हमारे साथ किया गया है, हम कैसे ख़ुद को मणिपुर सरकार का हिस्सा मान सकते हैं? हम चाहे या न चाहें लेकिन उन्होंने पहले ही हमें अलग कर दिया है. हमें ये स्वीकार करना पड़ेगा."
जिस तरह मैतेई समुदाय के लोग अपनी हथियारबंद विलेज़ डिफेन्स कमिटी बना रहे हैं, वैसे ही हमने देखा कि चुराचांदपुर के बहुत से युवा हथियार लेकर सड़कों पर उतर आए हैं.
हिंसा शुरू होने के दो महीने बाद मणिपुर के चुराचांदपुर इलाक़े में माहौल पहले से कुछ बेहतर तो हुआ है लेकिन यहाँ फैला तनाव अभी भी क़ायम है.

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चुराचांदपुर इम्फ़ाल घाटी से पूरी तरह कट चुका है इसलिए रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों को भी एक लम्बा रास्ता लेकर मिज़ोरम के ज़रिये यहाँ तक पहुँचाया जा रहा है.
हिंसा के दौरान अपनों को खो देने का दुःख यहाँ के लोगों के ज़हन में अब भी क़ायम है और दुःख के साथ-साथ ग़ुस्सा भी है. ग़ुस्से का आलम ये है कि यहाँ के लोगों ने इस जगह का नाम बदलने की ठान ली है. जहां-जहां भी चुराचांदपुर लिखा है, उसे मिटाकर एक नया नाम लमका लिख दिया गया है.
लोगों का कहना है कि चुराचांदपुर नाम मणिपुर के एक मैतेई राजा ने उन पर थोपा था और चूंकि अब वो एक अलग प्रशासन चाह रहे हैं, इसलिए मणिपुर के मैतेई राजाओं से जुड़ी हुई किसी भी बात को वो अपने ज़हन में नहीं रखना चाहते.

एनआरसी की मांग
जहां एक तरफ पहाड़ी इलाक़ों में एक अलग प्रशासन की मांग उठ रही है, वहीं मैदानी इलाक़ों के लोग लगातार ये इल्ज़ाम लगाते आ रहे हैं कि इस हिंसा में म्यांमार से मणिपुर में घुसे लोगों की एक बड़ी भूमिका है.
इसीलिए घाटी में रहने वाले लोग अब एनआरसी करवा कर अवैध रूप से मणिपुर में घुसे लोगों की पहचान करवाने की मांग कर रहे हैं.
पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले कुकी समुदाय के लोग इस बात का खंडन करते हैं.
चुराचांदपुर में विरोध प्रदर्शन कर रही हातनेईनेंग कहती हैं, "वो हमें भारतीय नहीं मानते हैं. वो हमें बाहर से आया हुआ समझते हैं. वो कहते हैं कि हम म्यांमार से हैं. वो ऐसा कैसे कह सकते हैं? हम लोग म्यांमार से नहीं हैं, न ही हम वहां से आए हैं. हम यहीं रहते आए हैं. हमारे पूर्वज अंग्रेज़ों का साथ युद्ध के दौरान यहीं थे. हम यहाँ के मूलनिवासी हैं. वो कैसे हमें अवैध अप्रवासी कह सकते हैं?"
निंगथोउजा लांचा एक फ़िल्ममेकर और कल्चरोलॉजिस्ट हैं. वो मानते हैं कि मणिपुर में अवैध रूप से घुसे लोग मौजूदा संकट की एक बड़ी वजह हैं.
लांचा कहते हैं, "उन लोगों की पहचान करने के लिए और चेक करने के लिए कोई न कोई मैकेनिज़्म लागू करना चाहिए. ऐसे नहीं होगा तो ऐसे ही झगड़े और संकट पैदा होते रहेंगे."
चूंकि मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसक झड़पें लगातार जारी हैं इसलिए बड़ा सवाल ये भी कि ये हिंसा कब और कैसे रुकेगी. लांचा कहते हैं, "कुछ ना कुछ कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स लागू करने होंगे. लेकिन दोनों समुदायों और राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच विश्वास की कमी अभी एक बड़ी समस्या है."

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जले हुए घर, डरे हुए चेहरे और वीरान गाँव
क़रीब दो महीने से जारी हिंसा की वजह से राज्य के अलग-अलग इलाक़ों से हज़ारों लोग अपने गांवों को छोड़ने को मजबूर हुए हैं.
ऐसे ही एक गाँव सुगनु का जायज़ा लेने जब हम निकले तो देखा कि स्थानीय महिलाएं जगह-जगह गाड़ियों की तलाशी ले रही थीं.
महिलाओं के एक ऐसे ही समूह का नेतृत्व कर रहीं नाओरेम सुमिता ने कहा, "हम लोग इन गाड़ियों की चेकिंग करते हैं. कौन क्या लेकर आ जा रहा है. कोई लोग बन्दूक़, गन वगैरह भी लेकर जा सकते हैं तो हम लोग अपने अपने गाँव की सुरक्षा के लिए सबकी तलाशी लेते हैं."
ये महिलाएं मेतेई समुदाय से हैं और इन्हें डर है कि कुकी समुदाय के लोग उन पर हमला कर देंगे. सुगनु जाने वाली सड़क पर हमें हर कुछ किलोमीटर बाद ऐसे ही चेकपोस्ट मिले.

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सुगनु एक ऐसा इलाक़ा है, जहाँ मैतेई और कुकी दोनों समुदाय के लोग दशकों से साथ-साथ रहते आ रहे थे.
तीन मई को जब राज्य में हिंसा भड़की तो यहाँ रहने वाले दोनों समुदायों ने एक शांति समझौता किया और ये फ़ैसला लिया कि वो एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हिंसा नहीं करेंगे. ये शांति समझौता 24 दिन चला. 28 मई को सुगनु में भी हिंसा भड़क उठी.
नतीजा ये हुआ कि यहाँ रहने वाले हज़ारों लोग अपने घरों को छोड़कर भागने के लिए मजबूर हो गए. जो लोग बचे हैं वो इस डर में जी रहे हैं कि आने वाले समय में न जाने उनके साथ क्या हो जाए.
यहाँ से भागने वाले लोगों में मैतेई और कुकी दोनों ही समुदायों के लोग थे. स्थानीय लोगों का कहना है कि करीब 7,000 लोगों की आबादी वाले इस इलाक़े में अब क़रीब एक हज़ार लोग ही बचे हैं.

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सुगनु में तैनात पुलिसकर्मियों का कहना है कि उन्होंने कुकी समुदाय के इलाक़ों से लोकल तरीक़े से बनाये हुए हथियार बरामद किए हैं.
यहाँ कुछ लोगों ने हमसे बात तो की लेकिन अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर.
यहाँ रहने वाले एक शख़्स ने कहा, "सब लोग डरे हुए हैं. लेकिन मुझे अपने गांव की रक्षा करनी है. मुझे अपने लोगों की रक्षा करनी है. लोगों के बिना ये गांव गांव नहीं रहेगा."
सुगनु जैसे कई इलाक़े हैं जहां स्थानीय लोगों से ज़्यादा सुरक्षा बल नज़र आते हैं. जगह-जगह स्थानीय लोग हथियार लिए अपने गांवों के चक्कर लगाते दिखते हैं.

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हिंसा की जांच के लिए केंद्र सरकार ने एक जुडिशल कमीशन बना दिया है. सीबीआई ने भी मामले की जांच शुरू कर दी है.
राज्य सरकार का कहना है कि हालात सुधर रहे हैं.
लेकिन राज्य में हर दिन हो रही हिंसा ये बात बार-बार याद दिला रही है कि दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है.
एक ऐसी खाई जिसका खामियाज़ा मणिपुर के हज़ारों लोग हर दिन भुगत रहे हैं.
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